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SC: 'जिस बैठक में पत्नी का नाम चुना गया, उसमें पति का होना संदेहास्पद', AMU वीसी नियुक्ति पर 'सुप्रीम' टिप्पणी

Mon, 18 Aug 2025 02:24 PM IST
नितिन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नितिन गौतम Updated Mon, 18 Aug 2025 02:24 PM IST
सार

सिब्बल की दलील पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने भी माना कि जिस बैठक में प्रोफेसर नईमा को कुलपति चुना गया, उसमें उनके पति मोहम्मद गुलरेज को शामिल नहीं होना चाहिए था।

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Supreme court on amu vc naima khatoon appointment case raise some doubts
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की पहली महिला वाइस चांसलर प्रोफेसर नईमा खातून की नियुक्ति के मामले पर सुनवाई करते हुए कुछ सवाल उठाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिस बैठक में पत्नी का नाम चुना गया, उस बैठक में पति और तत्कालीन वाइस चांसलर का मौजूद रहना संदेह पैदा करता है। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई, जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने प्रोफेसर मुजफ्फर उरूज रब्बानी और प्रोफेसर फैजान मुस्तफा की याचिका पर सुनवाई करते हुए ये बात कही। 
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कपिल सिब्बल ने दी ये दलील
याचिका में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी गई है। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में प्रोफेसर खातून की वीसी पद पर नियुक्ति को बरकरार रखा था। याचिकाकर्ताओं की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि जिस कार्यकारी परिषद की बैठक में प्रोफेसर नईमा खातून की नियुक्ति पर फैसला किया गया, उस बैठक की अध्यक्षता प्रोफेसर नईमा के पति और तत्कालीन वाइस चांसलर मोहम्मद गुलरेज द्वारा की गई थी। 
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सिब्बल ने कहा कि 'अगर कुलपतियों की नियुक्ति इस तरह होती है तो भविष्य में क्या होगा मैं सोचकर ही कांप जाता हूं।'

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सुप्रीम कोर्ट ने भी माना- तत्कालीन कुलपति को बैठक में नहीं होना चाहिए था
सिब्बल की दलील पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने भी माना कि जिस बैठक में प्रोफेसर नईमा को कुलपति चुना गया, उसमें उनके पति मोहम्मद गुलरेज को शामिल नहीं होना चाहिए था। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि उच्च न्यायालय ने भी अपने आदेश में कहा है कि बेहतर होता कि मोहम्मद गुलरेज उस बैठक में शामिल नहीं होते। इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कुलपति का खुद को सुनवाई से अलग कर लेना उचित होता। हालांकि उन्होंने टाटा सेल्युलर मामले में दिए गए 'आवश्यकता के सिद्धांत' का हवाला दिया और कहा कि जब भागीदारी कानूनी आवश्यकता को पूरा करने के लिए हो, तो प्रक्रिया को दोषपूर्ण नहीं कहा जा सकता।


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