समलैंगिक विवाह: SCBA ने की BCI के बयान की निंदा; 120 से ज्यादा पूर्व जजों-नौकरशाहों ने राष्ट्रपति को लिखा खत
एससीबीए ने कहा, यह कोर्ट का कर्तव्य है कि वह याचिका पर सुनवाई करे और यह तय करे कि क्या मामले को कोर्ट द्वारा तय किया जाना चाहिए या संसद के विवेक पर छोड़ दिया जाना चाहिए।
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सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक विवाह के मुद्दे पर चल रही सुनवाई को लेकर खूब चर्चा हो रही है। 23 अप्रैल को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने देश में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने का विरोध करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया और इसको लेकर एक बयान जारी किया। वहीं, शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) ने बीसीआई के बयान की निंदा की।
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने क्या कहा
एससीबीए ने कहा, यह कोर्ट का कर्तव्य है कि वह याचिका पर सुनवाई करे और यह तय करे कि क्या मामले को कोर्ट द्वारा तय किया जाना चाहिए या संसद के विवेक पर छोड़ दिया जाना चाहिए। इस प्रस्ताव का अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि हम सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित मामले में याचिकाकर्ता का समर्थन या विरोध कर रहे हैं।
प्रस्ताव पारित कर बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने यह कहा
बीसीआई के अध्यक्ष ममन कुमार मिश्रा ने कहा कि राज्य की सभी बार काउंसिल के प्रतिनिधियों के साथ बैठक के बाद प्रस्ताव पारित किया गया है। दस्तावेजी इतिहास के मुताबिक, मानव सभ्यता और संस्कृति के अस्तित्व के बाद से विवाह को आमतौर पर स्वीकार किया जाता है और यह एक बायोलॉजिकल पुरुष और महिला के प्रजनन और मनोरंजन के दोहरे उद्देश्य के लिए किया जाता है। ऐसी पृष्ठभूमि में किसी भी कानूनी अदालत द्वारा विवाह की अवधारणा के रूप में मौलिक चीज को बदलना विनाशकारी होगा, चाहे वह कितना भी अच्छा इरादा क्यों न हो।
'तो संस्कृति और सामाजिक-धार्मिक ढांचे के खिलाफ माना जाएगा...'
बार काउंसिल ने कहा, "सामाजिक और धार्मिक अर्थों से जुड़े मुद्दों को कोर्ट के द्वारा सम्मान के सिद्धांत के जरिए निपटाया जाना चाहिए। काउंसिल ने कहा कि विशाल बहुमत का मानना है कि इस मुद्दे पर याचिकाकर्ताओं के पक्ष में शीर्ष कोर्ट का कोई भी फैसला देश की संस्कृति और सामाजिक-धार्मिक ढांचे के खिलाफ माना जाएगा।"
संविधान पीठ ने 18 अप्रैल को शुरू की याचिकाओं पर सुनवाई
चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस रवींद्र भट, जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की संविधान पीठ 'एलजीबीटीक्यूआई+ समुदाय के लिए समलैंगिक विवाह का अधिकार' से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। संविधान पीठ ने 18 अप्रैल को याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की थी। समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की मांग करने वाली विभिन्न याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट विचार कर रहा है। केंद्र ने याचिकाओं का विरोध किया है।
पूर्व न्यायाधीशों ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को लिखा खुला खत
इस बीच, समलैंगिक विवाह के मुद्दे पर 120 से ज्यादा पूर्व न्यायाधीशों, पूर्व आईपीएस अधिकारियों और पूर्व नौकरशाहों के एक समूह ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक खुला खत लिखा है जिसमें उनसे भारत की सांस्कृतिक परंपराओं, धार्मिक सिद्धांतों और सामाजिक मूल्यों को बचाने के लिए हस्तक्षेप का अनुरोध किया गया है। पत्र में लिखा गया है, 'भारत यह बर्दाश्त नहीं कर सकता कि उसकी आने वाली पीढ़ियां ऐसे माहौल में रहें, जो और अधिक गे और लेस्बियन पैदा करे और परिवार व समाज की संस्थाओं को नष्ट कर दे। जहां वे अपने माता-पिता, पूर्वजों, संस्कृति, धार्मिक सिद्धांतों और सदियों पुराने मूल्यों के बारे में नहीं जानते होंगे।"
इसमें कहा गया है, यदि समलैंगिक यौन संबंधों को तर्कसंगत, स्वीकार्य या नैतिक बनाने के लिए कानून को संसोधित करते हैं, तो यह समलैंगिक यौन संस्कृति के दरवाजे खोल देगा। हमारा समाज और संस्कृति समलैंगिक व्यवहार को स्वीकार नहीं करती है, क्योंकि यह तर्कहीन और अप्राकृतिक होने के अलावा हमारे मूल्यों के लिए अपमानजनक है।