फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   SC says Right to property is human right, one cannot be evicted from property without giving compensation

Supreme Court: 'मुआवजा दिये बिना जायदाद से नहीं किया जा सकता बेदखल', 22 साल इंतजार के बाद भूमि मालिकों को राहत

Fri, 03 Jan 2025 01:28 AM IST
शिव शुक्ला अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: शिव शुक्ला Updated Fri, 03 Jan 2025 01:28 AM IST
सार

शीर्ष अदालत ने अनुच्छेद-142 के तहत पूर्ण न्याय करने के अपने असाधारण अधिकार का प्रयोग करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट का वह फैसला खारिज कर दिया, जिसमें उच्च न्यायालय ने जमीन मालिकों की बाजार दर से मुआवजा तय करने की मांग खारिज कर दी थी। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने विशेष भूमि अधिकारी को 22 अप्रैल, 2019 के बाजार मूल्य के हिसाब से दो महीने में नया मुआवजा पारित करने का निर्देश दिया है।

विज्ञापन
SC says Right to property is human right, one cannot be evicted from property without giving compensation
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

अफसरों के सुस्त रवैये के कारण 22 साल से मुआवजे का इंतजार कर रहे भूमि मालिकों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि कल्याणकारी राज्य में संपत्ति का अधिकार मानवाधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 300-ए के तहत यह सांविधानिक अधिकार है और किसी व्यक्ति को तत्परता से मुआवजा दिए बिना उसकी संपत्ति से बेदखल नहीं किया जा सकता है।

विज्ञापन


शीर्ष अदालत ने 2003 के इस मामले में भूमि मालिकों को 2019 के बाजार मूल्य के हिसाब से मूल्य निर्धारित करते हुए मुआवजा देने का निर्देश देते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया। कर्नाटक औद्योगिक क्षेत्र विकास बोर्ड ने अपीलकर्ताओं की भूमि पर कब्जा 22 नवंबर, 2005 को ही कर लिया था, पर आज तक मुआवजा नहीं दिया।
विज्ञापन


जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने कर्नाटक सरकार के प्राधिकरण की इस बात पर आलोचना - की कि अधिकारियों की गहरी नींद और सुस्त रवैये के कारण अधिग्रहित जमीन के मालिकों को इतने साल बिना मुआवजे के रहना पड़ा। अपीलकर्ताओं की भूमि पर कब्जा लेने के बाद अथॉरिटी ने इसे नंदी इन्फ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर एंटरप्राइजेज और उसकी सहयोगी कंपनी नंदी इकोनॉमिक कॉरिडोर एंटरप्राइजेज लि. को सौंप दिया, पर ऐसे अधिग्रहणों के लिए तत्काल कोई मुआवजा पारित नहीं किया।
विज्ञापन
विज्ञापन


यह जमीन बंगलूरू-मैसूरू को जोड़ने वाली इन्फ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर परियोजना के लिए अधिग्रहित की गई थी। इस मामले में अपीलकर्ताओं ने कर्नाटक हाईकोर्ट का रुख किया और तत्कालीन बाजार मूल्य के आधार पर मुआवजा निर्धारित करने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी, तो पीड़ित सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे।

मुआवजा निर्धारण की तारीख नहीं बदलते तो इन्साफ का मखौल उड़ता

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा, राज्य 2003 से 2019 तक गहरी नींद में था। अवमानना कार्यवाही में नोटिस जारी होने के बाद पहली बार कार्रवाई की। अधिकार न होने के बावजूद विशेष भूमि अधिग्रहण अधिकारी (एसएलएओ) ने बाजार मूल्य के निर्धारण की तारीख बदली, जो सही कदम था। अगर मुआवजा 2003 के बाजार मूल्य पर देने की अनुमति दी जाती है, तो यह न्याय व अनुच्छेद 300-ए के तहत कानून के अधिकार के बिना संपत्ति से वंचित करने के हक के सांविधानिक प्रावधानों का मखौल उड़ाने के समान होगा।
  • इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि पैसा ही वह चीज है, जो पैसा खरीदता है। पैसे का मूल्य इस विचार पर आधारित है कि उसे रिटर्न कमाने के लिए निवेश किया जा सकता है और मुद्रास्फीति के कारण समय के साथ पैसे की क्रय शक्ति कम हो जाती है।
  • पीठ ने कहा, अपीलकर्ता 2003 में मुआवजे से जो कुछ खरीद सकते थे, वह 2025 में नहीं खरीद सकते। इसलिए यह बेहद अहम है कि भूमि अधिग्रहण में मुआवजा निर्धारण और वितरण तत्परता से किया जाना चाहिए।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed