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व्यभिचार को जेंडर न्यूट्रल कानून बनाने पर विचार नहीं करेगा सुप्रीम कोर्ट

Thu, 02 Aug 2018 02:01 AM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, नई दिल्ली
ब्यूरो/ अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 02 Aug 2018 02:01 AM IST
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Supreme Court will not consider to make Adultery Law Gender-neutral

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि वह इस बात का परीक्षण करेगा कि व्यभिचार (एडल्टरी) को अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए या नहीं। कोर्ट ने साफ किया कि वह इस पर गौर नहीं करेगा कि व्यभिचार को जेंडर न्यूट्रल कानून बनाना जाए या नहीं? 

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धारा-497 की संवैधानिक वैधता पर सुनवाई की शुरुआत में ही चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि हम इस पर नहीं जाएंगे कि इस अपराध में महिलाओं को भी शामिल किया जाना चाहिए या नहीं। अगर हमें लगेगा कि यह आपराधिक प्रावधान महिलाओं के समानता के अधिकार का उल्लंघन है तो हम इस धारा को ही निरस्त कर देंगे। अगली सुनवाई बृहस्पतिवार को होगी। 
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केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा था कि आईपीसी की धारा-497 को कमजोर करना विवाह जैसी संस्था को खत्म करना होगा। साथ ही ऐसा करना भारतीय मूल्यों के विपरीत होगा। गृह मंत्रालय ने धारा-497 (व्यभिचार) के लिए दंड के प्रावधान को सही बताया था। 
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संविधान पीठ केरल निवासी जोसेफ शिन द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है। याचिका में धारा-497 को रद्द करने की अपील की गई है। याचिका में इसे भेदभावपूर्ण और लिंग विभेद वाला बताया गया है। 


इसमें कहा गया है कि धारा-497 के तहत व्यभिचार को अपराध की श्रेणी में रखा गया है लेकिन यह अपराध केवल पुरुषों तक ही सीमित है। इसमें पत्नी को न व्यभिचारी माना जाता है और न ही कानूनन उसे उकसाने वाला ही माना जाता है। इस कानून के तहत पुरुषों को इस अपराध के लिए पांच वर्ष तक की सजा हो सकती है।

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