Supreme Court : ग्राम न्यायालय स्थापित करने की मांग पर सभी हाईकोर्ट को सुप्रीम नोटिस, पढ़ें कोर्ट की खबरें
2008 में संसद द्वारा पारित एक अधिनियम में नागरिकों को ‘घर पर न्याय’ प्रदान करने के लिए जमीनी स्तर पर ‘ग्राम न्यायालय’ की स्थापना के लिए प्रावधान किया गया था।
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस याचिका पर सभी हाईकोर्ट से जवाब मांगा है, जिसमें केंद्र और राज्यों को ‘ग्राम न्यायालय’ स्थापित करने का निर्देश देने की मांग की गई है। वर्ष 2019 में दायर इस याचिका में शीर्ष अदालत की देखरेख में ग्राम न्यायालयों को स्थापित करने की मांग की गई है। मामले की अगली सुनवाई पांच दिसंबर को होगी। जस्टिस एस अब्दुल नजीर और जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम की पीठ ने सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को नोटिस जारी कर इस मामले में पक्षकार बनाया है।
पीठ ने कहा, हाईकोर्ट को पक्षकार बनाया जाना चाहिए, क्योंकि वे पर्यवेक्षी अथॉरिटी हैं। याचिकाकर्ता एनजीओ नेशनल फेडरेशन ऑफ सोसाइटीज फॉर फास्ट जस्टिस और अन्य की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने पीठ के समक्ष कहा, 2020 में शीर्ष अदालत के निर्देश के बावजूद कई राज्यों ने अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की है। भूषण ने कहा कि ये ‘ग्राम न्यायालय’ ऐसे होने चाहिए कि लोग वकील के बिना अपनी शिकायतें व्यक्त कर सकें।
यह दिया निर्देश
शीर्ष अदालत ने 2020 में राज्यों को चार सप्ताह के भीतर ‘ग्राम न्यायालय’ स्थापित करने के लिए अधिसूचना जारी करने का निर्देश दिया था और सभी हाईकोर्ट को इस मुद्दे पर राज्य सरकारों के साथ परामर्श की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए कहा था। 2008 में संसद द्वारा पारित एक अधिनियम में नागरिकों को ‘घर पर न्याय’ प्रदान करने के लिए जमीनी स्तर पर ‘ग्राम न्यायालय’ की स्थापना के लिए प्रावधान किया गया था। ऐसा यह सुनिश्चित करने के लिए किया था कि सामाजिक, आर्थिक कारणों से किसी को न्याय हासिल करने के अवसरों से वंचित नहीं होना पड़े।
उपासना स्थल अधिनियम... जवाब देने को केंद्र को मिला अतिरिक्त समय
सुप्रीम कोर्ट ने 15 अगस्त, 1947 को प्रचलित धार्मिक स्थलों के चरित्र को बनाए रखने वाले 1991 के कानून की वैधता को चुनौती वाली याचिका पर अपना रुख स्पष्ट करने के लिए केंद्र को 12 दिसंबर तक समय दिया। सुप्रीम कोर्ट जनवरी के पहले हफ्ते में सुनवाई करेगा। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस जेबी पर्दीवाला की पीठ के समक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, इस मामले पर उच्चतम स्तर पर विचार-विमर्श किया जा रहा है और इसके लिए और समय की आवश्यकता है। मामले में केंद्र के जवाब का इंतजार मार्च 2021 से है।
जीएसटी अपीलीय न्यायाधिकरण पूरी तरह से हों कागजरहित
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि हाईकोर्ट और न्यायाधिकरणों के समक्ष कर मामलों में उसकी सभी फाइलिंग ऑनलाइन मोड में हो। शीर्ष अदालत ने कहा, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) अपीलीय न्यायाधिकरण का संचालन शुरू से ही पूरी तरह से कागजरहित होना था। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने कहा, हमारा विचार है कि केंद्र को अब यह सुनिश्चित करने के लिए सभी त्वरित कदम उठाने चाहिए कि हाईकोर्ट के साथ सीईएसटीएटी व आईटीएटी सहित राजस्व न्यायाधिकरणों के समक्ष सभी अपीलों, कार्यवाही को ई-फाइलिंग मोड में दाखिल किया जाना चाहिए।
उच्चाधिकार प्राप्त समिति लक्ष्य प्राप्ति के लिए आवश्यक कदम उठाएंगे ताकि ई-फाइलिंग को तीन महीने की अवधि के भीतर अंजाम दिया जा सके। दरअसल, एक वकील जीएसटी अपीलीय न्यायाधिकरण के मुद्दे को उठाते हुए कहा कि शुरुआत से ही सभी फाइलिंग इलेक्ट्रिक मोड में होना चाहिए था। पीठ ने सुझाव पर हामी भरते हुए कहा, केंद्र को यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाना चाहिए ताकि ट्रिब्यूनल के लिए तौर-तरीके लागू किए जा सके। सभी फाइलिंग इलेक्ट्रॉनिक रूप में हो। पीठ ने केंद्र को सुनवाई की अगली तारीख पर इस संबंध में लिए गए फैसले से अवगत कराने का निर्देश दिया है।
मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों का सामना कर रहे हैं 51 सांसद
सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया गया है कि 51 सांसद प्रवर्तन निदेशालय की ओर से दर्ज मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों का सामना कर रहे हैं जबकि इतने ही सांसद सीबीआई की ओर से दर्ज मामलों का सामना कर रहे हैं। एक स्थिति रिपोर्ट में वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया ने अदालत को यह भी बताया कि 71 विधायक/ एमएलसी धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए), 2002 के तहत मामलों में आरोपी हैं। हालांकि रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया है कि कितने सांसद और विधायक/एमएलसी वर्तमान या पूर्व हैं। हंसारिया को सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों के शीघ्र निपटान के लिए न्यायमित्र नियुक्त किया गया है।