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Supreme Court: 'क्या अवैध प्रवासियों को रोकने के लिए यूएस की तरह सीमा पर दीवार बनाएंगे?' केंद्र से सवाल

Fri, 29 Aug 2025 05:52 PM IST
शिव शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शुक्ला Updated Fri, 29 Aug 2025 05:52 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से अवैध प्रवासियों, खासकर बांग्लादेश भेजे जाने वाले प्रवासियों को निर्वासित करने के लिए सरकारों द्वारा अपनाई गई मानक संचालन प्रक्रियाओं (एसओपी) के बारे में जानकारी मांगी। साथ ही शीर्ष कोर्ट ने इस मामले में गुजरात सरकार को भी पक्षकार बनाया।

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Supreme Court asked Centre want border wall like US to prevent entry of illegal immigrants?
सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से अहम सवाल किए हैं। शीर्ष कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र से सवाल किया कि क्या वह अवैध प्रवासियों की घुसपैठ रोकने के लिए भारतीय सीमा पर अमेरिका की तरह दीवार बनाना चाहती है। साथ ही अदालत ने पूछा है कि क्या केंद्र ने अवैध प्रवासियों की पहचान करने और उन्हें वापस भेजने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) बनाई है।

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न्यायमूर्ति सूर्यकांत, जॉयमाल्या बागची और विपुल एम पंचोली की पीठ ने यह सवाल पश्चिम बंगाल प्रवासी कल्याण बोर्ड की याचिका पर सुनवाई करते हुए किया। इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि बंगाली भाषी प्रवासी मजदूरों को बांग्लादेशी नागरिक मानकर हिरासत में लिया जा रहा है।
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गुजरात सरकार को भी बनाया पक्षकार
पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र से अवैध प्रवासियों, खासकर बांग्लादेश भेजे जाने वाले प्रवासियों को निर्वासित करने के लिए सरकारों द्वारा अपनाई गई मानक संचालन प्रक्रियाओं (एसओपी) के बारे में जानकारी मांगी। साथ ही शीर्ष कोर्ट ने इस मामले में गुजरात सरकार को भी पक्षकार बनाया।
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इस दौरान शीर्ष कोर्ट ने यह भी कहा कि बंगाली और पंजाबी भाषी भारतीयों की साझी सांस्कृतिक और भाषाई विरासत पड़ोसी देशों से जुड़ी है, केवल सीमाएं उन्हें अलग करती हैं। 

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने किया विरोध
वहीं, सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से दलीलें रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि कोई भी वास्तविक पीड़ित अदालत के सामने नहीं आया है। उन्होंने कहा कि इस अदालत को इन संगठनों और एसोसिएशनों द्वारा दायर याचिकाओं पर विचार नहीं करना चाहिए, जिन्हें कुछ राज्य सरकारों का समर्थन प्राप्त हो सकता है। अदालत के समक्ष कोई पीड़ित पक्ष नहीं है। हम जानते हैं कि कुछ राज्य सरकारें अवैध प्रवासियों के बल पर कैसे फलती-फूलती हैं। उन्होंने कहा कि जनसांख्यिकीय परिवर्तन एक गंभीर मुद्दा बन गया है। 

इस पर पीठ ने मेहता से कहा कि पीड़ित लोग संसाधनों के अभाव में शायद सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचने में असमर्थ हैं। इस पर मेहता ने याचिकाकर्ता बोर्ड और अन्य गैर सरकारी संगठनों की ओर से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसे लोगों को अदालत तक पहुंचने में उनकी मदद करनी चाहिए। 

आगे न्यायमूर्ति बागची ने पूछा कि क्या आप अमेरिका की तरह सीमा दीवार बनाना चाहते हैं ताकि अवैध प्रवासियों को रोका जा सके?

इस पर मेहता ने जवाब देते हुए कहा, 'बिल्कुल नहीं। लेकिन केवल अस्पष्ट आरोपों पर जवाब नहीं दिया जा सकता। अगर कोई व्यक्ति खुद आकर कहे कि उसे बाहर निकाला जा रहा है तो हम सुनेंगे। हम सिर्फ यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि प्रवासी हमारे संसाधनों पर बोझ न बनें।'

न्यायमूर्ति बागची ने तब मेहता से कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्र की अखंडता और जैसा कि आपने कहा, हमारे संसाधनों के संरक्षण का प्रश्न हैं। हम चाहते हैं कि केंद्र इस मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करे।

याचिकाकर्ता पक्ष के वकील की यह दलील
वहीं, याचिकाकर्ता पक्ष के वकील प्रशांत भूषण ने अपनी दलीलों में कहा कि बंगाली भाषी लोगों को जबरन बांग्लादेश भेजा जा रहा है। भूषण ने कहा कि इसके बहुत गंभीर परिणाम होते हैं। उन्होंने दावा किया कि कभी-कभी बीएसएफ के लोग कहते हैं कि तुम दूसरी तरफ भाग जाओ, वरना हम तुम्हें गोली मार देंगे। इसी तरह, बांग्लादेश के बॉर्डर गार्ड भी धमकी देते हैं और कहते हैं कि अगर तुम दूसरी तरफ नहीं भागे, तो वे गोली मार देंगे। उन्होंने एक गर्भवती महिला के मामले का जिक्र करते हुए कहा। उस महिला को कथित तौर पर सीमा पार भेज दिया गया और जिसकी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका कलकत्ता हाईकोर्ट में लंबित है।

याचिकाकर्ता पक्ष के वकील प्रशांत भूषण ने अदालत से अपील करते हुए कहा कि वह राज्यों को यह निर्देश दे कि वे प्रवासी श्रमिकों को बांग्लादेश में तब तक जबरदस्ती न धकेलें जब तक कि कोई प्राधिकारी उनकी राष्ट्रीयता पर निर्णय नहीं ले लेता।

शीर्ष कोर्ट ने दिए निर्देश
दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद पीठ ने निर्देश देते हुए कहा कि देश में अवैध रूप से घुसपैठ करने वालों और भारत के भीतर पहले से मौजूद लोगों में फर्क करना जरूरी है। जिनके खिलाफ कार्रवाई हो रही है, उनके लिए उचित प्रक्रिया का पालन होना चाहिए।  

पीठ ने इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण मांगा और उस याचिका का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि बंगाली बोलने वाले लोगों को विदेशी माना जाता है। इस पर केंद्र के पक्षकार मेहता ने आश्वासन दिया कि भाषा निर्वासन का आधार नहीं है। उन्होंने याचिका पर जवाब दाखिल करने की पेशकश की और आग्रह किया कि इस मामले की सुनवाई न्यायालय में लंबित रोहिंग्या मामले के साथ की जाए। जिसके बाद न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने मेहता से दोनों मामलों में जवाब दाखिल करने को कहा।

इस दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अधिकांश यूरोपीय देश अवैध प्रवासियों की समस्या से जूझ रहे हैं और उन्होंने यह वास्तव में चिंताजनक है। इस तर्क से सहमति जताते हुए पीठ ने कहा कि यह एक जटिल मुद्दा है क्योंकि कुछ देश आप्रवासियों का स्वागत करते हैं जबकि अन्य उनका विरोध करते हैं।

इससे पहले सुनवाई के दौरान भूषण ने पीठ को बताया कि 14 अगस्त को न्यायालय द्वारा नौ राज्यों को नोटिस जारी किए जाने के बावजूद जवाब दाखिल नहीं किए गए। उन्होंने बांग्लादेश में हिरासत में ली गई एक गर्भवती महिला के परिवार के सदस्यों द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की ओर इशारा किया और कहा कि चूंकि यहां यह मामला लंबित है ऐसे में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने मामले को स्थगित कर दिया है।

इस पर, सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट को भी निर्देश देते हुए कहा कि वह गर्भवती महिला के मामले की सुनवाई जल्द करे। साथ ही अदालत ने यह भी साफ किया कि इस पीआईएल के लंबित रहने से हाईकोर्ट की कार्यवाही प्रभावित नहीं होगी। मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर को होगी।


याचिका में क्या?
बता दें कि इस याचिका में गृह मंत्रालय के 2 मई, 2025 के एक पत्र के तहत पश्चिम बंगाल के प्रवासी श्रमिकों की व्यवस्थित और मनमानी हिरासत और निर्वासन को चुनौती दी गई है। यह पत्र संदिग्ध अवैध प्रवासियों के अंतर-राज्यीय सत्यापन और हिरासत को अधिकृत करता है। याचिका में कहा गया है कि आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड जैसे वैध नागरिकता दस्तावेज होने के बावजूद कई प्रवासी श्रमिकों को बिना किसी आरोप के लंबे समय तक हिरासत में रखा गया है। इसमें आरोप लगाया गया है कि कई राज्यों के पुलिस अधिकारियों ने बंगाली भाषा को "बांग्लादेशी" के रूप में गलत तरीके से चित्रित किया है और भारतीय नागरिकों को केवल उनकी बोली या मूल स्थान के आधार पर विदेशियों के रूप में वर्गीकृत किया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि फरवरी से जुलाई 2025 के बीच सैकड़ों श्रमिकों, जो ज्यादातर कम आय वाले अनौपचारिक नौकरियों में लगे हुए थे, को भारतीय नागरिकता का वैध प्रमाण होने के बावजूद राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, हरियाणा, झारखंड, दिल्ली और छत्तीसगढ़ में हिरासत में लिया गया था। यह दावा किया गया है कि कुछ को गलत तरीके से बांग्लादेश भेज दिया गया था और बाद में सत्यापन के बाद वापस लाया गया था।

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