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योजनाएं सिर्फ नाम की, नहीं किसी काम की

Sat, 28 May 2016 12:13 AM IST
अमित सरन/ अमर उजाला, इलाहाबाद
अमित सरन/ अमर उजाला, इलाहाबाद Updated Sat, 28 May 2016 12:13 AM IST
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Schemes of center and states are useless without time boundation
नहीं मिल रहा योजनाओं का लाभ - फोटो : Getty

 यूपी के इलाहाबाद जिलान्तर्गत करछना में डाड़ेपर इलाके में रहने वाले रामचंद्र और गुलाब यादव ने अपनी बेटियों के विवाह के लिए प्रदेश सरकार की शादी अनुदान योजना के तहत आवेदन किया था। शादी का वक्त आ गया लेकिन पैसा खाते में नहीं आया। गांव के साहूकारों से कर्ज लेकर बेटियों की शादी की। शादी के महीनों बाद खाते में पैसा आया, जो कर्ज का ब्याज चुकाने में ही खर्च हो गया। दोनों अंत्योदय कार्ड धारक हैं यानी गरीबी रेखा से नीचे हैं। प्रदेश सरकार की शादी अनुदान योजना हो या स्वरोजगार के लिए कामधेनु योजना या फिर केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री जनधन योजना अथवा सुकन्या समृद्धि योजना, सभी बेहाल हैं। तीन माह पहले प्रदेश सरकार के कार्यकाल को चार साल पूरे हुए, वहीं एक दिन पहले केंद्र सरकार ने दो साल पूरे किए। दोनों ने अपनी उपलब्धि के रूप में उन योजनाओं को गिनाया जो धरातल पर धराशायी हो चुकी हैं। योजनाएं किसी काम की नहीं, सिर्फ नाम की हैं।

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प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत खाता खुलवाने वालों से स्मार्ट कार्ड के लिए 50 से 100 रुपये वसूले गए। खाता खोलने वालों को दो बीमा योजनाएं दी गईं। इनमें से एक प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना और दूसरी प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना शामिल है। योजनाओं को उन्हीं मिलना था, जिनके पास स्मार्ट कार्ड थे। कार्ड के लिए 50 से 100 रुपये वसूले गए लेकिन ज्यादातर खाताधारकों को कार्ड नहीं मिले और जिन्हें कार्ड मिले भी तो उन्हें इनके उपयोग के बारे में नहीं बताया गया। नतीजा कि योजना धड़ाम हो गई। यह भी कहा था कि खाते में एक रुपया न हो, फिर भी पांच हजार रुपये तक निकाल सकेंगे लेकिन यह योजना भी सफल नहीं हुई।
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इसी तरह सुकन्या समृद्धि योजना भी खास उपलब्धि हासिल नहीं कर सकी। फरवरी 2015 में इस योजना के तहत प्रधान डाकघर में एक करोड़ 25 लाख पांच हजार 500 रुपये जमा हुए तो मार्च में आंकड़ा घटकर एक करोड़ 21 लाख 86 हजार 700 रुपये तक सीमित हो गया। पहली अप्रैल से ब्याज दर भी घटा दी गई, जिसके बाद इस योजना की हालत और बदतर हो गई है। किसान क्रेडिट कार्ड योजना की हालत भी बदतर रही। किसानों का पुराना लोन माफ करने के एवज में उन्हें अनिर्वाय रूप से नया लोन और किसान क्रेडिट कार्ड दिया गया। ऐसे में लिखापढ़ी में तो लोन माफ हो गया लेकिन किसान फिर से कर्ज के बोझ तले दब गए। ऐसी ही गड़बड़ियां तमाम योजनाओं के साथ हुईं।

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राज्य सरकार की योजनाओं की निकली हवा

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राज्य सरकार की योजनाओं का भी हाल बेहाल - फोटो : Getty

केंद्र के तरह राज्य सरकार की योजनाओं की हालत भी बदतर है। प्रदेश सरकार की स्वत: रोजगार योजना वर्षों बाद भी पटरी पर नहीं आ सकी। इस योजना के तहत ऋण के लिए वित्तीय वर्ष 2015-16 में 14 बैंकों को 2476 आवेदन भेजे गए जबकि लक्ष्य 2800 आवेदनों का था। बैंकों ने 1676 आवेदन निरस्त कर दिए और महज आठ सौ आवेदन स्वीकृत कर ऋण वितरित किया। इसी तहर कामधेनु योजना, कुक्कुट विकास योजना के भी 50 फीसदी से अधिक आवेदन बैंकों में महीनों से लंबित हैं। कामधेनु योजना में गाय एवं भैंस पालन के लिए सिर्फ संपन्न और सत्ता से जुडे़ लोगों को ही ऋण उपलब्ध कराया गया और जिन्हें स्वरोजगार के लिए इसकी जरूरत थी, उनके आवेदन कचरे के डब्बे में फेंक दिए गए।

खाद्य सुरक्षा अधिनियम की भी यही हालत हुई। संपन्न लोगों को पात्र गृहस्थियों में शामिल कर लक्ष्य पूरा दिखा दिया गया और जो वास्तव में इस योजना के लिए पात्र थे, उन्हें चयनितों की सूची से बाहर कर दिया गया। सस्ते राशन से अब संपन्न लोगों के गोदाम भर रहे हैं और गरीब खाली पेट सो रहे हैं। इसी तरह समाजवादी योजना भी प्रभावशाली जनप्रतिनिधियों और उनके नाते-रिश्तेदारों तक सीमित रह गई। 

विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत जब उपलब्धियां गिनाने की बारी आती है तो आंकड़ों के साथ नेता और अफसर सबसे आगे खड़े दिखाई देते हैं। किस योजना के तहत कितने लोगों को लाभ मिला, इसका पूरा खाका हर समय तैयार रहता है लेकिन जब उनसे पूछा जाता है कि योजनाओं का फायदा पात्र लोगों को मिला या नहीं, अगर मिला तो उनके नाम बताएं, उनकी आर्थिक स्थिति का ब्यौरा दें तो नेता और अफसर भाग खड़े होते हैं।

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