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Raisina Dialogue 2025: 'दुनिया का संतुलन बदला; हमें एक अलग व्यवस्था की जरूरत', तुलसी गबार्ड और जयशंकर ये बोले

Tue, 18 Mar 2025 11:48 AM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुमार विवेक Updated Tue, 18 Mar 2025 11:48 AM IST
सार

Raisina Dialogue 2025: नई दिल्ली में आयोजित प्रतिष्ठित रायसीना डायलॉग 2025 एक बार फिर वैश्विक नीति, कूटनीति और भू-राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं और विचारकों को एक मंच पर लेकर आया। इस वर्ष, बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन, संप्रभुता की रक्षा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में निष्पक्षता की बहस केंद्र में रही। वैश्विक राजनीति के दिग्गज इस मौके पर क्या-क्या बोले आइए जानते हैं।

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Raisina Dialogue 2025: Redefining Global Power Dynamics and the Need for a Fairer World Order, Know Updates
विदेश मंत्री एस जयशंकर। - फोटो : PTI

विस्तार

नई दिल्ली में आयोजित प्रतिष्ठित रायसीना डायलॉग 2025 एक बार फिर वैश्विक नीति, कूटनीति और भू-राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं और विचारकों को एक मंच पर लेकर आया। इस वर्ष, बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन, संप्रभुता की रक्षा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में निष्पक्षता की बहस केंद्र में रही। अपने संबोधन में अमेरिका की राष्ट्रीय खुफिया निदेशक, तुलसी गबार्ड ने भारत की समृद्ध संस्कृति और लोकतांत्रिक मूल्यों की सराहना की। उन्होंने ‘अलोहा’ और ‘नमस्ते’ जैसे शब्दों के आध्यात्मिक और गहरे अर्थ को समझाते हुए कहा कि ये केवल अभिवादन नहीं, बल्कि सम्मान और एकता का प्रतीक हैं। दूसरी ओर, भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कार्यक्रम के दौरान पश्चिमी देशों की नीतियों पर सवाल खड़े किए।

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भारत के इतिहास और लोकतंत्र को जानना एक गर्मजोशी भरा अनुभव: तुलसी

अपने मुख्य भाषण में, अमेरिका की राष्ट्रीय खुफिया निदेशक, तुलसी गबार्ड ने कहा, "... बहुत समय हो गया है, लेकिन इस देश के समृद्ध इतिहास और जीवंत लोकतंत्र को जानना हमेशा एक अद्भुत और गर्मजोशी भरा अनुभव होता है, जो वास्तव में हमारे दोनों देशों के बीच लंबे समय से मौजूद विशेष बंधन की नींव है। 'अलोहा' और 'नमस्ते' जैसे शब्द आम धारणा के विपरीत केवल अभिवादन नहीं हैं। वास्तव में इन दोनों के बहुत गहरे, आध्यात्मिक, शक्तिशाली अर्थ हैं, जो मेरे लिए, मेरे जीवन के मूल और हृदय में रहे हैं और मुझे आशा है कि ये रायसीना में सार्थक संवाद और बातचीत को प्रेरित करेंगे। जब हम एक-दूसरे को 'अलोहा' और 'नमस्ते' के साथ अभिवादन करते हैं, तो इसका वास्तव में मतलब यह होता है कि मैं आपके पास आ रहा हूं और सम्मान के साथ आपका अभिवादन कर रहा हूं।" 

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गबार्ड ने आगे कहा, "ये शब्द हमारे प्रत्येक हृदय में मौजूद शाश्वत दिव्य आत्मा की पहचान है। यह एक संकेत है कि हम सभी जुड़े हुए हैं, कि हम सभी ईश्वर की संतान हैं, चाहे हमारी जाति या धर्म, जातीयता, राजनीति, हमारी पृष्ठभूमि, हम कहां से आते हैं, कुछ भी हो। यह समाज में हमारी स्थिति से परे है। इस तरह से  अभिवादन करके, हम एक अधिक सार्थक और गहन आदान-प्रदान का खोल रहे हैं जो विभाजन और पक्षपात से परे है। यह विभाजन अक्सर हमारे बीच होने वाली बातचीत को विषाक्त कर देता है।"

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डॉ. एस. जयशंकर ने वैश्विक राजनीति में दोहरे मानदंडों पर किया कड़ा प्रहार

‘सिंहासन और कांटे: राष्ट्रों की अखंडता की रक्षा’ सत्र में भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने वैश्विक राजनीति में दोहरे मानदंडों पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सिद्धांतों को रेखांकित करते हुए सवाल उठाया कि वैश्विक मंच पर निष्पक्षता क्यों नहीं देखी जाती? उन्होंने भारत के कश्मीर मुद्दे और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए, साथ ही पश्चिमी देशों की राजनीति में हस्तक्षेप और सत्ता परिवर्तन की नीति पर खुलकर अपनी बात रखी।


विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने कहा, "हम सभी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की बात करते हैं। यह एक महत्वपूर्ण सिद्धांत और वैश्विक नियमों का आधार है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, किसी अन्य देश द्वारा किसी क्षेत्र पर सबसे लंबे समय तक अवैध उपस्थिति और कब्जा भारत के कश्मीर से जुड़ा है। हम संयुक्त राष्ट्र गए। जो आक्रमण था उसे विवाद में बदल दिया गया। हमलावर और पीड़ित को बराबर रखा गया। दोषी पक्ष कौन थे? यूके, कनाडा, बेल्जियम, ऑस्ट्रेलिया, यूएसए?"

हमें एक मजबूत और निष्पक्ष संयुक्त राष्ट्र की जरूरत: एस जयशंकर

जयशंकर ने कहा, "इसलिए मुझे माफ़ करें, मेरे पास उस पूरे विषय से जुड़े कुछ प्रश्न हैं... हम आज राजनीतिक हस्तक्षेप की बात करते हैं। जब पश्चिम दूसरे देशों में जाता है, तो यह लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का अनुसरण करता है। जब दूसरे देश पश्चिम में आते हैं, तो ऐसा लगता है कि उनका बहुत ही दुर्भावनापूर्ण इरादा हो जाता है। अगर हमें व्यवस्था की जरूरत है, तो निष्पक्षता होनी चाहिए... हमें एक मजबूत संयुक्त राष्ट्र की जरूरत है लेकिन एक मजबूत संयुक्त राष्ट्र के लिए एक निष्पक्ष संयुक्त राष्ट्र की जरूरत है... एक मजबूत वैश्विक व्यवस्था में मानकों में कुछ बुनियादी स्थिरता होनी चाहिए। हमारे पूर्व में म्यांमार में सैन्य तख्तापलट हुए हैं, ऐसा कतई नहीं होना चाहिए। हम उन्हें पश्चिम में और भी अधिक नियमित रूप से देखते हैं। पिछले आठ दशकों से दुनिया के कामकाज का ऑडिट करना और इसके बारे में ईमानदार होना और आज यह समझना महत्वपूर्ण है कि दुनिया में संतुलन और शेयरधारिता बदल गई है। हमें एक अलग बातचीत की जरूरत है। हमें एक अलग व्यवस्था की जरूरत है।"

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