म्हारी छोरियां छोरों से कम हैं के... पढ़िये सफलता की नई इबारत गढ़ने वाली इन युवतियों की दास्तां
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
नहीं हारी हिम्मत, बनी प्रधानाचार्या
नाम है खुशी पर जीवन में बड़े-बड़े दुख आए। पैदाइश से एक महीने पहले पिता की मौत हुई। बचपन में ही मां ने साथ रहना छोड़ दिया। बड़ी बुआ का सहारा मिला। परवरिश हुई पर हाईस्कूल के बाद खुद अपने पैरों पर खड़े होना पड़ा। अपनी सीमित कमाई से पढ़ाई की और नौकरी तलाशी। इसके बाद भी खुशी ने हिम्मत नहीं हारी और पढ़ाई लिखाई कर अब वह एकेडमी ऑफ मॉडल लर्निंग एकेडमी में प्रधानाचार्य हैं। असमोली चीनी मिल के चेयरमैन सुभाष पांडेय कहते हैं कि क्षेत्र के लोग खुशी के संघर्ष की मिसाल उन लोगों को देते हैं, जो छोटी-छोटी समस्याओं पर जूझने के बजाए परेशान हो जाते हैं।
बुर्के की बंदिश तोड़ कुश्ती में बनाया करियर
खुशी की तरह एक और युवती है शाहिस्ता। वह भारतल सिरसी गांव की है। कुश्ती के खेल कुराश में उसने 2015 में राष्ट्रीय स्तर पर तीसरा स्थान पाया। जब वह अपने गांव के कल्याणपुर स्थित भोले सिंह त्यागी के अखाड़े में कुश्ती का अभ्यास करने जाती थी तो परिवार में दादा ही कहते थे कि लड़की है कुश्ती? यह ठीक नहीं है। गांव वाले भी विरोध करते थे। माता-पिता ने हौसला बढ़ाया। उसने माध्यमिक स्कूल फेडरेशन ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित खेलों में में कांस्य पदक जीता।
हस्तशिल्प को बना रहीं तरक्की का आधार
तरक्की की नई राह तलाश रहीं सरायतरीन की पूर्वी वार्ष्णेय हस्तशिल्प निर्यात के क्षेत्र में अपनी किस्मत आजमा रहीं हैं। पति दीपक वार्ष्णेय की मृत्यु के बाद आकस्मिक तौर पर उन्हें अपने हस्तशिल्प के कारोबार की कमान संभालनी पड़ी। वह कहती हैं कि स्थानीय कारीगरों से माल तैयार कराना और फिर उसे देश में बेचना थोड़ा कठिन है लेकिन निर्यात करना आसान है। उन्होंने बताया कि हस्तशिल्प निर्यात के क्षेत्र में हर रोज नई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। लेकिन वह इससे काफी कुछ सीख रही हैं और सफलता की राह पर आगे बढ़ रही हैं।