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यूं ही नहीं बदली धारा 377, दुनिया भर के विधि विश्वविद्यालयों के शोध ने की सर्वोच्च अदालत की मदद

Mon, 17 Sep 2018 05:02 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 17 Sep 2018 05:02 PM IST
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Supreme court took help of research works of various universities to remove article 377
दो वयस्कों के बीच आपसी रजामंदी से स्थापित होने वाले समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाले ऐतिहासिक फैसले को सुनाने में सर्वोच्च न्यायालय ने कई विधि विश्वविद्यालयों व मनोवैज्ञानिक संस्थानों के शोध कार्यों की भी मदद ली थी। 
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सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ जूरिडिकल साइंसेज (एनयूजेएस) और ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी (जेजीयू) के शोध पत्रों का उल्लेख किया गया है। 
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अंग्रेजों के समय से चले आ रहे इस कानून में संशोधन करने के दौरान प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका व फिलीपीनी गणराज्य की संवैधानिक अदालतों व यूरोपीय मानवाधिकार अदालत की ओर से दिए गए फैसलों का उदाहरण दिया। 

 

Supreme court took help of research works of various universities to remove article 377
प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा कि ओहायो के क स्वास्थ्य विभाग के मामले में अमेरिकी की सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकों की दुर्दशा बताई थी और कहा था कि संविधान समलैंगिकों को अपनी पसंद का अधिकार देता है। प्रधान न्यायाधीश द्वारा द्वारा समलैंगिकता पर लिखे गए फैसले में अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के 2008 के अध्ययन का भी उल्लेख है, जिसमें कहा गया है कि कई दशकों का शोध बताता है कि यौन झुकाव लगातार चलता रहता है। इसमें विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण से लेकर समान लिंग के प्रति विशेष आकर्षण शामिल है। जेजीयू के जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल (जेजीएलएस) के चार संकाय सदस्यों के शोध कार्यों का भी सर्वोच्च न्यायालय ने फैसले में हवाला दिया है। 

सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय में रेयान गुडमैन के एक अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन ‘बियांड इन्फोर्समेंट प्रिंसिपल : सोडोमी लॉज, सोशल नॉर्म्स एंड सोशल पैनॉप्टिक्स’ का भी जिक्र किया गया है। 
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