भारत में आखिरकार कब होगा धार्मिक सुधार?
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अगले साल यूरोप में प्रोटेस्टेंट रिफॉर्म्स (ईसाई धर्म के अंदर सुधारवादी आंदोलन) के 500 साल पूरे होने वाले हैं। हाल ही में भारतीय अखबारों की दो खबरों से मुझे इसकी याद आई। 25 मई को आंध्र प्रदेश के एक अखबार की खबर थी कि मंदिरों की आमदनी 27 फीसदी बढ़ गई है। राज्य के मुख्यमंत्री चंद्र बाबू नायडू ने इसे बढ़ते हुए पापों से भी जोड़ा है। उन्होंने कहा है, 'लोग पाप करते हैं और उसके बाद मंदिर जाते हैं और दान देते हैं।'
25 मई को ही, उदयपुर की एक खबर पर भी मेरी नजर गई। खबर की हेडलाइन थी, पवित्र डुबकी लगाइए, 11 रुपये दान दीजिए और पाप मुक्त होइए। 'इस रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान के शिव मंदिर के पुजारी लोगों को पाप मुक्त होने का प्रमाण पत्र बांट रहे हैं, वो भी महज 11 रुपए में। इतने रुपए में ही आपका दोष भी दूर किया जा रहा है, जो भविष्य की बाधाओं से मुक्त रखने का भरोसा देती है।
इतना ही नहीं रिपोर्ट में ये भी कहा गया कि हर आदमी पापी है, भले वह निर्दोष ही क्यों ना हो। एक पुजारी ने कहा, 'जब लोग खेती करते हैं, तो वो अप्रत्यक्ष रूप से अन्य जीवों को मारते हैं, पक्षियों और पशुओं के अंडो को नुक़सान पहुंचाते हैं। इससे उन पर दोष आ जाता है। वे यहाँ भारी मन से आते हैं और दिल का बोझ हल्का कर वापस जाते हैं।'
ईश्वर के प्रतिनिधि के तौर पर पुजारियों का नकद दान-दक्षिणा लेने का चलन दुनिया भर में पसरा हुआ है। यूरोप में 500 साल पहले तो यह बड़े पैमाने पर होता था। रोमन कैथोलिक चर्च में भी इस तरह का प्रावधान था, जहाँ लोग अपने पापों को कम करने के लिए बहुत बड़ी रकम चुकाते थे।
तिरुपति मंदिर में सोने और हीरे से बना 45 करोड़ रुपए का मुकुट दान दिया गया
इस प्रावधान का प्रसार बड़ा जोर शोर से किया गया। 1517 में पोप ने अपने एक प्रतिनिधि को पैसा लाने के लिए जर्मनी भेजा। इन पैसों का इस्तेमाल वैटिकन में बन रहे सेंट पीटर्स चर्च के निर्माण में होना था। इसका विरोध करते हुए एक जर्मन पादरी ने लिखा कि कैथोलिक चर्च लोगों के विश्वास के साथ धोखाधड़ी कर रहा है। उस पादरी ने ये भी लिखा कि पोप जो कर रहे हैं, उसका अधिकार उन्हें नहीं है और उसने वो नोट अपने चर्च के दरवाजे पर चिपका दिया।
.उस पादरी का नाम था मार्टिन लूथर, और उनकी कोशिशों ने प्रोटेस्टेंट रिफॉर्मेशन का रूप ले लिया। इसने आंदोलन का रूप ले लिया और ईसाई धर्म को मानने वाले दो खेमों में बंट गए और इस आंदोलने के चलते ही आज कई यूरोपीय देश कैथोलिक नहीं रह गए। यूरोप में लूथर के समय जैसी स्थिति थी, वैसी ही स्थिति भारत में बनी हुई है, यानी धर्म में लेन देन बना हुआ है।
हम आशीर्वाद के लिए मंदिरों में दान देते हैं। अमीर लोग नकद नहीं देते हैं, वे सोना दान में देते हैं, क्यों? कहा जाता है मंदिर को जो नकद दान मिलता है उससे प्रसाद खरीदा जाता है और कुछ चैरिटेबल काम किए जाते हैं। वहीं सोना ईश्वर से जुड़ा रहता है।
जून, 2009 में कर्नाटक के मंत्री जी। जर्नादन रेड्डी ने आंध्र प्रदेश के तिरुपति मंदिर को सोने और हीरे से बना करीब 45 करोड़ रुपए का मुकुट दान में दिया था। मंदिर की वेबसाइट के मुताबिक, तिरुपति को महज एक साल के अंदर 3200 किलो चांदी और 2।4 किलो हीरे का दान मिलता है। वहीं औसतन साल में एक हजार किलोग्राम से ज्यादा सोना मिलता है।
मंदिर प्रशासन भी सोने के चढ़ावा को बढ़ावा देता है। 2011 में जिन लोगों ने एक किलो सोने का चढ़ावा चढ़ाया (करीब 28 लाख रुपये से ज्यादा की कीमत) उन्हें वीआईपी दर्शन की सुविधा मिली। यानी उन्हें कतार में लगने की जरूरत नहीं पड़ी। आज की तारीख में मंदिर बहुत सारी सुविधाएं देता है और इसके लिए लोग एक करोड़ रुपए का चढ़ावा चढ़ाते हैं। इसके बारे में ज्यादा जानकारी आपको इस लिंक पर मिल सकती है।
धर्म हमेशा से लेन देन का मामला रहा है
इस जानकारी पर भारतीयों को हैरानी नहीं होती, क्योंकि हम लोग मानते हैं कि धर्म हमेशा से लेन देन का मामला रहा है। मैं कुछ महीने पहले काशी गया और हिंदुओं के सबसे प्राचीन शहर में हर चीज की कीमत है। आरती में बैठने के लिए भी लोग पैसे लेते हैं।
शाम की आरती में दशाश्वमेघ घाट में घंटी बजाने के लिए लगी रस्सी को पकड़ने के लिए विदेशियों से बहुत पैसा वसूलते हैं। हर जगह, श्रद्धालुओं को उपभोक्ता की तरह देखा जाता है। ये भी महत्वपूर्ण है कि श्रद्धालु इसको लेकर बुरा भी नहीं मानते।
यह हमारी संस्कृति में शामिल है, इसलिए धर्म के दायरे से बाहर कोई चैरिटी नहीं होने पर भी हमें अप्रत्याशित नहीं लगता। लेकिन हमें बहुत ज्यादा निराश होने की जरूरत नहीं। परोपकार के कामों के लिए कारोबारियों के दान देने का चलन पश्चिमी समाज का अपेक्षाकृत नया चलन है।
19वीं शताब्दी तक संगठित तौर पर परोपकार का कोई काम नहीं चलाया जाता था
19वीं शताब्दी तक संगठित तौर पर परोपकार का कोई काम नहीं चलाया जाता था। अमीर कारोबारियों ने चर्च को कुछ पैसा देना शुरू किया था। यह पैसा आमदनी का दसवां हिस्सा होता था। 1889 में उद्योगपति एंड्रूय कारनेगी ने एक किताब लिखी- द गास्पेल ऑफ वेल्थ।
इसमें उन्होंने तर्क दिया कि अमीर लोगों को अपना धन गरीबों में बांटना चाहिए, और वे इसके लिए बाध्य होने चाहिए। उन्होंने ये भी कहा कि किसी के लिए भी अमीरी में मरना शर्मनाक है। आज कारनेगी के विचारों से प्रभावित कई लोग हैं और पश्चिम में तो ये एक चलन बन गया है कि बहुत अमीर लोग मरने से पहले अपना पैसा दान देते हैं। बिल गेट्स और वारेन बफ़े जैसे लोग दुर्लभ नहीं हैं।
ऐसा करने वाले केवल बहुत अमीर लोग नहीं हैं। नीदरलैंड का औसत नागरिक कम से कम सात चैरिटी संस्थाओं को मासिक पैसा देता है। भारत में क्या तस्वीर है? हम सब इसका जवाब जानना चाहते हैं। जब तक भारत में ये बदलाव नहीं होता और हम धर्म को व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए लेन देन के तौर पर देखना बंद नहीं करते, तब तक यूरोप की तरह यहां सुधार नहीं होगा। हमें केवल ये उम्मीद करनी चाहिए कि इसमें अगले 500 साल न लगें।