श्रीलंका आर्थिक संकट: खुद लिखी अपनी बर्बादी की कहानी, टैक्स कम करने से बर्बाद हुई अर्थव्यवस्था
कोलंबो में टैक्सटाइल बिजनेस से जुड़े अशोक जैन ने बताया कि पहले श्रीलंका में अलग-अलग मदों में अलग-अलग टैक्स व्यवस्था लागू थी। आवश्यक वस्तुओं पर टैक्स दर कम होने के साथ-साथ ऊंची आय वालों पर 30 फीसदी तक का टैक्स लगता था, लेकिन लोगों की नजर में बेहतर होने के लिए सरकार ने टैक्स दरें घटाकर आधा कर दीं...
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साल 2020 में ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स के मामले में भारत 0.645 अंक के साथ 131वें स्थान पर था, तो श्रीलंका 0.782 अंक के साथ 72वें स्थान पर था। यानी 189 देशों की सूची में श्रीलंका भारत से बहुत ऊपर था। उसकी प्रति व्यक्ति आय भी भारत से कहीं ज्यादा थी। ऐसे में केवल दो से तीन सालों में ऐसा क्या हुआ कि श्रीलंका तबाही के कगार पर आ गया? जानकार बताते हैं कि श्रीलंका ने अपनी बर्बादी की कहानी स्वयं अपने हाथों से लिखी है और इसके लिए किसी दूसरे को दोष नहीं दिया जा सकता।
राजधानी कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर आभास कुमार ने अमर उजाला को बताया कि श्रीलंका सरकार ने आर्थिक नीतियां लागू करते समय जमीनी वास्तविकताओं को ध्यान में नहीं रखा। भावनाओं में बहकर केवल आदर्श की बात करने के कारण पड़ोसी देश की बर्बादी हुई है। सरकार ने फैसला लिया कि श्रीलंका केवल ऑर्गेनिक खेती करने वाला दुनिया का पहला देश होगा। इस आदर्श को प्राप्त करने के लिए सरकार ने रासायनिक उर्वरकों के आयात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। इससे उत्पादन में भारी कमी हो गई और किसानों को भारी नुकसान हुआ।
ऑर्गेनिक खेती शुरू करने पर पहले तीन साल तक उत्पादन में कमी आती है। बाद में पर्याप्त ऑर्गेनिक खाद डालने के बाद उत्पादन सुधरता है और इसका लाभ होता है। लेकिन श्रीलंका ने अचानक यह फैसला लेकर अपने किसानों को नुकसान के गर्त में धकेल दिया। इससे चाय और अन्य कृषि वस्तुओं के निर्यात पर टिकी श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ।
टैक्स कम करने से हुआ नुकसान
कोलंबो में टैक्सटाइल बिजनेस से जुड़े अशोक जैन ने बताया कि पहले श्रीलंका में अलग-अलग मदों में अलग-अलग टैक्स व्यवस्था लागू थी। आवश्यक वस्तुओं पर टैक्स दर कम होने के साथ-साथ ऊंची आय वालों पर 30 फीसदी तक का टैक्स लगता था, लेकिन लोगों की नजर में बेहतर होने के लिए सरकार ने टैक्स दरें घटाकर आधा कर दीं। केवल 15 फीसदी का टैक्स लेने से सरकार को प्रति वर्ष 60 हजार करोड़ रुपये का भारी नुकसान हुआ।
कोरोना ने तोड़ी कमर
श्रीलंका की अर्थव्यवस्था का लगभग 10 फीसदी अकेले पर्यटन से आता है। कोरोना काल में प्रतिबंधों के कारण दूसरे देशों के पर्यटक श्रीलंका नहीं आ सके। इससे उसे कोई कमाई नहीं हुई और उसे डॉलर में कोई आय नहीं हुई। कोरोना काल में श्रीलंका के जो निवासी बाहर रहकर काम करते थे, और अपने देश को डॉलर भेजते थे, वे भी विदेश नहीं जा सके। जो लोग दूसरे देशों में थे, उनका स्वयं का काम भी बाधित हो चुका था, लिहाजा सरकार के पास डॉलर की कमी होती गई और देश बर्बादी के कगार पर पहुंचता गया।
विदेशी कर्ज की मार
श्रीलंका की पूरी अर्थव्यवस्था में कर्ज का बड़ा योगदान है। उसने चीन, जापान, भारत और विश्व संस्थाओं से भारी कर्ज ले रखा है। इनकी किस्तें चुकाने के लिए उसे हर साल भारी मात्रा में डॉलर की आवश्यकता होती है। तीन साल पहले श्रीलंका के पास 7.5 अरब डॉलर का रिजर्व था। बीते नवंबर माह में यह भंडार घटकर 1.58 अरब डॉलर रह गया। वर्तमान में देश के पास केवल 17.5 हजार डॉलर ही बचे हैं। अब वह डीजल-पेट्रोल और गैस का मूल्य नहीं चुका पा रहा है, जिसके कारण उसके बिजली प्लांट बंद होने के कगार पर आ गए हैं।
रूस-यूक्रेन युद्ध ने भी श्रीलंका की परेशानी बढ़ा दी है। युद्ध के कारण तेल उत्पादों का मूल्य उच्चतम स्तर पर चल रहा है जिसके कारण दुनिया को पेट्रोलियम उत्पादों के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। जबकि श्रीलंका के पास इस समय कोई विदेशी मुद्रा नहीं बची है जो उसका संकट बढ़ाती जा रही है।