SC: जस्टिस यशवंत वर्मा मामले पर CJI खन्ना का बार एसोसिएशंस को आश्वासन, कहा- तबादले की मांग पर करेंगे विचार
जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास पर कथित तौर पर अधजली हुई नकदी मिली थी। इस मामले की हाईकोर्ट के अधिवक्ता जांच की मांग करने पर अड़े हैं। इसी सिलसिले में अलग-अलग राज्यों के हाईकोर्ट बार एसोएिसशन के अधिवक्ता सीजेआई से मिलने पहुंचे। आइए पढ़ते हैं सुप्रीम कोर्ट की अहम खबरें...।
विस्तार
#WATCH | Presidents of Bar Associations of High Court of Allahabad, Lucknow bench, Gujarat, Karnataka, and Jabalpur bench of Madhya Pradesh have come to Supreme Court to meet Chief Justice of India Sanjiv Khanna and other senior judges on the issue of Justice Yashwant Varma.… pic.twitter.com/JuX6sLgsl3
— ANI (@ANI) March 27, 2025विज्ञापन
उच्च न्यायालय इलाहाबाद, लखनऊ पीठ, गुजरात, केरल, कर्नाटक और मध्य प्रदेश की जबलपुर पीठ के बार एसोसिएशनों के प्रतिनिधियों ने गुरुवार दोपहर को मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना समेत न्यायमूर्ति बीआर गवई, न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ से मुलाकात की। बैठक के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल तिवारी ने बताया कि मुख्य न्यायाधीश ने बार निकायों के ज्ञापन पर विचार-विमर्श किया और उनकी मांग पर विचार करने का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन भी अनिश्चितकालीन हड़ताल को लेकर विचार करेगा।
ज्ञापन में यह की गई मांग
अलग-अलग राज्यों के हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने मुख्य न्यायाधीश को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में मामले में एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई। साथ ही मामले में पारदर्शिता अपनाने, दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की रिपोर्ट और अन्य सामग्री को सर्वोच्च न्यायालय की वेबसाइट पर सार्वजनिक करने के लिए मुख्य न्यायाधीश के फैसले की सराहना की गई।
ज्ञापन में कहा गया कि बार एसोसिएशन मांग करती है कि न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा का स्थानांतरण वापस लिया जाए तथा पहले से वापस लिए गए न्यायिक कार्यों के अतिरिक्त सभी प्रशासनिक कार्य भी वापस लिए जाएं। ज्ञापन में दावा किया गया कि दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की रिपोर्ट के अनुसार आग की घटना के एक दिन बाद किसी ने न्यायमूर्ति वर्मा के आवास से सामान हटा दिया था। इससे साफ है कि ऐसे अपराधों में अन्य लोग भी शामिल हो सकते हैं और एफआईआर दर्ज न होने से उनके अभियोजन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
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क्या है मामला?
कथित नकदी की बरामदगी 14 मार्च को रात करीब 11.35 बजे जस्टिस वर्मा के लुटियंस दिल्ली स्थित आवास में आग लगने के बाद हुई। मौके पर अग्निशमन अधिकारी पहुंचे थे। विवाद के मद्देनजर सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम ने न्यायमूर्ति वर्मा को उनके पैतृक इलाहाबाद उच्च न्यायालय वापस भेजने की सिफारिश की। 22 मार्च को सीजेआई ने आरोपों की आंतरिक जांच करने के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया और घटना में दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय की जांच रिपोर्ट अपलोड करने का फैसला किया। इसमें कथित तौर पर भारी मात्रा में नकदी मिलने की तस्वीरें और वीडियो शामिल थे। हालांकि, न्यायमूर्ति वर्मा ने आरोपों को खारिज किया और कहा कि उनके या उनके परिवार के किसी सदस्य द्वारा स्टोररूम में कभी भी कोई नकदी नहीं रखी गई। इस बीच मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त इन-हाउस कमेटी के तीन सदस्यों ने आरोपों की जांच शुरू करने के लिए न्यायमूर्ति वर्मा के आवास का दौरा किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने एल्गार परिषद माओवादी संबंध मामले में गिरफ्तार किए गए अधिवक्ता सुरेंद्र गाडलिंग और कार्यकर्ता ज्योति जगताप की जमानत याचिका पर सुनवाई दो सप्ताह के लिए टाल दी। न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और राजेश बिंदल की पीठ ने कार्यकर्ता महेश राउत को दी गई जमानत को चुनौती देने वाली राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की याचिका पर भी सुनवाई टाल दी। महेश राउत को बॉम्बे हाईकोर्ट ने जमानत दी थी। इसे एनआईए ने शीर्ष अदालत में चुनौती दी। वहीं वकील गाडलिंग पर माओवादियों को सहायता प्रदान करने और मामले में फरार लोगों सहित विभिन्न सह-आरोपियों के साथ कथित रूप से साजिश रचने का आरोप लगाया गया था। यह मामला 31 दिसंबर, 2017 को पुणे में आयोजित एल्गर परिषद सम्मेलन में कथित तौर पर दिए गए भड़काऊ भाषणों से संबंधित है, जिसके कारण अगले दिन पुणे जिले के कोरेगांव-भीमा में हिंसा भड़क गई थी।
आदिवासी संगठनों ने केंद्र और राज्य सरकारों से FRA का बचाव करने का किया आह्वान
100 से अधिक आदिवासी और वनवासी अधिकार संगठनों ने गुरुवार को केंद्र और राज्य सरकारों से अपील की है कि वे अपने संवैधानिक कर्तव्यों को निभाएं और वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) का कोर्ट में बचाव करें। यह अपील सुप्रीम कोर्ट के 2 अप्रैल को होने वाली सुनवाई से पहले की गई है, जिसमें 'वाइल्डलाइफ फर्स्ट एंड ऑर्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया' मामले की सुनवाई की जाएगी। इस मामले में 2006 में बने FRA की संवैधानिकता को चुनौती दी जा रही है, जो पारंपरिक वनवासी समुदायों, खासकर आदिवासी लोगों के अधिकारों को मान्यता देता है।
इन संगठनों ने एक खुले पत्र में कहा कि सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद लाखों आदिवासी और वनवासी लोगों को बेदखली का सामना करना पड़ सकता है, जिनके अधिकारों को गलत तरीके से नकारा गया है। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों से अपील की कि वे भारत के आदिवासियों और वनवासियों के अधिकारों की रक्षा करें और इन लोगों के खिलाफ कोई अवैध कदम उठाने से बचें।
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