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Supreme Court: 21 हाईकोर्ट जजों की नियुक्ति में देरी पर अदालत ने नाराजगी जताई, कहा- 'पसंद का चयन' बड़ी समस्या
Fri, 20 Oct 2023 09:52 PM IST
ज्योति भास्कर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Fri, 20 Oct 2023 09:52 PM IST
सार
उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण के मुद्दे पर अहम टिप्पणी की है। कॉलेजियम की सिफारिश वाले 21 नामों को लेकर नियुक्ति संबंधी अधिसूचना जारी न होने पर शीर्ष अदालत ने आपत्ति जताई।
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supreme court
- फोटो : ANI
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विस्तार
उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण में देरी पर नाराजगी जताई है। केंद्र सरकार की खिंचाई करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा, कॉलेजियम 21 नामों की अनुशंसा कर चुकी है, लेकिन 21 नामों की नियुक्ति संबंधी प्रक्रिया लंबित है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा कि पसंद के नाम चुनने की उसकी प्रवृत्ति बहुत समस्याएं पैदा कर रही है।
शुक्रवार को न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने केंद्र से कहा कि मौजूदा स्थिति के अनुसार, कॉलेजियम की सिफारिश वाले पांच नाम ऐसे हैं, जिन्हें दूसरी बार भेजा गया है। पांच नामों की अनुशंसा पहली बार हुई है। 11 हाईकोर्ट जजों के नाम तबादलों वाले हैं, जो सरकार के पास लंबित हैं।
शीर्ष अदालत ने कहा कि नियुक्ति प्रक्रिया में, जब सरकार किसी को नियुक्त करती है और दूसरों को नियुक्त नहीं करती है, तो "वरिष्ठता का आधार ही गड़बड़ा जाता है।" न्यायमूर्ति कौल ने कहा, "अपनी पसंद के नाम चुनना (pick and choose) बहुत सारी समस्याएं पैदा करता है।" बता दें कि जस्टिस कौल शीर्ष अदालत की कॉलेजियम के सदस्य भी हैं।
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सुनवाई के दौरान केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से दो सप्ताह का समय देने का अनुरोध किया। सरकार ने शीर्ष अदालत को बताया कि नियुक्ति संबंधी प्रक्रिया चल रही है। बता दें कि अदालत दो याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई कर रही थी। इसमें न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण के लिए कॉलेजियम द्वारा अनुशंसित नामों को मंजूरी देने में केंद्र सरकार पर जानबूझकर देरी करने का आरोप लगाया गया था।
तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि नियुक्ति प्रक्रिया परामर्शात्मक है, लेकिन तबादलों के मामले में जिस व्यक्ति के नाम की सिफारिश की गई है वह पहले से ही एक न्यायाधीश है। कॉलेजियम के पांच वरिष्ठ न्यायाधीशों के विवेक के आधार पर उससे किसी अन्य अदालत में बेहतर सेवा करने की अपेक्षा की जाती है। ऐसे में यह धारणा नहीं बननी चाहिए कि 'किसी' के लिए देरी हो रही है, जबकि कई नामों की सिफारिश के बाद नियुक्ति में कोई देरी नहीं हो रही।
न्यायमूर्ति कौल ने कहा, "मुझे इस बात की सराहना करनी चाहिए कि पिछले एक महीने में नियुक्ति प्रक्रिया में काफी तेजी दिखी है। ये कुछ ऐसा है जो पिछले पांच-छह महीनों में नहीं हुआ।" उन्होंने कहा, "नियुक्ति प्रक्रिया में, जब आप कुछ लोगों को नियुक्त करते हैं और दूसरों को नियुक्त नहीं करते हैं, तो वरिष्ठता का आधार ही गड़बड़ा जाता है।"
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत की पीठ में शामिल होने का प्रोत्साहन बदल जाता है जब नियुक्ति की प्रक्रिया में देरी होती है। कोई व्यक्ति नियुक्ति के बाद कार्यभार संभाल लेता है या छोड़ देता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह वरिष्ठता क्रम में कहां खड़ा होगा।
याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश वकील ने कहा, जहां तक दोहराए गए नामों का सवाल है, शीर्ष अदालत नामों को मंजूरी देने की समयसीमा पहले ही तय कर चुकी है। इस पर पीठ ने केंद्र के वकील से कहा, "स्थानांतरण के मामले में मुद्दे को उस स्तर पर न ले जाएं जहां हमें यह कहना पड़े कि क्या उन्हें (स्थानांतरण के लिए अनुशंसित न्यायाधीशों को) वर्तमान अदालतों में अपना कार्य करना चाहिए या किसी दूसरी अदालत में कार्य नहीं करना चाहिए।"
केंद्र के वकील ने जब प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा तो सुप्रीम कोर्ट में तीन जजों की पीठ ने कहा, ''जो किया गया है उसकी हम सराहना करते हैं लेकिन और अधिक प्रयास करना जरूरी है।'' याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ताओं में से एक ने नियुक्ति और तबादलों के लिए कॉलेजियम की सिफारिशों के संबंध में केंद्र की तरफ से 'पसंद का चयन' (pick and choose) जैसी कवायद की निंदा की। इस पर अदालत ने स्वीकार किया, "यह परेशानी भरा है।"
पीठ ने केंद्र सरकार के वकील से कहा, ''विचार आपको यह बताने का है कि ऐसा नहीं होना चाहिए।'' अदालत ने कहा कि प्रक्रिया में देरी के कारण कुछ लोगों ने हताश होकर न्यायाधीश पद पर पदोन्नति ठुकरा कर अपने नाम वापस ले लिए हैं। न्यायमूर्ति कौल ने कहा, "हमने अच्छे लोगों को खो दिया है। मैं कहता रहता हूं कि इन दिनों लोगों को न्यायपालिका में जस्टिस पद तक लाना एक चुनौती है। ऐसे हालात में अगर 'पसंद के नाम चुनने' जैसी चीजें भी हों तो लोगों को न्यायाधीश का पद संभालने के लिए राजी करना बड़ी चुनौती बन जाती है।"
पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 7 नवंबर को तय की। अदालत ने कहा कि केंद्र के वकील ने आश्वासन दिया है कि इन मुद्दों को सुलझाया जा रहा है। ऐसे में अदालत दिवाली से पहले कुछ प्रगति की उम्मीद करता है। हम इस बार दीपावली बेहतर तरीके से मनाएंगे।
गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से कॉलेजियम प्रणाली के माध्यम से न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर अक्सर सुप्रीम कोर्ट और केंद्र के बीच कथित टकराव का मुद्दा सुर्खियां बटोर रहा है। इस तंत्र की विभिन्न क्षेत्रों से आलोचना हो रही है।
शीर्ष अदालत में तीन जजों की पीठ उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें एडवोकेट एसोसिएशन बेंगलुरु ने भी एक याचिका दायर की है। इसमें 2021 के फैसले में अदालत की तरफ से निर्धारित समय-सीमा का पालन नहीं करने के लिए केंद्रीय कानून और न्याय मंत्रालय के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की मांग की गई थी।
शीर्ष अदालत ने नियुक्ति में देरी को लेकर दायर याचिकाओं में से एक में निर्धारित समय सीमा की "जानबूझकर अवज्ञा" करने का आरोप लगाया गया है। उस आदेश में शीर्ष अदालत ने कहा था कि अगर कॉलेजियम सर्वसम्मति से अपनी सिफारिशें दोहराता है तो केंद्र को तीन-चार सप्ताह के भीतर न्यायाधीशों की नियुक्ति करनी चाहिए।
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शुक्रवार को न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने केंद्र से कहा कि मौजूदा स्थिति के अनुसार, कॉलेजियम की सिफारिश वाले पांच नाम ऐसे हैं, जिन्हें दूसरी बार भेजा गया है। पांच नामों की अनुशंसा पहली बार हुई है। 11 हाईकोर्ट जजों के नाम तबादलों वाले हैं, जो सरकार के पास लंबित हैं।
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शीर्ष अदालत ने कहा कि नियुक्ति प्रक्रिया में, जब सरकार किसी को नियुक्त करती है और दूसरों को नियुक्त नहीं करती है, तो "वरिष्ठता का आधार ही गड़बड़ा जाता है।" न्यायमूर्ति कौल ने कहा, "अपनी पसंद के नाम चुनना (pick and choose) बहुत सारी समस्याएं पैदा करता है।" बता दें कि जस्टिस कौल शीर्ष अदालत की कॉलेजियम के सदस्य भी हैं।
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सुनवाई के दौरान केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से दो सप्ताह का समय देने का अनुरोध किया। सरकार ने शीर्ष अदालत को बताया कि नियुक्ति संबंधी प्रक्रिया चल रही है। बता दें कि अदालत दो याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई कर रही थी। इसमें न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण के लिए कॉलेजियम द्वारा अनुशंसित नामों को मंजूरी देने में केंद्र सरकार पर जानबूझकर देरी करने का आरोप लगाया गया था।
तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि नियुक्ति प्रक्रिया परामर्शात्मक है, लेकिन तबादलों के मामले में जिस व्यक्ति के नाम की सिफारिश की गई है वह पहले से ही एक न्यायाधीश है। कॉलेजियम के पांच वरिष्ठ न्यायाधीशों के विवेक के आधार पर उससे किसी अन्य अदालत में बेहतर सेवा करने की अपेक्षा की जाती है। ऐसे में यह धारणा नहीं बननी चाहिए कि 'किसी' के लिए देरी हो रही है, जबकि कई नामों की सिफारिश के बाद नियुक्ति में कोई देरी नहीं हो रही।
न्यायमूर्ति कौल ने कहा, "मुझे इस बात की सराहना करनी चाहिए कि पिछले एक महीने में नियुक्ति प्रक्रिया में काफी तेजी दिखी है। ये कुछ ऐसा है जो पिछले पांच-छह महीनों में नहीं हुआ।" उन्होंने कहा, "नियुक्ति प्रक्रिया में, जब आप कुछ लोगों को नियुक्त करते हैं और दूसरों को नियुक्त नहीं करते हैं, तो वरिष्ठता का आधार ही गड़बड़ा जाता है।"
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत की पीठ में शामिल होने का प्रोत्साहन बदल जाता है जब नियुक्ति की प्रक्रिया में देरी होती है। कोई व्यक्ति नियुक्ति के बाद कार्यभार संभाल लेता है या छोड़ देता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह वरिष्ठता क्रम में कहां खड़ा होगा।
याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश वकील ने कहा, जहां तक दोहराए गए नामों का सवाल है, शीर्ष अदालत नामों को मंजूरी देने की समयसीमा पहले ही तय कर चुकी है। इस पर पीठ ने केंद्र के वकील से कहा, "स्थानांतरण के मामले में मुद्दे को उस स्तर पर न ले जाएं जहां हमें यह कहना पड़े कि क्या उन्हें (स्थानांतरण के लिए अनुशंसित न्यायाधीशों को) वर्तमान अदालतों में अपना कार्य करना चाहिए या किसी दूसरी अदालत में कार्य नहीं करना चाहिए।"
केंद्र के वकील ने जब प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा तो सुप्रीम कोर्ट में तीन जजों की पीठ ने कहा, ''जो किया गया है उसकी हम सराहना करते हैं लेकिन और अधिक प्रयास करना जरूरी है।'' याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ताओं में से एक ने नियुक्ति और तबादलों के लिए कॉलेजियम की सिफारिशों के संबंध में केंद्र की तरफ से 'पसंद का चयन' (pick and choose) जैसी कवायद की निंदा की। इस पर अदालत ने स्वीकार किया, "यह परेशानी भरा है।"
पीठ ने केंद्र सरकार के वकील से कहा, ''विचार आपको यह बताने का है कि ऐसा नहीं होना चाहिए।'' अदालत ने कहा कि प्रक्रिया में देरी के कारण कुछ लोगों ने हताश होकर न्यायाधीश पद पर पदोन्नति ठुकरा कर अपने नाम वापस ले लिए हैं। न्यायमूर्ति कौल ने कहा, "हमने अच्छे लोगों को खो दिया है। मैं कहता रहता हूं कि इन दिनों लोगों को न्यायपालिका में जस्टिस पद तक लाना एक चुनौती है। ऐसे हालात में अगर 'पसंद के नाम चुनने' जैसी चीजें भी हों तो लोगों को न्यायाधीश का पद संभालने के लिए राजी करना बड़ी चुनौती बन जाती है।"
पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 7 नवंबर को तय की। अदालत ने कहा कि केंद्र के वकील ने आश्वासन दिया है कि इन मुद्दों को सुलझाया जा रहा है। ऐसे में अदालत दिवाली से पहले कुछ प्रगति की उम्मीद करता है। हम इस बार दीपावली बेहतर तरीके से मनाएंगे।
गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से कॉलेजियम प्रणाली के माध्यम से न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर अक्सर सुप्रीम कोर्ट और केंद्र के बीच कथित टकराव का मुद्दा सुर्खियां बटोर रहा है। इस तंत्र की विभिन्न क्षेत्रों से आलोचना हो रही है।
शीर्ष अदालत में तीन जजों की पीठ उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें एडवोकेट एसोसिएशन बेंगलुरु ने भी एक याचिका दायर की है। इसमें 2021 के फैसले में अदालत की तरफ से निर्धारित समय-सीमा का पालन नहीं करने के लिए केंद्रीय कानून और न्याय मंत्रालय के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की मांग की गई थी।
शीर्ष अदालत ने नियुक्ति में देरी को लेकर दायर याचिकाओं में से एक में निर्धारित समय सीमा की "जानबूझकर अवज्ञा" करने का आरोप लगाया गया है। उस आदेश में शीर्ष अदालत ने कहा था कि अगर कॉलेजियम सर्वसम्मति से अपनी सिफारिशें दोहराता है तो केंद्र को तीन-चार सप्ताह के भीतर न्यायाधीशों की नियुक्ति करनी चाहिए।