{"_id":"5d82a1fe8ebc3e93b31a60d7","slug":"sc-st-prevention-of-atrocities-act-supreme-court-reserved-verdict","type":"story","status":"publish","title_hn":"सुप्रीम कोर्ट ने की अपने फैसले की आलोचना, कहा- क्या संविधान की भावना के खिलाफ सुना सकते हैं फैसला","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
सुप्रीम कोर्ट ने की अपने फैसले की आलोचना, कहा- क्या संविधान की भावना के खिलाफ सुना सकते हैं फैसला
Thu, 19 Sep 2019 03:00 AM IST
देव कश्यप
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: देव कश्यप
Updated Thu, 19 Sep 2019 03:00 AM IST
विज्ञापन
Supreme court
- फोटो : PTI
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति/जनजाति कानून के तहत गिरफ्तारी के प्रावधानों को कमजोर करने के दो जजों की पीठ के फैसले की आलोचना करते हुए केंद्र की पुनर्विचार याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया। कोर्ट ने पूछा कि क्या संविधान की भावना के खिलाफ कोई फैसला सुनाया जा सकता है?
विज्ञापन
जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने 20 मार्च, 2018 के फैसले को लेकर केंद्र की अर्जी पर सभी पक्षों से अगले हफ्ते तक लिखित दलीलें पेश करने को कहा। पीठ ने कहा कि एससी/एसटी वर्ग के लोग आजादी के 70 साल बाद भी भेदभाव के शिकार हैं। सरकार एससी-एसटी समुदायों का संरक्षण नहीं कर सकी। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह कानून के अनुसार समानता लाने के लिए दिशानिर्देश जारी करेगी।
विज्ञापन
दरअसल, 2018 के फैसले में दो जजों की पीठ ने निर्देश दिया था कि, डीएसपी स्तर का अधिकारी इसकी प्रारंभिक जांच करे कि एससी/एसटी कानून के तहत आरोप उचित हैं या नहीं। पीठ ने कहा कि सामान्य श्रेणी का व्यक्ति पुलिस के पास जाता है, तो शिकायत दर्ज की जाएगी, लेकिन एससी-एसटी समुदाय के लोगों के मामले में कहा जाएगा कि पहले जांच जरूरी है। क्या यह सोच-विचार कर दिया गया फैसला है? केंद्र की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा, 2018 का फैसला संविधान के अनुरूप नहीं था।
विज्ञापन
पीठ ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम में किये गये नये संशोधनों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 25 सितंबर को सुनवाई की जाएगी।
बता दें कि, शीर्ष अदालत ने केंद्र की याचिका को 13 सितंबर को तीन जजों की पीठ को भेज दिया था। केंद्र ने करीब 18 महीने पहले याचिका दाखिल की थी और शीर्ष अदालत के उस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की थी, जिसमें एससी-एसटी कानून के तहत गिरफ्तारी के प्रावधानों को एक तरह से हल्का कर दिया गया था।
शीर्ष अदालत के पिछले साल 20 मार्च के फैसले के बाद देशभर में एससी और एसटी समुदाय के लोगों ने व्यापक प्रदर्शन किये थे, जिसके बाद संसद ने शीर्ष अदालत के फैसले के प्रभाव को खत्म करने के लिए कानून पारित किया।