फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Supreme Court said on not discharge Saibaba mind is everything for terrorists and Naxalites

माओवादी लिंक मामला: शीर्ष कोर्ट ने साईबाबा क्यों नहीं किया बरी? कहा- आतंकियों-नक्सलियों के लिए दिमाग ही सब कुछ

Sun, 16 Oct 2022 05:47 AM IST
Jeet Kumar अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली। Published by: Jeet Kumar Updated Sun, 16 Oct 2022 05:47 AM IST
सार

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा अर्बन नक्सल को नजरबंद किए जाने की प्रवृत्ति बढ़ी है, लेकिन घर के अंदर से सब कुछ किया जा सकता है, यहां तक कि फोन से भी। नजरबंदी कभी विकल्प नहीं हो सकती। पीठ ने नजरबंदी के आग्रह को खारिज कर दिया।

विज्ञापन
Supreme Court said on not discharge Saibaba mind is everything for terrorists and Naxalites
सर्वोच्च न्यायालय - फोटो : PTI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आतंकी या नक्सली गतिविधि में शामिल होने के लिए शरीर की नहीं, बस दिमाग की जरूरत होती है। यही सबसे खतरनाक बात है। आतंकवादियों या नक्सलियों के लिए दिमाग ही सब कुछ है। शीर्ष कोर्ट ने यह कहते हुए माओवादियों से संबंध के मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा और अन्य को बरी करने के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को निलंबित कर दिया।  

विज्ञापन


जस्टिस एमआर शाह व जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने शनिवार को यह भी कहा कि उक्त टिप्पणी का इस विशिष्ट मामले से संबंध नहीं है, बल्कि सामान्य तौर पर ऐसा देखा गया है। इससे पहले, साईबाबा के वकील आर बसंत ने दलील दी थी कि पूर्व डीयू प्रोफेसर पिछले 8 साल से जेल में हैं। उनकी उम्र 55 साल है और शरीर का 90 फीसदी हिस्सा काम नहीं करता है। वह व्हीलचेयर पर चलते हैं, इसलिए जेल में अब न रखा जाए।  उन्हें घर में नजरबंद किया जाए और वह कोर्ट की हर शर्त का पालन करेंगे।
विज्ञापन


महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसका विरोध किया। कहा, अर्बन नक्सल को नजरबंद किए जाने की प्रवृत्ति बढ़ी है, लेकिन घर के अंदर से सब कुछ किया जा सकता है, यहां तक कि फोन से भी। नजरबंदी कभी विकल्प नहीं हो सकती। पीठ ने नजरबंदी के आग्रह को खारिज कर दिया।
विज्ञापन
विज्ञापन


जेल में ही रहेंगे, पर जमानत अर्जी कर सकते हैं दाखिल
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के चलते अब सभी दोषी जेल में ही कैद रहेंगे। पीठ ने कहा कि वह सिर्फ हाईकोर्ट के फैसले और आदेश को निलंबित कर रही है, आरोपी जमानत अर्जी दाखिल कर सकता है।

महाराष्ट्र सरकार की याचिका पर मांगा जवाब
शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार की याचिका पर साईबाबा और अन्य दोषियों से 8 दिसंबर तक जवाब देने को कहा है।

अपराध की गंभीरता पर नहीं किया विचार
पीठ ने कहा, गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत अपराध बहुत ही गंभीर प्रकृति के हैं। ये समाज ही नहीं, देश की अखंडता व संप्रभुता के भी खिलाफ हैं। आरोपियों को सबूतों की विस्तृत समीक्षा के बाद दोषी ठहराया गया था। हाईकोर्ट ने योग्यता पर विचार नहीं किया।

2013 में पड़ा था घर पर छापा
2013 में गढ़चिरौली और दिल्ली पुलिस ने माओवादियों से संबंध के आरोप में छापा मारा। इसके बाद 2014 में महाराष्ट्र पुलिस ने साईबाबा को दिल्ली में उनके घर से गिरफ्तार किया था।  

निचले कोर्ट के निष्कर्षों को पलटने के बाद ही बरी कर सकती अपीलीय अदालत : सुप्रीम कोर्ट
दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा और अन्य को बरी करने के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस एमआर शाह ने कहा, हम मामले के गुण-दोष में नहीं जाने और (मंजूरी के आधार पर) निर्णय लेने के लिए एक शॉर्टकट खोजने के लिए हाईकोर्ट के आदेश में खामी ढूंढ रहे हैं।

जस्टिस बेला एम त्रिवेदी ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 386 के अनुसार, अपीलीय अदालत निचली अदालत के निष्कर्षों को पलटने के बाद ही बरी कर सकती है। हमारा मानना है कि यह धारा 390 सीआरपीसी (आपराधिक प्रक्रिया संहिता) के तहत शक्ति के प्रयोग के लिए एक उपयुक्त मामला है और हाईकोर्ट के आदेश को निलंबित करने की आवश्यकता है। हाईकोर्ट ने उन्हें केवल इस आधार पर आरोपमुक्त किया कि मंजूरी अमान्य थी और कुछ सामग्री उपयुक्त प्राधिकारी के समक्ष उसी दिन मंजूर की गई थी।

पीठ ने ये सवाल किए तैयार

  • क्या आरोपमुक्त करना उचित : क्या धारा 465 सीआरपीसी पर विचार करते हुए अभियुक्त को गुणदोष के आधार पर दोषी ठहराए जाने के बाद, क्या अपीलीय अदालत द्वारा अनियमित मंजूरी के आधार पर आरोपी को आरोपमुक्त करना उचित है?
  • कोई मंजूरी नहीं दी गई थी : ऐसे मामले में जहां ट्रायल कोर्ट ने गुणदोष के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया है, क्या अपीलीय अदालत ने मंजूरी के अभाव के आधार पर आरोपी को बरी करना उचित है, खासकर जब सुनवाई के दौरान विशेष रूप से कोई मंजूरी नहीं दी गई थी?
  • क्या परिणाम होंगे? : मुकदमे के दौरान मंजूरी के संबंध में विवाद नहीं उठाने और उसके बाद ट्रायल कोर्ट को आरोपी को दिए गए अवसरों के बावजूद आगे बढ़ने की अनुमति देने के क्या परिणाम होंगे?
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed