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सुप्रीम कोर्ट अपडेट्स: चिड़ियाघरों में हादसे रोकने की मांग वाली याचिका खारिज, कहा- जरूरी उपाय पहले से मौजूद

Mon, 21 Sep 2026 06:27 PM IST
शिवम गर्ग पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली Published by: शिवम गर्ग Updated Mon, 21 Sep 2026 06:27 PM IST
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Supreme Court Updates Dismisses Plea Seeking Prevention of Suicide Attempts in Zoo Animal Enclosures in hindi
सुप्रीम कोर्ट अपडेट्स - फोटो : अमर उजाला

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें चिड़ियाघरों में लोगों के जानवरों के बाड़ों में कूदकर आत्महत्या करने की कोशिश को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाने का निर्देश देने की मांग की गई थी।

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न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने यह आदेश दिल्ली हाईकोर्ट के जुलाई 2020 के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया।
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दिल्ली हाईकोर्ट ने देश के अलग-अलग चिड़ियाघरों में लोगों के जानवरों के बाड़ों में कूदने की घटनाओं को लेकर केंद्र और संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई न करने का आरोप लगाने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपना पक्ष रखने की अनुमति दी थी।
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2020 में सुप्रीम कोर्ट ने मांगा था केंद्र से जवाब
सितंबर 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के लिए सहमति जताई थी। उस समय शीर्ष अदालत ने केंद्र से मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 की एक व्यवस्था की वैधता को लेकर स्पष्टीकरण मांगा था। अदालत ने कहा था कि यह प्रावधान आत्महत्या के प्रयास को अपराध मानने वाली भारतीय दंड संहिता की व्यवस्था को प्रभावित करता है।

सोमवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में जरूरी सुरक्षा उपाय पहले से मौजूद हैं। पीठ ने कहा कि हर व्यक्ति से कानून के अनुसार काम करने की अपेक्षा की जाती है। इसके बाद अदालत ने याचिका खारिज कर दी।

क्या थी याचिका में मांग?
याचिका में केंद्र, केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण और अन्य संबंधित अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने के निर्देश देने की मांग की गई थी कि कोई व्यक्ति जानवरों के बाड़े में कूदकर आत्महत्या का प्रयास न कर सके। याचिका में देश के अलग-अलग चिड़ियाघरों में बाघ और शेर जैसे जानवरों के बाड़ों में लोगों के कूदने की घटनाओं का भी उल्लेख किया गया था। इसमें कहा गया था कि ऐसी घटनाओं में कई लोगों की जान जानवरों के हमले में चली गई। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि चिड़ियाघर प्रशासन ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रहा है।

भर्ती अनियमितता मामला: पूर्व CGPSC सचिव की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने CBI से मांगा जवाब
छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग की वर्ष 2020-2022 की भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सचिव जीवन किशोर ध्रुव की जमानत याचिका पर सीबीआई से जवाब मांगा है। अदालत ने जांच एजेंसी को तीन सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने सोमवार को ध्रुव की याचिका पर सुनवाई की। ध्रुव ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के पांच अगस्त के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी।

सीबीआई ने ध्रुव को सितंबर 2025 में गिरफ्तार किया था। आरोप है कि 2020 से 2022 के दौरान जब वह CGPSC के सचिव थे, तब परीक्षा से जुड़े प्रश्नपत्रों की गोपनीयता बनाए रखना उनकी जिम्मेदारी थी। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि उन्होंने अन्य आरोपियों के साथ मिलकर प्रश्नपत्रों की गोपनीयता भंग की और अपने बेटों को प्रश्नपत्र उपलब्ध कराए। जांच एजेंसी के अनुसार, कथित तौर पर इसी आधार पर उनके एक बेटे का चयन डिप्टी कलेक्टर के पद पर हुआ। उनका बेटा भी इस मामले में आरोपी है।

हाईकोर्ट ने जमानत देने से इनकार करते हुए कहा था कि प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक करने में मदद करने वाले लोग लाखों युवाओं के करियर और भविष्य से खिलवाड़ करते हैं। अदालत ने ऐसे कृत्य को गंभीर बताते हुए ध्रुव की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। वहीं, ध्रुव के वकील ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा था कि उन्हें केवल आयोग के सचिव पद पर होने के कारण मामले में फंसाया गया है। उनका दावा था कि प्रश्नपत्र लीक करने में उनकी कोई भूमिका नहीं थी और उनके खिलाफ अपराध में संलिप्तता साबित करने वाली सामग्री भी नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई से तीन सप्ताह में जवाब मांगा है। इसके बाद ध्रुव एक सप्ताह में अपना जवाब दाखिल कर सकेंगे। मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी। इस मामले में ध्रुव के अलावा आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष तमन सिंह सोनवानी समेत कई अन्य लोग भी आरोपी हैं।

कर्नाटक के 2012 दुष्कर्म-मर्डर केस में आदेश, तीन महीने में SIT से दोबारा जांच के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के धर्मस्थल में 2012 में 17 वर्षीय छात्रा के दुष्कर्म और हत्या के मामले की नए सिरे से जांच का आदेश दिया है। अदालत ने राज्य सरकार को वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की अगुवाई में विशेष जांच दल बनाने को कहा है। जांच तीन महीने में पूरी कर रिपोर्ट संबंधित अदालत में दाखिल करनी होगी। अदालत ने पिछली जांच के तरीके पर भी गंभीर टिप्पणी की। हालांकि, इस मामले में पहले आरोपी रहे संतोष राव को दोबारा जांच या मुकदमे का सामना नहीं करना होगा, क्योंकि वह पहले ही बरी हो चुके हैं।
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