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जब फैज के लिए डेढ़ घंटे रोकी गई ट्रेन!

Mon, 13 Feb 2017 12:05 PM IST
रेहान फ़ज़ल, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
रेहान फ़ज़ल, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली Updated Mon, 13 Feb 2017 12:05 PM IST
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Remembering Faiz Ahmed Faiz On His Birth Anniversary
फैज अहमद फैज
25 अप्रैल, 1981 का दिन था, ऐसा लग रहा था कि इलाहाबाद शहर का हर रिक्शा, तांगा और स्कूटर इलाहाबाद विश्वविद्यालय की ओर चला जा रहा है। मशहूर सीनेट हॉल के सामने फैज अहमद फैज को सुनने के लिए हजारों लोग जमा थे। उनमें से एक थे मशहूर लेखक रवींद्र कालिया।
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कालिया उस दिन को याद करते हुए कहते हैं, ''उस दिन मुशायरे की सदारत कर रही थीं महादेवी वर्मा। फिराक गोरखपुरी बीमार थे। इसलिए उन्हें गोद में उठाकर मंच पर बैठाया गया था। उनके साथ बैठे थे उपेंद्रनाथ अश्क, प्रोफेसर अकील रिजवी और डॉक्टर मोहम्मद हसन।
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फैज ने अपने भाषण में कहा था, मेरा दुनिया को सिर्फ यही संदेश है...इश्क करिए। फिराक साहब एक टक फैज को देखे जा रहे थे। तभी डॉक्टर हसन ने फिराक का मशहूर मिसरा पढ़ा था- ''आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हमअसरों, जब उनको ये ध्यान आएगा तुमने फिराक को देखा है।'' फिर उन्होंने इसकी तरमीम करते हुए कहा था कि आने वाली नस्लें आप पर रश्क करेंगी जब उन्हें पता चलेगा कि आपने फैज, फिराक और महादेवी को एक ही मंच पर देखा था।''
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अगले दिन हिंदी अकादमी के कार्यक्रम में 22 साल की एक युवती ने फैज के सामने उनकी ही गजल गाई थी। उस लड़की का नाम था शुभा गुप्ता जिन्हें आज लोग शुभा मुद्गल के नाम से जानते हैं। शुभा बताती हैं, ''इलाहाबाद विश्वविद्यालय की एक छात्रा फैज के सामने उनकी ही एक गजल गाने वाली थीं और उसकी तैयारी मेरे गुरु रामाश्रय झा को सौंपी गई थी। अचानक मेरे घर के दरवाजे की घंटी बजी तो देखा कि सामने गुरुजी खड़े हैं. उन्होंने छूटते ही कहा कि मेरे साथ चलो।'' शुभा आगे का वाकया बताती हैं, ''वो मोपेड चलाते थे। मैं उनके पीछे की गद्दी पर बैठकर हिंदी अकादमी पहुंची। वहां उन्होंने बताया कि वह छात्रा गजल नहीं गा पा रही है। तुम्हें फैज की गजल पढ़नी है 'शामे फिराक अब न पूछ', मैंने कहा कि वो गजल तो याद ही नहीं है मुझे। उन्होंने कहा कि अपने पिताजी से पूछकर लिख लो. कापी का एक पेज फाड़कर वो गजल मैंने लिखी और कांपती आवाज में बड़े संकोच के साथ फैज के सामने इसे पढ़ा।''

जब उधार के पैसे की अंगूठी पहनाई फैज ने

Remembering Faiz Ahmed Faiz On His Birth Anniversary
फैज अहमद फैज

फिर क्या हुआ, शुभा कहती हैं, ''फैज साहब बड़े उदार थे। कहने लगे तुम्हारे हाथ में क्या है। मैं उसे छिपाने की कोशिश कर रही थी। लेकिन जब उन्होंने पूछ ही लिया तो मुझे कॉपी का वो पेज दिखाना ही पड़ा। उसे देखकर उन्होंने पूछा कि तुम्हें उर्दू नहीं आती? मैंने कहा- उर्दू सीखी नहीं है इसलिए मैंने इसे देवनागरी में लिखा है। फैज ने कहा तुम्हारे तलफ्फुज से तो नहीं लगा कि तुम्हें उर्दू नहीं आती। फिर उन्होंने उस कागज पर अपने ऑटोग्राफ दिए। मैं हक्की-बक्की देखती रह गई कि मुझ जैसी नौसीखिया छात्रा से फैज इतने प्रेम और स्नेह से बात कर रहे थे।''

फैज को इलाहाबाद से दिल्ली रवाना होना था। उनकी ट्रेन आधी रात को आनी थी। फैज ने अपने मेजबान डीपी त्रिपाठी से कहा, ''बरखुद्दार ट्रेन लेट करा दो, हमें सादिका शरन से मिलना है।''
डीपी त्रिपाठी को फैज की वह मांग अभी तक याद है, ''ये अजीब-सी मांग थी और ट्रेन छूटने से कुछ मिनट पहले आई थी। खैर, फैज साहब को न कहने का तो सवाल ही नहीं उठता था। हमने रेलवे स्टेशन पहुंचकर स्टेशन मास्टर से विनती की लेकिन उसने ट्रेन रोकने से साफ इनकार कर दिया। हम उनको मनाने की कोशिश करते रहे लेकिन हमारी सारी कोशिशें नाकाम हुईं।

त्रिपाठी कहते हैं, ''तब हमने उन्हें आखिरी चेतावनी दी...अगर आपने ऐसा नहीं किया तो हम सब छात्र रेलवे ट्रैक पर लेट जाएंगे। जब उन्होंने देखा कि हम टस से मस नहीं होने वाले तो उन्होंने ट्रेन रुकवा दी। एक शायर की इच्छा का सम्मान करने के लिए ट्रेन पूरे डेढ़ घंटे तक रुकी रही और जब फैज ट्रेन पर सवार हो गए तो मैंने दिल्ली में उनके मेजबान इंदर कुमार गुजराल को फोन मिलाकर बताया कि फैज साहब कल डेढ़ घंटे देर से दिल्ली पहुंचेंगे।''

उधार के पैसे की अंगूठी

वर्ष 1941 में फैज ने एक अंग्रेज महिला एलिस से श्रीनगर में विवाह किया था और उनका निकाह पढ़वाया था उस समय कश्मीर के सबसे बड़े नेता शेख अब्दुल्ला ने।

फैज के नवासे अली मदीह हाशमी बताते हैं, ''1941 में श्रीनगर में उनका निकाह हुआ था। मेरी नानी ने मुझे बताया कि फैज उनके लिए एक अंगूठी लेकर आए थे। एलिस ने पूछा कि पैसे कहां से आए अंगूठी खरीदने के, तो उन्होंने कहा कि मियां इफ्तखारुद्दीन से उधार लिए हैं लेकिन हम उनको वापस नहीं करेंगे।''

हाशमी ने बताया, ''एलिस ने अंगूठी पहनी। वो उन्हें बिल्कुल फिट आई। उन्होंने फैज से पूछा- नाप कहां से मिला? फैज ने कहा मैंने अपनी उंगली का नाप दिया। इसे कहते हैं परफैक्ट फिट। हमारी उंगलियां भी बराबर हैं। उस शादी में उनकी तरफ से तीन बाराती गए थे और शाम को हुए दावते-वलीमा में जोश मलीहाबादी और मजाज भी शामिल हुए थे।''

उस दिन पूरा चांद निकला था जब फैज और नरुदा साथ थे

Remembering Faiz Ahmed Faiz On His Birth Anniversary
फैज अहमद फैज
फैज और नरूदा

1962 में फैज को सोवियत संघ ने लेनिन शांति पुरस्कार से नवाजा था। चूंकि फैज को दिल का दौरा पड़ चुका था इसलिए उन्हें हवाई जहाज से सफर करने की मनाही थी। वो कराची से नेपल्स पानी के जहाज से गए थे और फिर वहां से तीन दिनों का ट्रेन का सफर करते हुए मॉस्को पहुंचे थे।

इस पूरे सफर में उनकी बेटी और आज पाकिस्तान की मशहूर चित्रकार सलीमा हाशमी भी साथ थीं। सलीमा बताती हैं, ''मॉस्को पहुंचने के बाद हम लोगों को सोची ले जाया गया जहां मशहूर कवि पाब्लो नरूदा भी अपनी पत्नी के साथ आराम करने आए हुए थे। एक शाम उन्होंने मेरे अब्बू को आमंत्रित किया और उनके लिए छोटी सी दावत रखी। शाम ज्यों-ज्यों ढलती गई, दोनों शायरों ने अपने-अपने कलाम पढ़ने शुरू किए।"
सलीमा कहती हैं, "पाब्लो ने स्पेनिश में पढ़ना शुरू किया और अब्बू ने उर्दू में पढ़ा। साथ-साथ अनुवादक उनका तर्जुमा कर रहे थे। थोड़ी देर बाद मैंने महसूस किया कि अनुवादक पीछे रह गए और दोनों शायर अपनी-अपनी जुबान में एक दूसरे से हमकलाम हो रहे थे। पाब्लो सुनाते गए, अब्बू सुनाते गए। मुझे याद है उस दिन पूरा चांद निकला था। अजीब सी कैफियत थी। मेरी उम्र 17-18 साल की रही होगी। मुझे यह महसूस हुआ कि यह बहुत अनोखी शाम है और जो मंजर मैं देख रही हूं उसका मौका शायद जिंदगी में दोबारा न आएगा।''

शेख मुजीब का इसरार

1974 में फैज पाकिस्तानी प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के उस प्रतिनिधिमंडल में शामिल थे जो बांग्लादेश बनने के बाद पहली बार वहां गया था। फैज, शेख मुजीब को पहले से जानते थे। जब वह शेख से मिले, तो उन्होंने कहा कि हमारे ऊपर भी कुछ लिखिए। बांग्लादेश से वापस आने के बाद उन्होंने शेख मुजीब के इसरार पर मशहूर नज्म कही थी- हम थे ठहरे अजनबी...

बैरूत का एकाकी जीवन

1977 में जनरल जिया के सत्ता में आने के बाद फैज को पाकिस्तान छोड़ना पड़ा और उन्होंने चार वर्षों तक बैरूत में निर्वासन का जीवन बिताया.
उनकी बेटी सलीमा हाशमी कहती हैं कि उन्हें अपने अब्बू का एक बहुत दुखी खत मिला जिसमें उन्होंने लिखा था कि उन्होंने मेरा बचपन नहीं देखा क्योंकि वह उस समय जेल में थे। कम से कम मुझे मेरे नाती-पोतों का बचपन तो दिखा दो। सलीमा अपने बच्चों को वहां लेकर गईं तो वो उनसे मिलकर बहुत खुश हुए। लेकिन उन्होंने महसूस किया कि फैज वहां बहुत अकेले थे। लेकिन फलस्तीन को उन्होंने बहुत टूटकर चाहा था। वो शायद उनका आखिरी प्यार था। सबसे बड़ी दिक्कत थी कि बैरूत में उनके शेरों को सुनने वाला कोई नही था। वहां एक पाकिस्तानी बैंक मैनेजर रहा करते थे जिन्हें वह अपने शेर सुनाते थे। वहां तैनात पाकिस्तानी राजदूत को भी शेरो-शायरी की कोई खास समझ नहीं थी।

​फरीदा खानम और नूरजहाँ से फैज की दोस्ती

Remembering Faiz Ahmed Faiz On His Birth Anniversary
फैज अहमद फैज

शराब के शौकीन

फैज शराब के शौकीन थे। एक बार किसी ने मजाक किया था कि फैज के स्कूल का नाम स्कॉच मिशन हाईस्कूल था। लगता था कि ये तभी से तय हो गया था कि शराब से उनका साथ हमेशा के लिए रहेगा। उनकी बेटी सलीमा कहती हैं कि वो शराब जरूर पीते थे लेकिन उन्हें किसी ने कभी नशे में धुत्त नहीं देखा। दरअसल जितनी वो पीते थे उतने ही शांत हो जाते थे। वैसे भी वह बहुत कम बात करते थे और दूसरों की बातें ज्यादा सुना करते थे। उन्हें महिलाओं का साथ भी बहुत पसंद था। अली मदीह कहते हैं कि महिलाओं से ही उन्हें सीख मिली थी कि कभी भी कोई कड़वा शब्द इस्तेमाल न करें।

शौकत हारून से इश्क

एक बार एक इंटरव्यू में अमृता प्रीतम ने उनसे पूछा था कि क्या एलिस को उनके सारे इश्कों के बारे में पता था? फैज का जवाब था, ''बिल्कुल। वह मेरी पत्नी ही नहीं मेरी दोस्त भी हैं... यही वजह है कि हम लोग इतने साल तक साथ रहे।'' उसी इंटरव्यू में फैज ने अपनी एक दोस्त और शायद माशूका शौकत हारून का जिक्र किया है। शौकत उनसे जेल के अस्पताल में मिली थीं जब वो रावलपिंडी षड्यंत्र केस में कराची जेल में बंद थे। फैज के दामाद हुमैर हाशमी याद करते हैं कि शौकत जिन्हें लोग प्यार से शौकी कहते थे लंबे कद और गोरे रंग की महिला थीं। वह आमतौर से साड़ी पहनती थी। उनके बाल करीने से कटे होते थे और वह महंगी सिगरेट पिया करती थीं... और वो भी हमेशा एक लंबे नक्काशीदार सिगरेट होल्डर में। उनकी साड़ियों से बेहतरीन परफ्यूम्स की महक आया करती थी।"

1968 में जब फैज कराची से लाहौर लौटे तो उन्हें शौकी के अचानक देहांत की खबर मिली। फैज के लिए इसे सहन कर पाना बहुत मुश्किल था।
वह कुछ दिन तक बिल्कुल शांत हो गए। कुछ दिन बाद उन्होंने उनकी याद में तीन मरसिए ''दूर जाकर करीब हो जितने...'' ''चांद निकला किसी जानिब तेरी जेबाई का'' और ''कब तक दिल की खैर मनाएं''... इसमें से आखिरी दो मरसिए फरीदा खानम ने गाए थे।

फरीदा खानम और नूरजहाँ से दोस्ती

सूफी गुलाम मुस्तफा तबस्सुम फैज के उस्ताद थे। उनको वह अपनी रचनाएं सुधारने के लिए देते थे। एक बार दोपहर के खाने पर फैज और तबस्सुम बैठे थे। फैज ने इच्छा जताई कि क्या ही अच्छा हो फरीदा खानम यहां आ जाएं। उन्हें फोन किया गया और उन्हें लेने के लिए कार भेजी गई। फरीदा पहुंच भी गईं पूरी तरह सजी-धजी। दिन का खाना शाम तक चला... और वह महफिल में तब्दील हो गया।

दोस्तों को पता चला कि फैज, तबस्सुम और फरीदा खानम एक साथ बैठे हैं, तो उनकी तादाद बढ़ती चली गई। उसी तरह एक बार जब फैज लाहौर में नूरजहां के लिबर्टी मार्केट के घर के नीचे से गुजर रहे थे तो उन्होंने तय किया कि नूरजहां के घर पर अचानक दस्तक देकर उनसे मिला जाए। जब फैज अंदर पहुंचे तो नूरजहां हारमोनियम बजाती हुई कुछ गा रही थीं। फैज को देखते ही उन्होंने हारमोनियम बजाना बंद कर दिया, खुशी से चिल्लाईं और दौड़कर फैज को गले लगाकर चूमने लगीं। शराब मंगवाई गई और फैज के इसरार पर नूरजहां ने फिर से गाना शुरू किया और वो महफिल सुबह पौ फटने तक चली।

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