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73वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मोदी ने क्या कहा, पढ़िए पूरा भाषण

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 15 Aug 2019 05:53 PM IST
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : एएनआई
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मेरे प्यारे देशवासियो,
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स्वतंत्रता के इस पवित्र दिवस पर, सभी देशवासियों को अनेक-अनेक शुभकामनाएं।

आज रक्षा बंधन का भी पर्व है। सदियों से चली आई यह परंपरा भाई-बहन के प्यार को अभिव्यक्त करती है। मैं सभी देशवासियों को, सभी भाइयों-बहनों को इस रक्षा-बंधन के पावन पर्व पर अनेक-अनेक शुभकामनाएं देता हूं। स्नेह से भरा यह पर्व हमारे सभी भाइयों-बहनों के जीवन में आशा-आकांक्षाओं को पूर्ण करने वाला हो, सपनों को साकार करने वाला हो और स्नेह की सरिता को बढ़ाने वाला हो।

आज जब देश आजादी का पर्व मना रहा है, उसी समय देश के अनेक भागों में अति वर्षा के कारण, बाढ़ के कारण लोग कठिनाइयों से जूझ रहे हैं। कई लोगों ने अपने स्वजन खोए हैं। मैं उनके प्रति अपनी संवेदनाएं प्रकट करता हूं और राज्य सरकार, केंद्र सरकार, एनडीआरएफ सभी संगठन, नागरिकों का कष्ट कम कैसे हो, सामान्य परिस्थिति जल्दी कैसे लौटे, उसके लिए दिन-रात प्रयास कर रहे हैं। 

आज जब हम आजादी के इस पवित्र दिवस को मना रहे हैं, तब देश की आजादी के लिए जिन्होंने अपना जीवन दे दिया, जिन्होंने अपनी जवानी दे दी, जिन्होंने जवानी जेलों में काट दी, जिन्होंने फांसी के फंदे को चूम लिया, जिन्होंने सत्याग्रह के माध्यम से आजादी के बिगुल में अहिंसा के स्वर भर दिए। पूज्य बापू के नेतृत्व में देश ने आजादी पाई। मैं आज देश के आजादी के उन सभी बलिदानियों को, त्यागी-तपस्वियों को आदरपूर्वक नमन करता हूं।

उसी प्रकार से देश आजाद होने के बाद इतने वर्षों में देश की शांति के लिए, सुरक्षा के लिए, समृद्धि के लिए लक्षावधी लोगों ने अपना योगदान दिया है। मैं आज आजाद भारत के विकास के लिए, शांति के लिए, समृद्धि के लिए जनसामान्य की आशाओं-आकांक्षाओं को पूर्ण करने के लिए जिन-जिन लोगों ने योगदान किया है, आज मैं उनको भी नमन करता हूं।

नई सरकार बनने के बाद लाल किले से मुझे आज फिर से एक बार आप सबका गौरव करने का अवसर मिला है। अभी इस नई सरकार को दस हफ्ते भी नहीं हुए हैं, लेकिन दस हफ्ते के छोटे से कार्यकाल में भी सभी क्षेत्रों में, सभी दिशाओं में हर प्रकार के प्रयासों को बल दिया गया है, नए आयाम दिए गए हैं और सामान्य जनता ने जिन आशा, अपेक्षा, आकांक्षाओं के साथ हमें सेवा करने का मौका दिया है, उसको पूर्ण करने में एक पल का भी विलंब किए बिना हम पूरे सामर्थ्य के साथ, पूरे समर्पण भाव के साथ, आपकी सेवा में मग्न हैं।

दस हफ्ते के भीतर-भीतर ही अनुच्छेद 370 का हटना, 35A का हटना सरदार वल्लभ भाई पटेल के सपनों को साकार करने की दिशा में एक अहम कदम है। दस हफ्ते के भीतर-भीतर हमारी मुस्लिम माताओं और बहनों को उनका अधिकार दिलाने के लिए तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाना, आतंक से जुड़े कानूनों में आमूल-चूल परिवर्तन करके उसको एक नई ताकत देने का, आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के संकल्प को और मजबूत करने का काम,  हमारे किसान भाइयों-बहनों को प्रधानमंत्री सम्मान निधि के तहत 90 हजार करोड़ रुपया किसानों के खाते में ट्रांसफर करने का एक महत्वपूर्ण काम आगे बढ़ा है।

हमारे किसान भाई-बहन, हमारे छोटे व्यापारी भाई-बहन, उनको कभी कल्पना नहीं थी कि कभी उनके जीवन में भी पेंशन की व्यवस्था हो सकती है। 60 साल की आयु के बाद वे भी सम्मान के साथ जी सकते हैं। शरीर जब ज्यादा काम करने के लिए मदद न करता हो, उस समय कोई सहारा मिल जाए, वैसी पेंशन योजना को भी लागू करने का काम कर दिया है।

जल संकट की चर्चा बहुत होती है, भविष्य जल संकट से गुजरेगा, यह भी चर्चा होती है, उन चीजों को पहले से ही सोच करके, केंद्र और राज्य मिलकर के योजनाएं बनाएं इसके लिए एक अलग जल-शक्ति मंत्रालय का भी निर्माण किया गया है।

हमारे देश में बहुत बड़ी तादाद में डॉक्टरों की जरूरत है, आरोग्य की सुविधाएं और व्यवस्थाओं की आवश्यकता है। उसको पूर्ण करने के लिए नए कानूनों की जरूरत है, नई व्यवस्थाओं की जरूरत है, नई सोच की जरूरत है, देश के नौजवानों को डॉक्टर बनने के लिए अवसर देने की जरूरत है। उन चीजों को ध्यान में रखते हुए मेडिकल शिक्षा को पारदर्शी बनाने के लिए अनेक महत्वपूर्ण कानून हमने बनाए हैं, महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं।

आज पूरे विश्व में बच्चों के साथ अत्याचार की घटनाएं सुनते हैं। भारत भी हमारे छोटे-छोटे बालकों को असहाय नहीं छोड़ सकता है। उन बालकों की सुरक्षा के लिए कठोर कानून प्रबंधन आवश्यक था। हमने इस काम को भी पूर्ण कर लिया है।

भाइयों-बहनों, 2014 से 2019, पांच साल मुझे सेवा करने का आपने मौका दिया। अनेक चीजें ऐसी थीं... सामान्य मानव अपनी निजी आवश्यकताओं के लिए जूझता था। हमने पांच साल लगातार प्रयास किया कि हमारे नागरिकों की जो रोजमर्रा की जिदंगी की आवश्यकताएं हैं, खासतौर पर गांव की, गरीब की, किसान की, दलित की, पीड़ित की, शोषित की, वंचित की, आदिवासी की, उन पर बल देने का हमने प्रयास किया है और गाड़ी को हम ट्रैक पर लाए और उस दिशा में आज बहुत तेजी से काम चल रहा है। 

लेकिन वक्त बदलता है। अगर 2014 से 2019 आवश्यकताओं की पूर्ति का दौर था, तो 2019 के बाद का कालखंड देशवासियों की आकांक्षाओं की पूर्ति का कालखंड है, उनके सपनों को साकार करने का कालखंड है और इसलिए 21वीं सदी का भारत कैसा हो, कितनी तेज गति से चलता हो, कितनी व्यापकता से काम करता हो, कितनी ऊंचाई से सोचता हो, इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए, आने वाले पांच साल के कार्यकाल को आगे बढ़ाने का एक खाका तैयार करके हम एक के बाद एक कदम उठा रहे हैं।

2014 में, मैं देश के लिए नया था। 2013-14 में चुनाव के पूर्व, भारत-भ्रमण करके मैं देशवासियों की भावनाओं को समझने का प्रयास कर रहा था। लेकिन हर किसी के चेहरे पर एक निराशा थी, एक आशंका थी। लोग सोचते थे क्या यह देश बदल सकता है? क्या सरकारें बदलने से देश बदल जाएगा? एक निराशा जन-सामान्य के मन में घर कर गई थी। 

लंबे कालखंड के अनुभव का यह परिणाम था- आशाएं लंबी टिकती नहीं थीं, पल-दो पल में आशा, निराशा के गर्त में डूब जाती थी। लेकिन जब 2019 में, पांच साल के कठोर परिश्रम के बाद जन-सामान्य के लिए एकमात्र समर्पण भाव के साथ, दिल-दिमाग में सिर्फ और सिर्फ मेरा देश, दिल-दिमाग में सिर्फ और सिर्फ मेरे देश के करोड़ों देशवासी इस भावना को लेकर चलते रहे। 

पल-पल उसी के लिए खपाते रहेऔर जब 2019 में गए, मैं हैरान था। देशवासियों का मिजाज बदल चुका था।  निराशा, आशा में बदल चुकी थी, सपने, संकल्पों से जुड़ चुके थे, सिद्धि सामने नजर आ रही थी और सामान्य मानव का एक ही स्वर था- हां, मेरा देश बदल सकता है। सामान्य मानव की एक ही गूंज थी- हां, हम भी देश बदल सकते हैं, हम पीछे नहीं रह सकते।

130 करोड़ नागरिकों के चेहरे के ये भाव, भावनाओं की यह गूंज हमें नई ताकत, नया विश्वास देती है। सबका साथ-सबका विकास का मंत्र ले करके चले थे, लेकिन पांच साल के भीतर-भीतर ही देशवासियों ने सबके विश्वास के रंग से पूरे माहौल को रंग दिया। ये सबका विश्वास ही पांच सालों में पैदा हुआ जो हमें आने वाले दिनों में और अधिक सामर्थ्य के साथ देशवासियों की सेवा करने के लिए प्रेरित करता रहेगा।

इस चुनाव में मैंने देखा था और मैंने उस समय भी कहा था- न कोई राजनेता चुनाव लड़ रहा था, न कोई राजनीतिक दल चुनाव लड़ रहा था, न मोदी चुनाव लड़ रहा था, न मोदी के साथी चुनाव लड़ रहे थे, देश का आम आदमी, जनता-जनार्दन चुनाव लड़ रही थी, 130 करोड़ देशवासी चुनाव लड़ रहे थे, अपने सपनों के लिए लड़ रहे थे। लोकतंत्र का सही स्वरूप इस चुनाव में नजर आ रहा था।

मेरे प्यारे देशवासियो, समस्याओं का समाधान- इसके साथ-साथ सपनों, संकल्प और सिद्धि का कालखंड- हमें अब साथ-साथ चलना है। यह साफ बात है कि समस्याओं का जब समाधान होता है, तो स्वावलंबन का भाव पैदा होता है। समाधान से स्वावलंबन की ओर गतिबढ़ती है। जब स्वावलंबन होता है, तो अपने-आप स्वाभिमान उजागर होता है और स्वाभिमान का सामर्थ्य बहुत होता है। 

आत्म-सम्मान का सामर्थ्य किसी से भी ज्यादा होता है और जब समाधान हो, संकल्प हो, सामर्थ्य हो, स्वाभिमान हो,तब सफलता के आड़े कुछ नहीं आ सकता है और आज देश उस स्वाभिमान के साथ सफलता की नई ऊंचाइयों को पार करने के लिये, आगे बढ़ने के लिये कृत-निश्चय है। जब हम समस्याओं का समाधान देखते हैं, तो टुकड़ों में नहीं सोचना चाहिए। तकलीफें आएंगी, एक साथ वाह-वाही के लिए हाथ लगाकर छोड़ देना, यह तरीका देश के सपनों को साकार करने के काम नहीं आएगा। हमें समस्याओं को जड़ से मिटाने की कोशिश करनी होगी। 

आपने देखा होगा हमारी मुस्लिम बेटियां, हमारी बहनें, उनके सिर पर तीन तलाक की तलवार लटकती थी, वे डरी हुई जिंदगी जीती थीं। तीन तलाक की शिकार शायद नहीं हुई हों, लेकिन कभी भी तीन तलाक की शिकार हो सकती हैं, यह भय उनको जीने नहीं देता था, उनको मजबूर कर देता था। दुनिया के कई देश, इस्लामिक देश, उन्होंने भी इस कुप्रथा को हमसे बहुत पहले खत्म कर दिया, लेकिन किसी न किसी कारण से हमारी इन मुस्लिम माताओं-बहनों को हक देने में हम हिचकिचाते थे। 

अगर इस देश में, हम सती प्रथा को खत्म कर सकते हैं, हम भ्रूण हत्या को खत्म करने के कानून बना सकते हैं, अगर हम बाल-विवाह के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं, हम दहेज में लेन-देन की प्रथा के खिलाफ कठोर कदम उठा सकते हैं, तो क्यों न हम तीन तलाक के खिलाफ भी आवाज उठाएं और इसलिए भारत के लोकतंत्र की आत्मा को पकड़ते हुए, भारत के संविधान की भावना का, बाबा साहेब अंबेडकर की भावना का आदर करते हुए, हमारी मुस्लिम बहनों को समान अधिकार मिले, उनके अंदर भी एक नया विश्वास पैदा हो, भारत की विकास यात्रा में वे भी सक्रिय भागीदार बनें, इसलिये हमने यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया। ये निर्णय राजनीति के तराजू से तौलने के निर्णय नहीं होते हैं, सदियों तक माताओं-बहनों के जीवन की रक्षा की गारंटी देते हैं।

उसी प्रकार से मैं एक दूसरा उदाहरण देना चाहता हूं- अनुच्छेद 370, 35ए।  क्या कारण था? इस सरकार की पहचान है- हम समस्याओं को टालते भी नहीं हैं और न ही हम समस्याओं को पालते हैं। अब समस्याओं को टालने का भी वक्त नहीं है,  अब समस्याओं का पालने का भी वक्त नहीं है। जो काम पिछले 70 साल में नहीं हुआ, नई सरकार बनने के बाद, 70 दिन के भीतर-भीतर अनुच्छेद 370 और 35ए को हटाने का काम भारत के दोनों सदनों ने, राज्यसभा और लोकसभा ने, दो-तिहाई बहुमत से पारित कर दिया। इसका मतलब यह हुआ कि हर किसी के दिल में यह बात थी, लेकिन प्रारंभ कौन करे, आगे कौन आये, शायद उसी का इंतजार था और देशवासियों ने मुझे यह काम दिया और जो काम आपने मुझे दिया मैं वही करने के लिए आया हूं। मेरा अपना कुछ नहीं है।

हम जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन की दिशा में भी आगे बढ़े। 70 साल हर किसी ने कुछ-न-कुछ प्रयास किया, हर सरकार ने कोई-न-कोई प्रयास किया लेकिन इच्छित परिणाम नहीं मिले और जब इच्छित परिणाम नहीं मिलते, तो नए सिरे से सोचने की, नए सिरे से कदम बढ़ाने की आवश्यकता होती है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के नागरिकों की आशा-आकांक्षा पूरी हो, यह हम सब का दायित्व है। उनके सपनों को नए पंख मिलें, यह हम सब की जिम्मेदारी है और उसके लिए 130 करोड़ देशवासियों को इस जिम्मेदारी को उठाना है और इस जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए, जो भी रुकावटें सामने आई हैं, उनको दूर करने का हमने प्रयास किया है।

पिछले 70 साल में इन व्यवस्थाओं ने अलगाववाद को बल दिया है, आतंकवाद को जन्म दिया है, परिवारवाद को पोसा है और एक प्रकार से भ्रष्टाचार और भेदभाव की नींव को मजबूती देने का ही काम किया है। इसलिए वहां की महिलाओं को अधिकार मिलें। वहां के मेरे दलित भाइयों-बहनों को, देश के दलितों को जो अधिकार मिलता था, वो उन्हें नहीं मिलता था। हमारे देश के जनजातीय समूहों को, आदिवासियों को जो अधिकार मिलते हैं, वो उनको भी मिलने चाहिए। 

वहां हमारे कई ऐसे समाज और व्यवस्था के लोग चाहे वह गुर्जर हों, बकरवाल हों, गद्दी हों, सिप्पी हों, बाल्टी हों - ऐसी अनेक जनजातियां, उनको राजनीतिक अधिकार भी मिलने चाहिए। उसे देने की दिशा में, हम हैरान हो जाएंगे, वहां के हमारे सफाई कर्मचारी भाइयों और बहनों पर कानूनी रोक लगा दी गई थी। उनके सपनों को कुचल दिया गया था। आज हमने उनको यह आजादी देने का काम किया है।

भारत विभाजन हुआ, लाखों-करोड़ों लोग विस्थापित होकर आए उनका कोई गुनाह नहीं था लेकिन जो जम्मू-कश्मीर में आकर बसे, उनको मानवीय अधिकार भी नहीं मिले, नागरिक के अधिकार भी नहीं मिले। जम्मू-कश्मीर के अंदर मेरे पहाड़ी भाई-बहन भी हैं। उनकी भी चिंता करने की दिशा में हम कदम उठाना चाहते हैं।

मेरे प्यारे देशवासियों, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख सुख-समृद्धि और शांति के लिए भारत के लिए प्रेरक बन सकता है। भारत की विकास यात्रा में बहुत बड़ा योगदान दे सकता है। उसके पुराने उन महान दिवसों को लौटाने का हम सब प्रयास करें। उन प्रयासों को लेकर यह जो नई व्यवस्था बनी है वह सीधे-सीधे नागरिकों के हितों के लिए काम करने के लिए सुविधा पैदा करेगी। 

अब देश का, जम्मू-कश्मीर का सामान्य नागरिक भी दिल्ली सरकार को पूछ सकता है। उसको बीच में कोई रुकावटें नहीं आएंगी। यह सीधी-सीधी व्यवस्था आज हम कर पाए हैं। लेकिन जब पूरा देश, सभी राजनीतिक दलों के भीतर भी, एक भी राजनीतिक दल अपवाद नहीं हैं, अनुच्छेद 370, 35ए को हटाने के लिए कोई प्रखर रूप से तो कोई मूक रूप से समर्थन देता रहा है।

लेकिन राजनीति के गलियारों में चुनाव के तराजू से तोलने वाले कुछ लोग 370 के पक्ष में कुछ न कुछ कहते रहते हैं। जो लोग 370 के पक्ष में वकालत करते हैं, उनको देश पूछ रहा है, अगर ये अनुच्छेद 370, यह 35ए इतना महत्वपूर्ण था,इतना अनिवार्य था, उसी से भाग्य बदलने वाला था तो 70 साल तक इतना भारी बहुमत होने के बावजूद आप लोगों ने उसको स्थायी क्यों नहीं किया? अस्थायी क्यों बनाए रखा? अगर इतना जरूरी था तो आगे आते और स्थायी कर देते। लेकिन इसका मतलब यह है, आप भी जानते थे जो तय हुआ है, वह सही नहीं हुआ है, लेकिन सुधार करने की आप में हिम्मत नहीं थी, इरादा नहीं था। राजनीतिक भविष्य पर सवालिया निशान लगते थे। मेरे लिए देश का भविष्य ही सब कुछ है, राजनीतिक भविष्य कुछ नहीं होता है।

हमारे संविधान निर्माताओं ने, सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे महापुरुषों ने, देश की एकता के लिए, राजकीय एकीकरण के लिए उस कठिन समय में भी महत्वपूर्ण फैसले लिए, हिम्मत के साथ फैसले लिए। देश के एकीकरण का सफल प्रयास किया। लेकिन अनुच्छेद 370 के कारण, 35ए के कारण कुछ रुकावटें भी आई हैं।

आज लाल किले से मैं जब देश को संबोधित कर रहा हूं, मैं यह गर्व के साथ कहता हूं कि आज हर हिंदुस्तानी कह सकता हैं 'एक राष्ट्र, एक संविधान' और हम सरदार साहब का एक भारत-श्रेष्ठ भारत, इसी सपने को चरितार्थ करने में लगे हुए हैं। तब ये साफ-साफ बनता है कि हम ऐसी व्यवस्थाओं को विकसित करें जो देश की एकता को बल दें, देश को जोड़ने के लिए उभर करके आएं और यह प्रक्रिया निरंतर चलनी चाहिए। वह एक समय के लिए नहीं होती है, अविरल होनी चाहिए।

जीएसटी के माध्यम से हमने 'एक राष्ट्र-एक टैक्स' के सपने को साकार किया है। उसी प्रकार से पिछले दिनों ऊर्जा के क्षेत्र में 'एक राष्ट्र-एक ग्रिड' इस काम को भी हमने सफलतापूर्वक पार किया। उसी प्रकार से 'वन नेशन-वन मोबिलिटी कार्ड' व्यवस्था को भी हमने विकसित किया है। आज देश में व्यापक रूप से चर्चा चल रही है, 'एक देश, एक साथ चुनाव'। यह चर्चा होनी चाहिए, लोकतांत्रिक तरीके से होनी चाहिए और कभी न कभी 'एक भारत-श्रेष्ठ भारत' के सपनों को साकार करने के लिए और भी ऐसी नई चीजों को हमें जोड़ना होगा।

मेरे प्यारे देशवासियों, देश को नई ऊंचाइयों को पार करना है, देश को विश्व के अंदर अपना स्थान प्रस्थापित करना है तो हमें अपने घर में भी गरीबी से मुक्ति के भान को बल देना ही होगा। यह किसी के लिए उपकार नहीं है। भारत के उज्ज्वल भविष्य के लिए, हमें गरीबी से मुक्त होना ही होगा। गत पांच वर्ष में गरीबी कम करने की दिशा में, लोग गरीबी से बाहर आएं, बहुत सफल प्रयास हुए हैं। पहले की तुलना में ज्यादा तेज गति से और ज्यादा व्यापकता से इस दिशा में सफलता प्राप्त हुई है। 

लेकिन फिर भी गरीब व्यक्ति, सम्मान अगर उसको प्राप्त हो जाता है, उसका स्वाभिमान जग जाता है तो वह गरीबी से लड़ने के लिए सरकार का इंतजार नहीं करेगा। वो अपने सामर्थ्य से गरीबी को परास्त करने के लिए आएगा। हम में से किसी से भी ज्यादा विपरीत परिस्थितियों से जूझने की ताकत अगर किसी में है, तो मेरे गरीब भाइयों-बहनों में है। कितनी ही ठंड क्यों न हो, वो मुठ्ठी बंद करके गुजारा कर सकता है। आइये उस सामर्थ्य के हम पुजारी बनें और इसलिए उसकी रोजमर्रा की जिंदगी की कठिनाइयों को हम दूर करें।

क्या कारण है कि मेरे गरीब के पास शौचालय न हो, घर में बिजली न हो, रहने के लिए घर न हो, पानी की सुविधा न हो, बैंक में खाता न हो, कर्ज लेने के लिए साहूकारों के घर जा करके एक प्रकार से सब कुछ गिरवी रखना पड़ता हो। आइए, गरीबों के आत्म-सम्मान, आत्म-विश्वास को, उनके स्वाभिमान को ही आगे बढ़ाने के लिए, सामर्थ्य देने के लिए हम प्रयास करें।

भाइयों-बहनों, आजादी के 70 साल हो गए। बहुत सारे काम सब सरकारों ने अपने-अपने तरीके से किए हैं। सरकार किसी भी दल की क्यों न हो, केंद्र की हो, राज्य की हो, हर किसी ने अपने-अपने तरीके से प्रयास किए हैं। लेकिन यह भी सच्चाई है कि आज हिंदुस्तान में करीब-करीब आधे घर ऐसे हैं, जिन घरों में पीने का पानी उपलब्ध नहीं है। 

उनको पीने का पानी प्राप्त करने के लिए मशक्कत करनी पड़ती है। माताओं-बहनों को सिर पर बोझ उठा करके, मटके लेकर दो-दो, तीन-तीन, पांच-पांच किलोमीटर जाना पड़ता है। जीवन का बहुत सारा हिस्सा सिर्फ पानी में खप जाता है और इसलिए इस सरकार ने एक विशेष काम की तरफ बल देने का निर्णय लिया है और वह है - हमारे हर घर में जल कैसे पहुंचे? 

हर घर को जल कैसे मिले? पीने का शुद्ध पानी कैसे मिले? और इसलिए आज मैं लाल किले से घोषणा करता हूं कि हम आने वाले दिनों में जल-जीवन मिशन को आगे ले करके बढ़ेंगे। यह जल-जीवन मिशन, इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार साथ मिलकर काम करेंगे और आने वाले वर्षों में साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा रकम इस जल-जीवन मिशन के लिए खर्च करने का हमने संकल्प लिया है। 

जल संचय हो, जल सिंचन हो, वर्षा की बूंद-बूंद पानी को रोकने का काम हो, समुद्री पानी को या खराब पानी को साफ करने (वाटर ट्रीटमेंट) का विषय हो, किसानों के लिए सूक्ष्म सिंचाई /evr  ‘प्रति बूंद, ज्यादा फसल' का काम हो, पानी बचाने का अभियान हो, पानी के प्रति सामान्य से सामान्य नागरिक सजग बने, संवेदनशील बने, पानी का महत्व समझें, हमारे शिक्षा कर्मों में भी बच्चों को भी बचपन से ही पानी के महत्व की शिक्षा दी जाए। 

पानी संग्रह के लिए, पानी के स्रोतों को पुनर्जीवित करने के लिए हम लगातार प्रयास करें और हम इस विश्वास के साथ आगे बढ़ें कि पानी के क्षेत्र में पिछले 70 साल में जो काम हुआ है, हमें पांच साल में चार गुना से भी ज्यादा उस काम को करना होगा। अब हम ज्यादा इंतजार नहीं कर सकते। 

इस देश के महान संत, सैकड़ों साल पहले, संत तिरुवल्लुवर जी ने उस समय एक महत्वपूर्ण बात कही थी, सैकड़ों साल पहले, तब तो शायद किसी ने पानी के संकट के बारे में सोचा भी नहीं होगा, पानी के महत्व के बारे में भी नहीं सोचा होगा, और तब संत तिरुवल्लुवर जी ने कहा था 'नीर इन्ड़्री अमियादू, उल्ग:, नीर इन्ड़्री अमियादू, उल्ग:,” यानि जब पानी समाप्त हो जाता है, तो प्रकृति का कार्य थम जाता है, रुक जाता है। एक प्रकार से विनाश प्रारंभ हो जाता है।

मेरा जन्म गुजरात में हुआ, गुजरात में तीर्थ क्षेत्र है महुडी, जो उत्तरी गुजरात में है। जैन समुदाय के लोग वहां आते-जाते रहते हैं। आज से करीब 100 साल पहले वहां एक जैन मुनि हुए, वह किसान के घर में पैदा हुए थे, किसान थे, खेत में काम करते थे लेकिन जैन परंपरा के साथ जुड़ करके वह दीक्षित हुए और जैन मुनि बने।

करीब 100 साल पहले वह लिखकर गए हैं। बुद्धि सागर जी महाराज ने लिखा है कि एक दिन ऐसा आएगा, जब पानी किराने की दुकान में बिकेगा। आप कल्पना कर सकते हैं 100 साल पहले एक संत लिख कर गए कि पानी किराने की दुकान में बिकेगा और आज हम पीने का पानी किराने की दुकान से लेते हैं। हम कहां से कहां पहुंच गए।

मेरे प्यारे देशवासियों, न हमें थकना है, न हमें थमना है, न हमें रुकना है और न हमें आगे बढ़ने से हिचकिचाना है। यह अभियान सरकारी नहीं बनना चाहिए। जल संचय का यह अभियान, जैसे स्वच्छता का अभियान चला था, जन सामान्य का अभियान बनना चाहिए। जन सामान्य के आदर्शों को लेकर, जन सामान्य की अपेक्षाओं को लेकर, जन सामान्य के सामर्थ्य को लेकर हमें आगे बढ़ना है।

मेरे प्यारे देशवासियों, अब हमारा देश उस दौर में पहुंचा है जिसमें बहुत-सी बातों से अब हमें अपने आपको छुपाए रखने की जरूरत नहीं है। चुनौतियों को सामने से स्वीकार करने का वक्त आ चुका है। कभी राजनीतिक नफा-नुकसान के इरादे से हम निर्णय करते हैं लेकिन इससे देश की भावी पीढ़ी का बहुत नुकसान होता है।

वैसा ही एक विषय है जिसको मैं आज लाल किले से स्पष्ट करना चाहता हूं। और वह विषय है, हमारे यहां हो रहा बेतहाशा जनसंख्या विस्फोट। यह जनसंख्या विस्फोट हमारे लिए, हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए अनेक नए संकट पैदा करता है लेकिन यह बात माननी होगी कि हमारे देश में एक जागरूक वर्ग है, जो इस बात को भली-भांति समझता है। 

वह अपने घर में शिशु को जन्म देने से पहले भली-भांति सोचता है कि मैं कहीं उसके साथ अन्याय तो नहीं कर दूंगा। उसकी जो मानवीय आवश्यकताएं हैं उनकी पूर्ति मैं कर पाऊंगा कि नहीं कर पाऊंगा, उसके जो सपने हैं, वो सपने पूरा करने के लिए मैं अपनी भूमिका अदा कर पाऊंगा कि नहीं कर पाऊंगा। 

इन सारे मानकों से अपने परिवार का लेखा-जोखा लेकर हमारे देश में आज भी स्वः प्रेरणा से एक छोटा वर्ग परिवार को सीमित करके, अपने परिवार का भी भला करता है और देश का भला करने में बहुत बड़ा योगदान देता है। ये सभी सम्मान के अधिकारी हैं, ये आदर के अधिकारी हैं। छोटा परिवार रखकर भी वह देश भक्ति को ही प्रकट करते हैं। 

वो देशभक्ति को अभिव्यक्त करते हैं। मैं चाहूंगा कि हम सभी समाज के लोग इनके जीवन को बारीकी से देखें कि उन्होंने अपने परिवार में जनसंख्या वृद्धि से अपने-आपको बचा करके परिवार की कितनी सेवा की है। देखते ही देखते एक दो पीढ़ी नहीं, परिवार कैसे आगे बढ़ता चला गया है, बच्चों ने कैसे शिक्षा पाई है, वह परिवार बीमारी से मुक्त कैसे है।

वह परिवार अपनी प्राथमिक आवश्यकताओं को कैसे बढ़िया ढंग से पूरा करता है। हम भी उनसे सीखें और हमारे घर में किसी भी शिशु के आने से पहले हम सोचें कि जो शिशु मेरे घर में आएगा, क्या उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मैंने अपने-आपको तैयार कर लिया है? क्या मैं उसको समाज के भरोसे ही छोड़ दूंगा? मैं उसको उसके नसीब पर ही छोड़ दूंगा? कोई मां-बाप ऐसा नहीं हो सकता है, जो अपने बच्चों को जन्म देकर इस प्रकार की जिंदगी जीने के लिए मजबूर होने दें और इसलिए एक सामाजिक जागरूकता की आवश्यकता है।

जिन लोगों ने यह बहुत बड़ी भूमिका अदा की है, उनके सम्मान की आवश्यकता है, और उन्हीं के प्रयासों के उदाहरण लेकर समाज के बाकी वर्ग, जो अभी भी इससे बाहर हैं, उनको जोड़कर जनसंख्या विस्फोट- इसकी हमें चिंता करनी ही होगी।

सरकारों को भी भिन्न-भिन्न योजनाओं के तहत आगे आना होगा। चाहे राज्य सरकार हो, केंद्र सरकार हो- हर किसी को इस दायित्व को निभाने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर चलना होगा। हम अस्वस्थ समाज नहीं सोच सकते, हम अशिक्षित समाज नहीं सोच सकते। 21वीं सदी के भारत में सपनों को पूरा करने का सामर्थ्य व्यक्ति से शुरू होता है, परिवार से शुरू होता है लेकिन अगर आबादी शिक्षित नहीं है, तंदुरुस्त नहीं है, तो न ही वह घर सुखी होता है, न ही वह देश सुखी होता है।

जन आबादी शिक्षित हो, सामर्थ्यवान हो, योग्य हो और अपनी इच्छा और आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए, उपयुक्त माहौल प्राप्त करने के लिए संसाधन उपलब्ध हों, तो मैं समझता हूं कि देश इन बातों को पूर्ण कर सकता है।

मेरे प्यारे देशवासियों, आप भलीभांति जानते हैं कि भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद ने हमारे देश का कल्पना से परे नुकसान किया है और दीमक की तरह हमारे जीवन में घुस गया है। उसको बाहर निकालने के लिए हम लगातार प्रयास कर रहे हैं। सफलताएं भी मिली हैं, लेकिन बीमारी इतनी गहरी है, बीमारी इतनी फैली हुई है कि हमें और अधिक प्रयास, और वह भी सिर्फ सरकारी स्तर पर नहीं, हर स्तर पर करते ही रहना पड़ेगा, और ऐसा निरंतर करते रहना पड़ेगा।

एक बार में सारा काम नहीं होता, बुरी आदतें पुरानी बीमारी जैसी होती हैं, कभी ठीक हो जाती हैं, लेकिन मौका मिलते ही फिर से बीमारी आ जाती हैं। वैसे ही यह एक ऐसी बीमारी है, जिसको हमने निरंतर टेक्नोलॉजी का उपयोग करते हुए इसको निरस्त करने की दिशा में कई कदम उठाए हैं। हर स्तर पर ईमानदारी और पारदर्शिता को बल मिले, इसके लिए भी भरसक प्रयास किए गए हैं।

आपने देखा होगा पिछले पांच साल में भी, इस बार आते ही सरकार में बैठे हुए अच्छे-अच्छे लोगों की छुट्टी कर दी गई। हमारे इस अभियान में जो रुकावट बनते थे, उनसे कहा गया कि आप अपना कारोबार कर लीजिए, अब देश को आपकी सेवाओं की जरूरत नहीं है।

मैं स्पष्ट मानता हूं, व्यवस्थाओं में बदलाव होना चाहिए, लेकिन साथ-साथ सामाजिक जीवन में भी बदलाव होना चाहिए। सामाजिक जीवन में बदलाव होना चाहिए, उसके साथ-साथ व्यवस्थाओं को चलाने वाले लोगों के दिल-दिमाग में भी बदलाव बहुत अनिवार्य होता है। तभी जाकर हम इच्छित परिणामों को प्राप्त कर सकते हैं।

भाइयों और बहनों, देश आजादी के इतने साल बाद एक प्रकार से परिपक्व हुआ है। हम आजादी के 75 साल मनाने जा रहे हैं। तब यह आजादी सहज संस्कार, सहज स्वभाव, सहज अनुभूति, यह भी आवश्यक होती है। मैं अपने अफसरों के साथ जब बैठता हूं तो एक बात करता हूं, सार्वजनिक रूप से तो बोलता नहीं था लेकिन आज मन कर रहा है तो बोल ही दूं। 

मैं अपने अफसरों के बीच बार-बार कहता हूं कि क्या आजादी के इतने सालों के बाद रोजमर्रा की जिंदगी में, सरकारों का जो दखल है सामान्य नागरिक के जीवन में, क्या हम उस दखल को कम नहीं कर सकते? खत्म नहीं कर सकते हैं? आजाद भारत का मतलब मेरे लिए यह है कि धीरे-धीरे सरकारेंलोगों की जिंदगी से बाहर आएं, लोग अपनी जिंदगी के निर्णय करने के लिये आगे बढ़ने के लिये, सारे रास्ते उनके लिये खुले होने चाहिए। 

मनमर्जी पड़े उस दिशा में, देश के हित में और परिवार की भलाई के लिये स्वयं के सपनों के लिए आगे बढ़ें, ऐसा ईको सिस्टम हमको बनाना ही होगा। इसलिये सरकार का दबाव नहीं होना चाहिए, लेकिन साथ-साथ जहां मुसीबत के पल हों, तो सरकार का अभाव भी नहीं होना चाहिए। न सरकार का दवाब हो, न सरकार का अभाव हो, लेकिन हम सपनों को लेकर आगे बढ़ें। सरकार हमारे एक साथी के रूप में हर पल मौजूद हो। जरूरत पड़े तो लगना चाहिए कि हां कोई है, चिंता का विषय नहीं है। क्या उस प्रकार की व्यवस्थाएं हम विकसित कर सकते हैं?

हमने गैर-जरूरी कई कानूनों को खत्म किया है। गत पांच वर्ष में एक प्रकार से मैंने प्रतिदिन एक गैर-जरूरी कानून खत्म किया था। देश के लोगों तक शायद यह बात पहुंची नहीं होगी। हर दिन एक कानून खत्म किया था, करीब-करीब 1450 कानून खत्म किए थे। सामान्य मानव के जीवन से बोझ कम हो। अभी सरकार को 10 हफ्ते हुए, अभी तो इन 10 हफ्तों में 60 ऐसे कानूनों को खत्म कर दिया है।

ईज ऑफ लिविंग (जीने में आसानी) यह आजाद भारत की आवश्यकता है और इसलिये हम इस पर बल देना चाहते हैं, उसी को आगे ले जाना चाहते हैं। आज ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (व्यापार करने में आसानी) में हम काफी प्रगति कर रहे हैं। पहले 50 में पहुंचने का सपना है, उसके लिये कई रिफॉर्म करने की जरूरत होगी, कई छोटी-मोटी रुकावटें हैं। 

कोई व्यक्ति छोटा सा उद्योग करना चाहता है या कोई छोटा-सा काम करना चाहता है, तो यहां फॉर्म भरो, उधर फॉर्म भरो, इधर जाओ, उस ऑफिस जाओ, सैकड़ों ऑफिसों में चक्कर लगाने जैसी परेशानियों में उलझा रहता है, उसका मेल ही नहीं बैठता है। 

इनको खत्म करते-करते, रिफॉर्म करते-करते, केंद्र और राज्यों को भी साथ लेते-लेते, नगरपालिका-महानगरपालिकाओं को भी साथ लेते-लेते, हम ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के काम में बहुत कुछ करने में सफल हुए हैं। और दुनिया में भी विश्वास पैदा हुआ है कि भारत जैसा इतना बड़ा विकाशसील देश इतना बड़ा सपना देख सकता है और इतनी बड़ी जंप लगा सकता है। 

ईज ऑफ डूइंग बिजनेस तो एक पड़ाव है, मेरी मंजिल तो है ईज ऑफ लिविंग, सामान्य मानव के जीवन में उसको सरकारी काम में कोई मशक्कत न करनी पड़े, उसके हक उसको सहज रूप से मिले और इसलिए हमें आगे बढ़ने की जरूरत है, हम उस दिशा में काम करना चाहते हैं।

मेरे प्यारे देशवासियों, हमारा देश आगे बढ़े, लेकिन वृद्धिशील प्रगति, उसके लिए देश अब ज्यादा इंतजार नहीं कर सकता है, हमें हाई जंप लगानी पड़ेगी, हमें छलांग लगानी पड़ेगी, हमें हमारी सोच को भी बदलना पड़ेगा। भारत को वैश्विक बेंचमार्क के बराबर लाने के लिये हमारे आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर, उसकी ओर भी जाना पड़ेगा और कोई कुछ भी कहे कोई कुछ भी लिखे, लेकिन सामान्य मानव का सपना अच्छी व्यवस्थाओं का होता है। अच्छी चीज उसे अच्छी लगती हैं, उसकी उसमें रुचि बनती है। 

इसलिए हमने तय किया है कि इन कालखंड में 100 लाख करोड़ रुपया आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए लगाए जाएंगे, जिससे रोजगार भी मिलेगा, जीवन में भी नई व्यवस्था विकसित होगी जो आवश्यकताओं की पूर्ति भी करेगी। चाहे सागरमाला प्रोजक्ट हो, चाहे भारतमाला प्रोजेक्ट हो, चाहे आधुनिक रेलवे स्टेशन बनाने हों या बस स्टेशन बनाने हों या एयरपोर्ट बनाने हों, चाहे आधुनिक अस्पताल बनाने हों, चाहे विश्व स्तर के शिक्षण संस्थानों का निर्माण करना हो, इंफ्रास्ट्रक्चर की दृष्टि से भी इन सभी चीजों को हम आगे बढ़ाना चाहते हैं। अब देश में बंदरगाह की भी आवश्यकता है। सामान्य जीवन का भी मन बदला है। हमें इसे समझना होगा।

पहले एक जमाना था कि अगर कागज पर सिर्फ निर्णय हो जाए कि एक रेलवे स्टेशन फलाना इलाके में बनने वाला है, तो महीनों तक, सालों तक एक सकारात्मक गूंज बनी रहती थी कि चलो हमारे यहां नजदीक में अब नया रेलवे स्टेशन आ रहा है। आज वक्त बदल चुका है। आज सामान्य नागरिक रेलवे स्टेशन मिलने से संतुष्ट नहीं है, वो तुरंत पूछता है, वंदे भारत एक्सप्रेस हमारे इलाके में कब आएगी? उसकी सोच बदल गई है। 

अगर हम एक बढ़िया से बढ़िया बस स्टेशन बना दें, पांच सितारा रेलवे स्टेशन बना दें तो वहां का नागरिक ये नहीं कहता है साहब आज बहुत बढ़िया काम किया है। वो तुरंत कहता है- साहब हवाई अड्डा कब आएगा? यानी अब उसकी सोच बदल चुकी है। कभी रेलवे के स्टॉपेज से संतुष्ट होने वाला मेरा देश का नागरिक बढ़िया से बढ़िया रेलवे स्टेशन मिलने के बाद तुरंत कहता है- साहब बाकी तो ठीक है, हवाई अड्डा कब आएगा?

पहले किसी भी नागरिक को मिलें तो कहता था- साहब, पक्की सड़क कब आएगी? हमारे यहां पक्की सड़क कब बनेगी? आज कोई मिलता है तो तुरंत कहता है- साहब, चार लेन वाला रोड बनेगा कि छह लेन वाला? सिर्फ पक्की सड़क तक वो सीमित रहना नहीं चाहता और मैं मानता हूं आकांक्षी भारत के लिए ये बहुत बड़ी बात होती है।

पहले गांव के बाहर बिजली का खंभा ऐसे ही नीचे लाकर सुला दिया हो तो लोग कहते हैं कि चलो भाई बिजली आई, अभी तो खंभा नीचे पड़ा हुआ है, गाड़ा भी नहीं है। आज बिजली के तार भी लग जाएं, घर में मीटर भी लग जाएं तो वो पूछता है- साहब, 24 घंटे बिजली कब आएगी? अब वो खंभे, तार और मीटर से संतुष्ट नहीं है।

पहले जब मोबाइल आया, तो उनको लगता था मोबाइल फोन आ गया। वो एक संतोष का अनुभव करता था। लेकिन आज वो तुरंत चर्चा करने लगता है कि डाटा की स्पीड क्या है? ये बदलते हुए मिजाज को, बदलते हुए वक्त को हमें समझना होगा और उसी प्रकार से वैश्विक बेंचमार्क के साथ हमें अपने देश को आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ- क्लीन एनर्जी हो, गैस आधारित अर्धव्यवस्था हो, गैस ग्रिड हो, ई-मोबिलिटी हो, ऐसे अनेक क्षेत्रों में हमें आगे बढ़ना है।

मेरे प्यारे देशवासियों, आमतौर पर हमारे देश में सरकारों की पहचान ये बनती रही कि सरकार ने फलाने इलाके के लिए क्या किया, फलाने वर्ग के लिए क्या किया, फलाने समूह के लिए क्या किया? आमतौर पर क्या दिया, कितना दिया, किसको दिया, किसको मिला, उसी के आसपास सरकार और जनमानस चलते रहे और उसको अच्छा भी माना गया। मैं भी, शायद उस समय की मांग रही होगी, आवश्यकता रही होगी लेकिन अब किस को क्या मिला, कैसे मिला, कब मिला, कितना मिला। 

इन सबके रहते हुए भी हम सब मिल करके देश को कहां ले जाएंगे, हम सब मिल करके देश को कहां पहुंचाएगे, हम सब मिल करके देश के लिए क्या अचीव करेंगे, इन सपनों को ले करके जीना, जूझना और चल पड़ना ये समय की मांग है। और इसलिए पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का सपना संजोया है। 130 करोड़ देशवासी अगर छोटी-छोटी चीजों को लेकर चल पड़े तो पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था, कई लोंगो को मुश्किल लगता है, वो गलत नहीं हो सकते, लेकिन अगर मुश्किल काम नहीं करेंगे तो देश आगे कैसे बढेगा? 

मुश्किल चुनौतियों को नहीं उठाएंगे तो चलने का मिजाज़ कहां से बनेगा? मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी हमें हमेशा ऊंचे निशान रखने चाहिए और हमने रखा है। लेकिन वो हवा में नहीं है। आजादी के 70 साल बाद हम दो ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी पर पहुंचे थे, 70 साल की विकास यात्रा ने हमें दो ट्रिलियम डॉलर की इकोनॉमी पर पहुंचाया था। लेकिन 2014 से 2019, पांच साल के भीतर-भीतर हम लोग दो से तीन ट्रिलियन पहुंच गए, एक ट्रिलियन डॉलर हमने जोड़ दिया। 

अगर पांच साल में, 70 साल में जो हुआ उसमें इतना बड़ा जंप लगाया तो आने वाले पांच साल में हम पांच ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बन सकते है, और ये सपना हर हिंदुस्तानी का होना चाहिए। जब इकोनॉमी बढ़ती है तो जीवन भी बेहतर बनाने की सुविधा बनती है। छोटे-से-छोटे व्यक्ति के सपनों को साकार करने के लिए अवसर पैदा होते हैं। और ये अवसर पैदा करने के लिए देश के आर्थिक क्षेत्र में हमें इस बात को आगे ले जाना है।

जब हम सपना देखते हैं कि देश के किसान की आय दो गुनी होनी चाहिए, जब हम सपना देखते है कि आजादी के 75 साल में हिंदुस्तान में कोई परिवार, गरीब से गरीब भी, उसका पक्का घर होना चाहिए। जब हम सपना देखते हैं कि आजादी के 75 साल हों तब देश के हर परिवार के पास बिजली होनी चाहिए, जब हम सपना देखते है कि आजादी के 75 साल हो, तब हिंदुस्तान के हर गांव में ऑप्टिकल पाइबर नेटवर्क हो, ब्रॉडबैंड की कनेक्टिविटी हो, दूरस्थ शिक्षा की सुविधा हो।

हमारी समुद्री संपत्ति, नीली अर्थव्यवस्था इस क्षेत्र को हम बल दें। हमारे मछुआरे भाइयों-बहनों को हम ताकत दें। हमारे किसान अन्नदाता हैं, ऊर्जादाता बनें। हमारे किसान, ये भी निर्यातक क्यों न बनें? दुनिया के अंदर हमारे किसानों के द्वारा पैदा की हुई चीजों का डंका क्यों न बजे। इन सपनों को ले करके हम चलना चाहते हैं। हमारे देश को निर्यात बढ़ाना ही होगा, हम सिर्फ दुनिया, हिंदुस्तान को बाजार बना करके देखे, हम भी दुनिया के बाजार में पहुंचने के लिए भरसक प्रयास करें।
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