अब बिना बिजली के चलेंगे आरओ सिस्टम, पानी की एक भी बूंद नहीं होगी बेकार
- आईआईटी दिल्ली के वैज्ञानिकों ने किया नई तकनीकी का आविष्कार
- बिजली की कमी वाले दूर-दराज के गांवों, पहाड़ी क्षेत्रों के लिए बेहद कारगर होगी नई तकनीकी
- फिल्ट्रेशन में नष्ट नहीं होंगे शरीर के लिए जरूरी मिनरल्स
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विस्तार
पानी की अशुद्धियों को साफ कर उसे पीने योग्य बनाने वाले आरओ सिस्टम अब हमारे घरों के आवश्यक अंग बन गये हैं। बिना फिल्टर किये हुए पानी को पीना हम बीमारी को न्योता देने जैसा समझने लगे हैं।
यही कारण है कि अब हमारे घरों में आरओ सिस्टम लगातार काम करते रहते हैं। बिजली से चलने वाले ये सिस्टम भारी मात्रा में बिजली की खपत करते हैं और हमारा खर्च बढ़ाते हैं। लेकिन आईआईटी दिल्ली के वैज्ञानिकों ने ऐसी तरकीब इजाद कर ली है जिससे अब आरओ सिस्टम बिना बिजली के चल सकेंगे।
इससे भारी मात्रा में बिजली की बचत होने का अनुमान लगाया जा रहा है। नई तकनीकी में महत्त्वपूर्ण बात यह भी है इसमें फिल्ट्रेशन के दौरान वे महत्त्वपूर्ण मिनरल नष्ट नहीं होंगे जिनकी आवश्यकता हमारे शरीर को होती है, जबकि मौजूदा आरओ सिस्टम में फिल्ट्रेशन के दौरान सभी मिनरल्स भी छन जाते हैं जिसका दुष्प्रभाव हमारे शरीर पर पड़ता है।
अभी सामान्य आर ओ सिस्टम की एक बड़ी खामी यह है कि इसमें पानी साफ करने के दौरान भारी मात्रा में पानी बेकार बह जाता है। एक अनुमान के मुताबिक 10 लीटर पानी साफ करने में लगभग पांच लीटर पानी बेकार चला जाता है। पर्यावरण संरक्षण कार्यकर्ताओं ने इसके प्रति गम्भीर चिंता जताई है। लेकिन इस नई तकनीक से फिल्ट्रेशन के दौरान पानी की एक भी बून्द बेकार नहीं जाएगी।
कैसे काम करेगा नया आरओ सिस्टम
आईआईटी दिल्ली के शोध छात्र राहुल गडकरी ने अमर उजाला को बताया कि अभी तक के आरओ सिस्टम अल्ट्रा वायलेट किरणों के जरिये जल में मौजूद बैक्टीरिया को मारते हैं। ऐसा करने के दौरान लगातार बिजली की सप्लाई की आवश्यकता होती है। बिजली आपूर्ति में बाधा होने पर फिल्ट्रेशन रुक जाता है और हमें स्वच्छ पानी मिलना बंद हो जाता है। लेकिन नई तकनीकी में पानी को केशिकात्व (Capillary Effect) के भौतिकी सिद्धांत के जरिये स्वच्छ बनाया जायेगा। इस तकनीकी से जल को स्वच्छ बनाने में बिजली की कोई आवश्यकता नहीं होगी। (केशिकात्व या Capillary Action भौतिक शास्त्र का वह सिद्धांत है जिसके अनुसार दीपक की बाती में तेल बिना किसी सहायता के लगातार ऊपर चढ़ता रहता है। इसके लिए वह बाती बनाने में प्रयुक्त धागों के बीच बनी बेहद पतली नलिकाओं का उपयोग करता है।)
प्रथम चरण
नई तकनीकी के पहले चरण में अशुद्ध जल आरओ सिस्टम के ऊपरी हिस्से में डाला जायेगा। इसके बाद एक विशेष फाइबर के बने कपड़ों के धागों के बीच बनी बेहद पतली नलिकाओं के जरिये जल दूसरे हिस्से में पास किया जायेगा। इस प्रक्रिया के दौरान जल की भारी अशुद्धियां, सॉलिड सस्पेंडेड पार्टिकल जल से दूर हो जाएंगे। इन नलिकाओं से जल के महीन कण ही पास हो सकेंगे और भारी अशुद्धियां इस दौरान धागों में ही फंसकर रुक जाएंगी। लेकिन इस चरण में महीन बैक्टीरिया भी जल के साथ-साथ आगे चले जायेंगे। इन्हें अगले चरण में शुद्ध किया जायेगा।
द्वितीय चरण
फिल्ट्रेशन के दूसरे चरण में पानी को एक विशेष तकनीकी से बने नैनो फाइबर से होकर गुजारा जायेगा। इन फाइबर को बनाने में ऐसे रासायनिक पदार्थों का उपयोग किया गया है जिनके संपर्क में आते ही बैक्टीरिया भी नष्ट हो जायेंगे। अभी तक के सामान्य आरओ में अल्ट्रा वायलेट किरणों के जरिये बैक्टीरिया तो नष्ट हो जाते हैं लेकिन उनके शरीर जल में ही मौजूद रह जाते हैं जिन्हें हम पी जाते हैं। लेकिन नई तकनीकी में बैक्टीरिया के बेहद महीन शरीर भी नैनो फाइबर में फंसकर रह जायेंगे और पीने के लिए निकला पानी बिलकुल शुद्ध होगा। इस चरण में प्रयुक्त नैनो फाइबर में ऐसे विशेष पदार्थों का उपयोग किया गया है जो जल में मौजूद हैवी मेटल्स को रासायनिक क्रिया के जरिये लवण में तब्दील कर देंगे। इस प्रकार आगे निकला जल बैक्टीरिया और हैवी मेटल जैसी अशुद्धियों से पूरी तरह मुक्त होगा, जबकि इनमें शरीर के लिए आवश्यक मिनरल ज्यों के त्यों मौजूद रह जायेंगे।
सामान्य घर से लेकर बड़े गांव तक की आवश्यकता पूरी करने में सक्षम
राहुल गडकरी ने बताया कि इस तकनीकी के छोटे मॉडल से एक घर के चार से छ: लोगों के परिवार को लगातार शुद्ध पानी उपलब्ध कराया जा सकता है। जबकि इसी तकनीकी के विशेष मॉडल किसी गांव की जल आपूर्ति को सुनिश्चित कर सकते हैं। यानी इस तरह एक परिवार से लेकर किसी बड़ी कम्पनी के सैकड़ों कर्मचारियों या एक गांव के लोगों को भी लगातार स्वच्छ जलापूर्ति की जा सकती है।
आज के आरओ से किस प्रकार बेहतर
आज के आरओ सिस्टम चलने के लिए पूरी तरह बिजली पर निर्भर करते हैं, लेकिन नया आरओ सिस्टम पानी को साफ़ करने के लिए केशिकात्व सिद्धांत का उपयोग करता है जिसके लिए बिजली की कोई आवश्यकता नहीं रहती।
अभी के आरओ सिस्टम को समय-समय पर टेक्नीशियन से साफ़ करवाना पड़ता है। इसमें असुविधा के साथ-साथ खर्च भी करना पड़ता है। लेकिन नई तकनीकी में केवल एक फाइबर की प्लेट को समय-समय पर बदलना पड़ेगा। इसे कोई सामान्य गृहिणी भी आसानी से कर लेगी।
नये आरओ सिस्टम को दूर-दराज गांवों और पहाड़ी क्षेत्रों में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा जहां बिजली की आपूर्ति सामान्य नहीं रहती।
इस टीम ने किया ये कमाल
इस नई तकनीक का विकास करने के लिए आईआईटी दिल्ली के शोध छात्र राहुल गडकरी ने बड़ी भूमिका निभाई है। इस तकनीकी के विकास में उनके गाइड असिस्टेंट प्रोफेसर वाजिद अली ने उनका मार्गदर्शन किया है। इनके आलावा प्रोफेसर अपूर्वदास और प्रोफेसर अलागिरू स्वामी ने भी तकनीकी के विकास में विशेष योगदान दिया है। तकनीक के पेटेंट के लिए आवेदन किया जा चुका है।