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सांसदों से साथ मिल ‘स्पार्क फेलो’ सुधार रहे संसदीय क्षेत्र की हालत

Thu, 21 Feb 2019 04:00 AM IST
आसिम खान शरद गुप्ता, नई दिल्ली
शरद गुप्ता, नई दिल्ली Published by: आसिम खान Updated Thu, 21 Feb 2019 04:00 AM IST
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Spark Fellow improving condition of the parliamentary constituency With the MPs

पेशे से वे इंजीनियर, डॉक्टर, वकील और एमबीए हैं, लेकिन समाज के लिए कुछ करने का जुनून उन्हें देश के पिछड़े इलाकों में ले आया है। पिछले एक साल से 20 युवा प्रोफेशनल देश के अलग-अलग हिस्सों में लोगों की समस्याओं को समझ रहे हैं और उनका जल्द हल खोजने का प्रयास कर रहे हैं। इन्हें 600 से ज्यादा आवेदकों में से चुना गया है। इन युवाओं को टाटा ट्रस्ट ने अपने स्पार्क कार्यक्रम के तहत 16 राज्यों के 20 सांसदों के साथ एक फेलोशिप कार्यक्रम के तहत नियुक्त किया है। ये उस क्षेत्र के लोगों से मिलकर उनकी समस्याएं सुनकर सांसद और स्थानीय अधिकारियों के साथ मिलकर उनका हल निकालते हैं।

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स्पार्क यानी सपोर्टिंग पार्लियामेंटेरियन्स ऑन एनालिसिस एंड रिसर्च इन द कांस्टिटुएंसी। इस काम में टाटा ट्रस्ट की मदद कर रहा है गैर सरकारी संगठन स्वनीति इनीशिएटिव। तकनीक और डाटा से लैस इन युवाओं के लिए ग्रामीण भारत में काम करना एक बड़ी चुनौती तो है, लेकिन लोगों की समस्याएं हल करने का संतोष उन्हें सुख भी दे रहा है। स्वनीति इनीशिएटिव के सीईओ रितविका भट्टाचार्य कहती हैं कि सांसदों, खास कर नए सांसदों के पास फंड होता है, लेकिन समस्याओं की प्राथमिकताएं तय करना एक कठिन काम है। हम इसी काम में उनकी मदद करते हैं।
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मेघालय में ड्रॉपआउट रेट घटाने में मदद मिली

उदाहरण के लिए मेघालय में स्पार्क के युवाओं ने पाया कि स्कूल तो बहुत हैं, लेकिन शिक्षा का स्तर ठीक नहीं है। ड्रॉपआउट रेट बहुत ज्यादा था। कहीं-कहीं तो 45 से 50 प्रतिशत तक। दस प्रतिशत स्कूलों में बिल्डिंग नहीं थी। 30 प्रतिशत में शौचालय नहीं थे। प्रदेश के 113 अरब रुपयों के बजट में शिक्षा पर खर्च के लिए केवल 15 अरब थे। ट्रस्ट के लोगों ने शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे भारती फाउंडेशन जैसे एनजीओ से संपर्क किया। उन्होंने सांसद निधि से पैसे जुटाए और स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर 50 स्कूलों में बिल्डिंग से लेकर अन्य संसाधन जुटाए। इसके बाद स्कूलों में ड्रॉपआउट रेट घट गया और शिक्षा का स्तर बेहतर हुआ।
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ओडिशा में सिखाई मछली पालन की आधुनिक तकनीक

ओडिशा के बोलांगीर जैसे अकालग्रस्त इलाके में स्पार्क के फेलो सिद्धांत पांडा ने पाया कि लोगों के पास आय के साधन नहीं थे, वर्षा के अभाव में खेती लगातार खराब हो रही थी। फ्लोराइड की अधिकता से पीने योग्य पानी नहीं था और लोग बीमार थे। टाटा ट्रस्ट ने तालाबों की हालत सुधारने के लिए पांच करोड़ रुपये दिए। एमबीए कर चुके पांडा ने सांसद निधि और चाचा ट्रस्ट के पैसों से तालाबों की सफाई, खुदाई करवाई और किसानों को मछली पालन की नवीनतम तकनीक सिखाई। दो सालों में वहां पेयजल समस्या तो दूर हुई ही, गरीबी से भी निजात मिली।

सांसद सिंहदेव का था आइडिया

स्पार्क योजना बोलांगीर के सांसद कलिकेश सिंहदेव का आइडिया था। 2009 में पहली बार संसद पहुंचे सांसदों के एक दौरे में अमेरिकी सीनेट जॉन केरी से मिले। वहां अधिकतर काम युवा इंटर्न करते दिखाई दिए। तभी उन्होंने टाटा ट्रस्ट से बात कर यह कार्यक्रम शुरू कराया।


ये सांसद भी चला रहे कार्यक्रम

स्पार्क फेलो डुमरियागंज के सांसद जगदंबिका पाल के साथ, हमीरपुर (हिमाचल) के सांसद अनुराग ठाकुर, कलियाबोर (असम) के सांसद गौरव गोगोई जैसे कई सांसदों के साथ अलग-अलग कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। 

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