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इस तरह बदल रही राजस्थान की सूरत, रेगिस्तानी इलाकों में भी आ रही हरियाली

Mon, 17 Sep 2018 06:56 PM IST
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 17 Sep 2018 06:56 PM IST
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Rajasthan is changing by rain water harvesting
अमर उजाला फोटो

भारत ही नहीं पूरी दुनिया में साफ पानी की उपलब्धता एक बड़ा संकट बनती जा रही है। देश के दूर-दराज क्षेत्रों की तो बात ही क्या, आज राजधानी दिल्ली में ही कई ऐसे इलाके हैं जहां लोगों को पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। देश के कई इलाकों में पानी की कमी के कारण खेत रेगिस्तान में बदलते जा रहे हैं।

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किसानों को खेती तो क्या, मवेशियों को पालना भी दूभर होता जा रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले समय में साफ पानी की उपलब्धता दुनिया की सबसे बड़ी समस्या बन सकती है। आशंका तो यहां तक है कि पीने का पानी अगले विश्वयुद्ध का कारण भी बन सकता है।
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इस समस्या का सबसे बड़ा कारण यह है कि हर व्यक्ति को पीने के लिए पानी की आवश्यकता है, लेकिन इसको बचाने की कोशिश कोई नहीं कर रहा है। शहरों के बढ़ते कंक्रीट से दबे क्षेत्रों के कारण पानी भूगर्भ के अंदर नहीं जा रहा है, लेकिन उसका दोहन लगातार जारी है। शहरों के लगातार हो रहे विस्तार के कारण नए-नए क्षेत्रों में वनों की अंधाधुंध कटाई जोरों से चल रही है। इससे होने वाली वर्षा में भी कमी आ रही है जिसके कारण जल की समस्या और गंभीर होती चली जा रही है।

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राजस्थान में पेयजल की समस्या और उसका हल

Rajasthan is changing by rain water harvesting
अमर उजाला फोटो

इस समस्या का निदान भी देश के उस हिस्से से निकल कर आया है जो खुद पानी की कमी के मामले में सबसे ऊपर हुआ करता है। राजस्थान देश का ऐसा भूभाग है जिसका नाम सामने आते ही लोगों के जेहन में रेतीली जमीन, दूर-दूर तक फैले रेगिस्तान और पानी की एक-एक बूंद को तरसते लोगों का चेहरा हमारे आंखों के सामने आ जाता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक राजस्थान देश के लगभग दस फीसदी भूभाग पर फैला हुआ है। यहां देश की लगभग 5.2 फीसदी आबादी रहती है। लेकिन पानी के मामले में इसके हाथ बेहद तंग हैं। देश के जलस्रोतों में केवल 1.6 फीसद पर ही राजस्थान का नियंत्रण है।

मजे की बात यह भी है कि इसी राजस्थान के कुछ इलाके जैसे माउंट आबू, डूंगर पुर और उदयपुर अपने प्राकृतिक सौंदर्य, हरियाली और महाराणाओं की तिलस्मी हकीकत वाली कहानियां लोगों को अपनी तरफ बहुत आकर्षित करती हैं। राजस्थान का आदिवासी क्षेत्र उदयपुर तो झीलों के शहर के नाम से जाना जाता है क्योंकि इस जिले में इतनी बड़ी और शानदार झीलें हैं जिन्हें देखे बिना वहां उनके होने की कल्पना करना संभव नहीं है। लेकिन सरकारी उपेक्षा और लोगों की जागरुकता की कमी के कारण झीलों का यह शहर भी रेगिस्तान में तब्दील होने लगा था।

कभी मध्यभारत के सबसे घने जंगलों से घिरा रहने वाला यह क्षेत्र खुद को रेगिस्तान बनते देख रहा था। किसानों को खेती को छोड़ना पड़ रहा था और उनके लिए जानवरों को पालना बेहद मुश्किल हो रहा था। जाहिर है कि इसके कारण लोगों की आर्थिक हालत बेहद खराब होने लगी थी और लोग गांव छोड़कर जाने लगे थे। लेकिन इसी बीच वसुंधरा सरकार ने मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान (एमजेएसए) का कार्यक्रम चालू किया जो अब इन्हीं क्षेत्रों को इनकी पुरानी पहचान देने की एक सकारात्मक कोशिश कर रहा है। 

कैसे पानी बचा रहा उदयपुर

Rajasthan is changing by rain water harvesting
अमर उजाला फोटो

उदयपुर के जिला कलेक्टर विष्णुचरण मल्लिक ने अमर उजाला को बताया कि पानी की घटती उपलब्धता इस क्षेत्र में भीषण आर्थिक और सामाजिक समस्याएं पैदा कर रही थी, लेकिन एमजेएसए के कारण अब तस्वीर बदलने लगी है। उन्होंने बताया कि उदयपुर जिले में कहीं बाहर से पानी लाना संभव नहीं था। हमारे पास एक ही रास्ता था कि वर्षा जल की एक-एक बूंद को संजोया जाए। उन्हें भूगर्भ में डाला जाए और लगातार उनका स्तर बनाए रखा जाए। चार साल पहले इस योजना की शुरुआत हुई थी। हमने पहाड़ों पर होने वाली बारिश की एक-एक बूंद को संजोने की योजना बनाई।

योजना के तहत पहाड़ों पर गिरने वाले पानी को कुछ-कुछ दूरी पर ट्रेंच (छोटी खाई) बनाकर रोका गया। थोड़ी-थोड़ी दूर पर अनेक ट्रेंच बनाई गई। इससे बारिश का पानी बहकर निकल नहीं जाने पाता था, बल्कि वह इन्हीं छोटी खाइयों में भर जाता था और धीरे-धीरे जमीन के अंदर जाने लगा। जो जल ट्रेंच से ऊपर होकर बहता था, वह कुछ नीचे बने दूसरे ट्रेंच में रह जाता था।

इसी तरह एक के बाद एक ट्रेंच में पानी संग्रहित होकर भूगर्भ में भेजा जाने लगा। सभी ट्रेंच से पानी बहकर जाने के बाद छोटे-छोटे तालाबों, जिन्हें एमएस टैंक का नाम दिया गया है, में इकट्ठा हो जाता है। इस तरह बारिश की हर बूंद को संग्रहित कर लिया जाता है और उसके बहकर बेकार होने की गुंजाइश लगभग खत्म हो जाती है।

कितना हुआ लाभ

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अमर उजाला फोटो

उदयपुर के जिला कलेक्टर विष्णुचरण मल्लिक के मुताबिक इस कार्य से उन्हें अद्भुत सफलता मिली है। उदयपुर के जिस क्षेत्र में भूगर्भ 16 मीटर से नीचे चला गया था, वहां आज औसतन एक मीटर से भी कम (85 सेंटीमीटर) तक में भी पानी मिल जाता है। यह कल्पना से परे है कि सिर्फ दो-तीन सालों की मेहनत से इस जिले की तस्वीर बदलने लगी है। जो किसान खेती और घर-बार छोड़कर बाहर जाने लगे थे, वे वापस आ रहे हैं।

बारिश का पानी छोटे-छोटे तालाबों में इकट्ठा होने से अब वे खेती के लिए पानी का उपयोग कर रहे हैं। साल में एक की बजाय दो फसल पैदा कर रहे हैं। वर्षा जल के संग्रहण से क्षेत्र में हरियाली बढ़ी है। इससे किसान जानवरों को भी पालने लगे हैं जिससे उनकी अतिरिक्त आमदनी में इजाफा हुआ है। एक किसान के मुताबिक मवेंशियों का दूध बेचकर ही उसे प्रतिमाह तीन से चार हजार रुपये की अतिरिक्त आय होने लगी है जिससे उसकी किस्मत बदल गई है।

किसानों को प्रोजेक्ट से जोड़ने की चुनौती

राजस्थान नदी बेसिन एवं जल संसाधन आयोजन प्राधिकरण के अध्यक्ष श्रीराम वेदिरे ने बताया कि किसी भी योजना की सफलता के लिए बेहद जरुरी होता है कि यह योजना जिसके लिए बनाई जा रही है, वे उसे समझें और उसे अपना समझें। इसके बिना उनकी भागीदारी नहीं मिलती जिससे  योजना की सफलता संदिग्ध हो जाती है। इसी कारण से उन्होंने उदयपुर के गांव वाले लोगों से सीधा संपर्क बनाना शुरु किया।

ग्राम पंचायतों के अध्यक्षों से उन्हें प्रेरित करने लगा। उन्होंने कहा कि जल संग्रहण के लिए बनने उन्होंने उन्हीं गांव वालों को रोजगार दिया जिनके लिए यह योजना बनाई जा रही थी। इससे उनके घर के पास ही उन्हें रोजगार मिला। एक ही वर्ष के अंदर जब उन्हें इसका लाभ मिलने लगा तब वे खुद ही प्रेरित होकर जुड़ने लगे। आज वे रोजगार के लिए ही नहीं, श्रमदान के लिए भी ट्रेंच और तालाबों की खुदाई में साथ दे रहे हैं। क्योंकि उनका मानना है कि यह काम  उनके और उनके बच्चों के लिए हो रहा है।

उन्होंने कहा कि किसी को भी यह देखकर आश्चर्य हो सकता है कि आज उन्हें इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए इन्हीं लोगों से चंदा भी मिल रहा है जो करोड़ों में है। सरकार की सहायता अतिरिक्त है। आज उदयपुर की सूखी झीलों में जिंदगी लौट आई है। झीलों में पानी की मात्रा बढ़ने से यहां पर्यटकों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है जो यहां के होटल उद्योग, ट्रांसपोर्टेशन और कला-संस्कृति को बढ़ावा मिल रहा है। पहाड़ों पर हरियाली बढ़ने से किसानों की खेती और और जिंदगी दोनों, खुशहाल हो गई है।

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