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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, 32 हफ्ते की गर्भवती लड़की का नहीं कराया जाएगा गर्भपात
amarujala.com-presented by: अभिषेक तिवारी
Updated Sat, 29 Jul 2017 09:22 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बड़ा फैसला लेते हुए कहा कि 32 हफ्ते की गर्भवती रेप पीड़िता बच्ची का गर्भपात नहीं कराया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका को ठुकराते हुए यह फैसला दिया।
मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह तर्क देते हुए याचिका ठुकराई कि 32 माह की गर्भवती लड़की को गर्भ गिराने की अनुमति नहीं दी सकती है। शीर्ष अदालत ने कहा गर्भपात से लड़की की जान को खतरा हो सकता है, इसलिए वह गर्भपात कराने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। बताते चलें कि इसके पहले कोर्ट मामले को संज्ञान में लेते हुए गर्भपात कराने के बारे में चंडीगढ़ पीजीआई से पूछा था।
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती देने हाई कोर्ट पहुंचे पूर्व जस्टिस कर्णन
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया है कि प्रत्येक राज्य में ऐसे मामलों में तत्परता से निर्णय लेने के लिए स्थाई मेडिकल बोर्ड गठित करे। गौरतलब है कि 18 जुलाई को चंडीगढ़ कोर्ट ने भी इस केस की याचिका खारिज की थी। जिसके बाद अधिवक्ता आलोक श्रीवास्तव ने मामले की याचिका सुप्रीम कोर्ट में की।
मालूम हो कि देश की अदालतों ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनैंसी ऐक्ट के तहत 20 हफ्ते के गर्भपात को इजाजत दे रखी है और साथ ही शर्त है कि पीड़ित महिला के गर्भ में पल रहा शिशु ठीक स्थिति में हो।
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SC turns down abortion plea of 10-year-old rape survivor, who is 32 weeks pregnant. pic.twitter.com/i62rkorwiV
— ANI (@ANI_news) July 28, 2017विज्ञापन
The Supreme Court rejected her plea and observed that it was too late for her to abort now.
— ANI (@ANI_news) July 28, 2017
मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह तर्क देते हुए याचिका ठुकराई कि 32 माह की गर्भवती लड़की को गर्भ गिराने की अनुमति नहीं दी सकती है। शीर्ष अदालत ने कहा गर्भपात से लड़की की जान को खतरा हो सकता है, इसलिए वह गर्भपात कराने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। बताते चलें कि इसके पहले कोर्ट मामले को संज्ञान में लेते हुए गर्भपात कराने के बारे में चंडीगढ़ पीजीआई से पूछा था।
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इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया है कि प्रत्येक राज्य में ऐसे मामलों में तत्परता से निर्णय लेने के लिए स्थाई मेडिकल बोर्ड गठित करे। गौरतलब है कि 18 जुलाई को चंडीगढ़ कोर्ट ने भी इस केस की याचिका खारिज की थी। जिसके बाद अधिवक्ता आलोक श्रीवास्तव ने मामले की याचिका सुप्रीम कोर्ट में की।
मालूम हो कि देश की अदालतों ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनैंसी ऐक्ट के तहत 20 हफ्ते के गर्भपात को इजाजत दे रखी है और साथ ही शर्त है कि पीड़ित महिला के गर्भ में पल रहा शिशु ठीक स्थिति में हो।