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अदालतें विधायिका के कामों में दखल न दें : सुप्रीम कोर्ट

Wed, 08 Feb 2017 10:30 PM IST
राजीव सिन्हा/ नई दिल्ली
राजीव सिन्हा/ नई दिल्ली Updated Wed, 08 Feb 2017 10:30 PM IST
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sc says court do not interfere in Legislatures work
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : file photo

न्यायालय को अपने दायरे में रहने की हिदायत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को दरकिनार कर दिया, जिसमें राज्य सरकार को हिमाचल प्रदेश टिनेंसी एंड लैंड रिफार्म एक्ट, 1972 में संशोधन करने के लिए कहा गया था।

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हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को एक्ट में बदलाव कर राज्य में वर्ष 1972 से पहले से रहने वालों को खेतिहर और गैर खेतिहर जमीनों को खरीदने की इजाजत देने के लिए कहा था। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को दोषपूर्ण बताते हुए कहा कि अदालत को विधायिका के कामों में दखल नहीं देना चाहिए। 
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न्यायमूर्ति अभय मोहन सप्रे और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले को दोषपूर्ण बताते हुए कहा कि कानून बनाना विधायिका का काम है। इसमें न्यायालय को दखल नहीं देना चाहिए। पीठ ने कहा कि न्यायपालिका, लोकतंत्र के तीन स्तंभों में से एक है। दो अन्य स्तंभ कार्यपालिका और विधायिका हैं। तीनों ही स्तंभ बराबर हैं।
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सभी स्तंभों के अपने-अपने दायरे हैं और सभी के लिए काम निर्धारित है। न्यायपालिका का काम यह सुनिश्चित करना है कि कार्यपालिका का कोई भी काम संविधान या कानून के अनुरूप हो। 

सुप्रीम कोर्ट ने दरकिनार किया हाईकोर्ट का फैसला

sc says court do not interfere in Legislatures work
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : file photo

पीठ ने कहा कि न्यायपालिका कोई नीति नहीं बनाती और न ही वह यह कहती है कि किसी खास नीति को पालन करना चाहिए। नीतियां या कानून बनाने का काम विधायिका का है। अदालत सरकार को यह नहीं कह सकती है वह यह कानून बनाए या कानून में ये संशोधन करें।

शीर्ष अदालत ने ये टिप्पणी करते हुए हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा गत वर्ष 23 सितंबर को दिए फैसले को दरकिनार कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में राज्य सरकार को हिमाचल प्रदेश टिनेंसी एंड लैंड रिफार्म एक्ट, 1972 की धारा-118 में बदलाव कर वर्ष 1972 से पहले से रहने वालों को खेतिहर और गैर खेतिहर जमीनों को खरीदने की इजाजत देने के लिए कहा था।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि हिमाचल में गैर-कृषक खुद को अलग महसूस करते हैं। गैर कृषक भी राज्य के अहम हिस्सा हैं। उन्हें भी ऐसा लगना चाहिए कि वह भी राज्य के निवासी हैं। हाईकोर्ट ने सरकार को 90 दिनों के भीतर एक्ट में संशोधन करने के लिए कहा था। हाईकोर्ट के इस फैसले को राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

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