कल तक 10 रुपये के लिए फैलाना पड़ता था हाथ, आज पति को देती हैं उधार
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चंद्रा कंवर का कल तक घर से बाहर निकलना भी मुश्किल था। वह पूरे दिन घर में घूंघट में रहती थीं, लेकिन आज समय बदल चुका है। अब चंद्रा कंवर न केवल महिलाओं को मासिक धर्म स्वच्छता के बारे जानकारी मुहैया करा रही हैं बल्कि वह परिवार जिनकी महिलाएं घूंघट में रहती थीं उनकी मानसिकता में भी परिवर्तन आया है।
महिलाएं अपनी स्वच्छता के प्रति सजग हुई हैं। चंद्रा ने बताया कि कल तक जो महिलाएं एक-एक पैसे के लिए पति, भाई और पिता पर निर्भर रहती थीं आज वह उन्हें बीज, खाद और डीजल के खर्च के साथ खेती किसानी के लिए पैसे दे रहीं हैं। घर की तरक्की में हाथ बंटा रही हैं। गांव की महिलाएं आत्मनिर्भर हो रही हैं। आज गांव की महिलाओं ने अपना व्यवसाय शुरू कर दिया है। कोई आटा चक्की चला रही है तो कोई सिलाई बुनाई कर कमा रही है।
चंद्रा जैसी महिलाएं जो कल तक मासिक धर्म के बारे में बोलने में घबराती थीं वह सैनिटरी पैड पर विचार प्रकट कर रही हैं। चंद्रा ही नहीं 16 राज्यों के 4500 गांवों की महिलाओं और किसानों की जिंदगी में बदलाव लाने का काम कर रही है रिलायंस फाउंडेशन। रिलायंस फाउंडेशन ने आज देश भर में चलाए जा रहे अपने अभियान की जानकारी दी। जिसमें उन्होंने बताया कि किस तरह से फाउंडेशन लोगों के जीवनस्तर को सुधारने में जुटा है। वह महिलाओं को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक कर रहा है वहीं पुरुषों को खेती किसानी में भी मदद कर रहा है।
चंद्रा राजस्थान के माधोपुर जिले के एक छोटे से गांव झारकुंड की रहनेवाली हैं। जबसे गांव में रिलायंस फाउंडेशन ने दस्तक दी है महिलाओं ही नहीं खेती किसानी से जुड़े लोगों के जीवन में बड़ा परिवर्तन लाने का काम किया है। फाउंडेशन सिर्फ महिलाओं को ही स्वाबलंबी नहीं बना रहा है बल्कि स्वच्छता का पाठ पढ़ाने से लेकर किसानों को खेती किसानी के वैज्ञानिक गुण भी सिखा रही है।
कल तक जो जमीनें बंजर बेकार पड़ी थीं आज वहां पौधे लहलहा रहे हैं। चंद्रा ने बताया कि स्वयं सहायता समूह की मदद से महिलाओं को पता चला है कि मासिक धर्म के दौरान गंदे कपड़े का उपयोग करने से महलाएं संक्रमण का शिकार हो रही हैं। उससे उन्हें कितनी बीमारियां हो रही हैं। महिलाओं को पता चल रहा है कि आयरन की कमी से उन्हें किस-किस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
महिलाओं ने गांव-गांव में सेल्फ हेल्प ग्रुप की की मदद से एक समूह बनाया है। हर हफ्ते महिलाएं मिलती हैं और अपने खर्चों में से दस रुपये बचाती हैं और समूह में वह पैसा डालती हैं। आज वह दस रुपया ढ़ाई लाख रुपया हो चुका है और जब भी किसी महिला के परिवार वालों को पैसों की जरूरत होती है समूह से पैसा निकालकर दिया जाता है।
फाउंडेशन से ही जुड़ी हैं झारखंड, देवघर से आई सत्यश्री सिंह। सत्यश्री के पति मौत का कुआं में हर दिन जान जोखिम में डालकर कारनामे दिखाया करते थे लेकिन जबसे सत्यश्री फाउंडेशन से जुड़ी हैं घर का कायाकल्प हो गया है। पति को जान में जोखिम में डालकर कारनामा नहीं दिखाना होता है। अब वह किसानी कर रहे हैं। वह गांव की बहू बेटियों को स्वच्छता का पाठ पढ़ा रही हैं।
सत्यश्री बताती हैं कि वह मजदूरी करती थीं तो ठेकेदार पुरुषों को 200 रुपये मजदूरी देता था लेकिन गांव की महिलाओं को उतने की काम के लिए 150 रुपया देता था। मैंने आवाज उठाई, सारी महिलाओं ने काम करना बंद कर दिया और आज हमें बराबर पैसा मिलता है। सत्यश्री देवघर टिटमोह गांव की बहू हैं लेकिन आज समय बदल चुका है। सत्यश्री के द्वारा बनाए गए महिला समूह की वजह से न केवल गांव में बिजली आ गई है, बल्कि सड़क बन गई है और शौचालय भी बनाया गया है। यह बात तो महिलाओं को सुदृढ़ करने की लेकिन किसानों को सुदृढ़ बनाने के लिए भी किसान काम कर रहे हैं।
राजस्थान के जमवारामगढ़ के तोफन राम मीणा उन्हीं किसानों में से एक हैं। तोफन राम ने बताया कि पहले जिस जमीन पर सिर्फ साल में एक फसल होती थी अब हम रिलायंस की मदद से अपनी जमीन पर साल में पांच फसल उगा रहे हैं। वहीं भोपाल से आए विशाल मीणा ने बताया कि आज तक हम जिन खेतों पर फसलें उगाते थे वहां अब हम फूल उगा रहे हैं और हमारी कमाई दुगुनी हो गई है।