Supreme Court: बाल विवाह निषेध कानून को नहीं रोक सकते पर्सनल लॉ, सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
पीठ ने कहा कि अधिकारियों को बाल विवाह रोकने और नाबालिगों की सुरक्षा के साथ ही दोषियों को कड़ी सजा दिलाने पर फोकस करना चाहिए। अपने फैसले में पीठ ने ये भी माना कि बाल विवाह निषेध कानून में कुछ खामियां भी हैं।
विस्तार
बाल विवाह को गंभीर सामाजिक बुराई बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उसे रोकने और नियंत्रित करने के लिए कई निर्देश जारी किए हैं। शीर्ष अदालत ने जिला स्तर पर बाल विवाह निधेष अधिकारी (सीएमपीओ) को नियुक्त करने को कहा है, जो सिर्फ बाल विवाह को रोकने के लिए काम करेगा। कोर्ट ने यह भी कहा है कि देशभर में जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक अपने जिले में बाल विवाह को रोकने के लिए जिम्मेदार होंगे। लेकिन यह कहने से परहेज किया कि यह कानून पर्सनल लॉ पर हावी होगा। पर्सनल लॉ बाल विवाह को अनुमति देते हैं।
मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि बच्चों को मिलने वाली सांविधानिक गारंटी के मद्देनजर, हम अधिनियम में कुछ कमियां देखते हैं। सांविधानिक चुनौती या किसी मामले पर बहस न होने पर, हम घोषणा करने से परहेज करते हैं और केंद्र को इसका परीक्षण करने का सुझाव देने तक सीमित रखते हैं। हालांकि, अदालत ने इन मुद्दों पर कानूनी सवाल खुला रखा, अगर यह उचित कार्यवाही में सांविधानिक अदालत के सामने आता है। इस विवादास्पद मुद्दे से निपटते हुए कि क्या बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 विवाह को नियंत्रित करने वाले व्यक्तिगत कानूनों पर हावी होगा, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र इस मुद्दे पर विभिन्न उच्च न्यायालयों के परस्पर विरोधी निर्णय प्रदान करने में विफल रहा है जैसा कि दावा किया गया है। पीठ ने कहा कि मामले में फैसला सुरक्षित रखे जाने के बाद केंद्र ने लिखित दलील में कहा है कि यह अदालत निर्देश दे सकती है कि पीसीएमए व्यक्तिगत कानून पर हावी हो।
अदालत ने बताया कि इन कार्यवाहियों में किसी भी पक्ष द्वारा प्रस्तुत की गई दलीलों में परस्पर विरोधी राय का विवरण नहीं दिया गया था। बाल विवाह निषेध (संशोधन) विधेयक 2021 को 21 दिसंबर, 2021 को संसद में पेश किया गया था। विधेयक को शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल संबंधी विभाग से संबंधित स्थायी समिति को जांच के लिए भेजा गया था। विधेयक में पीसीएमए में संशोधन करने की मांग की गई थी ताकि विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों पर कानून के प्रभाव को स्पष्ट रूप से बताया जा सके। यह मुद्दा संसद के समक्ष विचाराधीन है।
ये हैं कोर्ट के दिशानिर्देश
- व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने और बाल विवाह के आयोजन के खिलाफ तत्काल कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए सीएमपीओ अपनी आधिकारिक वेबसाइटों पर तिमाही रिपोर्ट अपलोड करेंगे। इसमें बाल विवाह को रोकने के लिए उठाए गए कदमों और जांच के परिणामों का विवरण होना चाहिए।
- जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक अपने जिलों में बाल विवाह को सक्रिय रूप से रोकने के लिए जिम्मेदार होंगे। उनके पास उन सभी व्यक्तियों पर मुकदमा चलाने का अधिकार और जिम्मेदारी होगी जो बाल विवाह की सुविधा देते हैं या उसे संपन्न कराते हैं।
- सामूहिक विवाहों को रोकने पर विशेष जोर दिया जाना चाहिए, जो अक्सर सार्वजनिक रूप से आयोजित किए जाते हैं, जहां सरकार या कानून प्रवर्तन अधिकारियों की भागीदारी अनजाने में बाल विवाह समारोहों को वैधता प्रदान कर सकती है।
- बाल विवाह मामलों की संवेदनशीलता व विशिष्ट पहलुओं को पहचानते हुए एक विशेष पुलिस इकाई आवश्यक है। राज्य के गृह मंत्रालय विशेष किशोर पुलिस इकाई (एसजेपीयू) को बाल विवाह रोकथाम ढांचे में एकीकृत करने की व्यवहार्यता पर विचार करेंगे।
- केंद्र सरकार राज्य सरकारों के साथ समन्वय करके पीसीएमए के तहत मामलों को निपटाने के लिए विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतों की स्थापना की व्यवहार्यता का आकलन करेगी।
- अपने अधिकार क्षेत्र में बाल विवाह के मामलों में जानबूझकर कर्तव्य की उपेक्षा करने वाले लोक सेवक के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक और कानूनी कार्रवाई की जाए, प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को बाल विवाह को रोकने के लिए एक वार्षिक कार्य योजना विकसित करना होगा।
- स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत “खुले में शौच मुक्त गांव” मॉडल से प्रेरित होकर “बाल विवाह मुक्त गांव” पहल शुरू की जानी चाहिए, जिसमें पंचायतों और सामुदायिक नेताओं को बाल विवाह को रोकने और रिपोर्ट करने में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। स्कूलों, धार्मिक संस्थानों और पंचायतों में सीएमपीओ द्वारा जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए।
- सभी राज्य व केंद्र शासित प्रदेश विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से निर्धारित ढांचे के अनुरूप स्कूली पाठ्यक्रम में व्यापक यौन शिक्षा को एकीकृत करें। इस शिक्षा में बाल विवाह, लैंगिक समानता, प्रजनन स्वास्थ्य अधिकारों और शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बाल विवाह के प्रभावों के कानूनी पहलुओं के बारे में स्पष्ट जानकारी शामिल होनी चाहिए।
पीसीएमए की सफलता के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी
कोर्ट ने कहा है कि पीसीएमए एक सामाजिक कानून है, जिसकी सफलता के लिए सभी हितधारकों के सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है। कोर्ट ने समुदाय-संचालित रणनीतियों की आवश्यकता पर बल दिया और अभियोजन की तुलना में रोकथाम पर अधिक ध्यान केंद्रित किया। पीठ ने कहा कि इसलिए निवारक रणनीतियों को बाल विवाह के मूल कारणों, जैसे गरीबी, लैंगिक असमानता, शिक्षा की कमी को दूर करने के लिए तैयार किया जाना चाहिए।
क्या कहता है मुस्लिम पर्सनल लॉ
मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 से संचालित होने वाला मुस्लिम पर्सनल लॉ नाबालिग के साथ शादी की अनुमति देता है। इस कानून में साफ तौर पर कहा गया है कि प्यूबर्टी की उम्र ( जिसे 15 साल मानी जाती है) और वयस्कता की उम्र समान है। 1937 के कानून की धारा 2 में प्रावधान है कि सभी विवाह शरीयत के तहत आएंगे, भले ही इसमें कोई भी रीति-रिवाज और परंपरा अपनाई गई हो। यह कानून विवाह, तलाक, विरासत और रखरखाव के मामलों में इस्लामी कानून को लागू करने को मान्यता देता है।
बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006
यह अधिनियम दूल्हे और दुल्हन में किसी एक की भी उम्र विवाह योग्य न होने पर इसे बाल विवाह के रूप में परिभाषित करता है। इसके तहत 18 वर्ष या उससे कम उम्र की बच्चियों और 21 साल या उससे कम उम्र के लड़के को बच्चे के तौर पर संदर्भित किया गया है। बाल विवाह को किसी भी एक पक्ष की ओर से कोर्ट में चुनौती दिए जाने पर यह कानून उसे रद्द करने का अधिकार देता है।
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