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संसद में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान राहुल गांधी द्वारा ली गई झप्पी ने भाजपा नेताओं को भी रिझाया

Sun, 29 Jul 2018 01:51 PM IST
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sun, 29 Jul 2018 01:51 PM IST
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Rahul Gandhi's Zappi also sparks BJP leaders
अविश्वास प्रस्ताव के दौरान संसद में पीएम मोदी को गले लगाते कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी।

अविश्वास प्रस्ताव में राहुल गांधी ने बहुत अच्छा बोला। यह हम नहीं भाजपा के कुछ केन्द्रीय मंत्रियों की राय ने है। भाजपा के दो वरिष्ठ नेताओं का भी कहना है कि राहुल गांधी ने जितने समय संसद में अपनी बात रखी, एक-एक मिनट का पूरा सदुपयोग कर लिया। सूत्रों का कहना है कि इससे अधिक वह कुछ कर भी नहीं सकते थे। हालांकि इन सभी नेताओं को राहुल गांधी द्वारा अपने सहयोगी ज्योतिरादित्य सिंधिया को आंख मारना ठीक नहीं लग रहा है। सरकार के एक केन्द्रीय मंत्री ने निजी बातचीत में कहा कि राहुल गांधी को यहां थोड़ा सा संयम बरतना चाहिए था। इससे उनकी किरकिरी हो रही है।

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मंझ रहे हैं राहुल
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने राहुल गांधी द्वारा लोकसभा में दिया कलावती से जुड़ा भाषण याद किया। बोले तब वह राहुल थे। तब लग रहा था कि उन्हें परिपक्व होने में काफी समय लगेगा। लेकिन तब से आज में राहुल गांधी ने खुद में काफी परिवर्तन कर लिया है। सांसद का कहना है कि जब राहुल गांधी अविश्वास प्रस्ताव के दौरान सदन में बोलने के लिए खड़े हुए तो उन्हें कुछ खास उम्मीद नहीं लग रही थी। ऐसा लग रहा था कि थोड़ी देर में उनकी हूटिंग होने वाली है। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। वह बिना सबूत और तथ्य को पेश किए ही सत्ता पक्ष आरोप दर आरोप लगाने लगे। यह राहुल गांधी में आया बदलाव है।
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लोकसभा अध्यक्ष के पीछे से आते राहुल
एक केन्द्रीय मंत्री ने लगे हाथ सलाह दे डाली है। नाम न छापने की शर्त पर सूत्र का कहना है कि राहुल गांधी को लोकसभा में अध्यक्ष के आसन पर रहने और संसद के चलते रहने के दौरान विपक्ष की तरफ को पार करते हुए सत्ता पक्ष के दूसरे कोने पर बैठे प्रधानमंत्री के पास नहीं जाना चाहिए था। यह संसद की मर्यादा के उल्लंघन में आता है। कांग्रेस अध्यक्ष को चाहिए था कि वह अध्यक्ष के आसन के पीछे जाते और वहां से सत्ता पक्ष की तरफ मुड़ते। ऐसा होने के बाद तो कांग्रेस अध्यक्ष का अभियान हिट था। एक अन्य भाजपा के वरिष्ठ नेता को तीन चूक नजर आ रही है। पहली निर्मला सीतारमण आपे से बाहर चले जाना। फिर फ्रांस के साथ समझौते के दस्तावेज के पन्ने का अहसास कराते हुए सदन में अपनी बात रखना। दूसरी चूक राकेश सिंह से चर्चा की शुुरुआत कराना। तीसरी चूक प्रधानमंत्री द्वारा राहुल गांधी का जवाब देते हुए नाटकीय अंदाज में आ जाना। सूत्र का कहना है कि शुरू में गाड़ी पटरी से उतरी तो उतरती चली गई।
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भाजपा के कई सांसदों को लग रहा प्रधानमंत्री दबाव में हैं

भाजपा के कई सांसदों को लग रहा है कि प्रधानमंत्री कांग्रेस अध्यक्ष के दबाव में आ गए हैं। वह अपनी जनसभाओं में राहुल गांधी के आरोपों का जवाब देते नजर आ रहे हैं। लखनऊ में उनकी गरीबी में जनता का भागीदार होने का बयान भी पार्टी के नेता इसी नजरिए से देख रहे हैं। 2009 के चुनाव में भाजपा के लिए अहम भूमिका निभाने वाले एक नेता का सुझाव है कि भाजपा को इस समय वरिष्ठ नेताओं को अग्रिम मोर्चे पर लगाना चाहिए। इन नेताओं की जनता में एक छवि भी है और क्या कहना है, क्या नहीं समझते हैं। सूत्र का कहना है कि यदि 2019 में सत्ता में लौटना है तो ऐसा करना पड़ेगा। लेकिन सूत्र की सबसे बड़ी समस्या है कि पार्टी के फोरम पर या सरकार के न तो कोई उन्हें सुनेगा और न ही वह बोलना भी चाहते हैं।

राफेल डील से डर
भाजपा के नेताओं को राफेल डील का डर सताने लगा है। हालांकि उन्हें भरोसा है कि प्रधानमंत्री की जनता के बीच में लोकप्रियता बनी है, लेकिन यदि यह मुद्दा 2019 के लोकसभा चुनाव तक रह गया तो परेशानी बढ़ा देगा। पार्टी के एक केन्द्रीय मंत्री को पहले अनुमान था कि यह थोड़े दिन में समाप्त हो जाएगा। पहले वह सोच रहे थे कि गुजरात चुनाव के बाद समाप्त बो जाएगा। लेकिन अब उन्हें भी लग रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष की इस टीम इसे 2019 तक मुद्दा बनाने पर काम कर रही है।

मोदी से अच्छा नेता नहीं
भाजपा के नेता, सरकार के मंत्री कुछ मुद्दों को लेकर भले थोड़ा तंग चल रहे हैं, लेकिन जिन लोगों से बात हुई सबकी एक सुर में राय प्रधानमंत्री मोदी के पक्ष में है। सबका कहना है कि अभी भी प्रधानमंत्री देश के सबसे लोकप्रिय नेता हैं। प्रधानमंत्री की जनता में साख बनी है और लोग उनके साथ जुड़े हैं। कभी लालकृष्ण आडवाणी के करीबी रहे सूत्र के मुताबिक आज भी प्रधानमंत्री मोदी के मुकाबले न तो भाजपा में और न ही भारतीय राजनीति में कोई चेहरा है। प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष के बारे में भाजपा के नेताओं की यह राय भी काफी गजब की है। सबका मानना है कि वह दोनों पिछले कई दशक में भारतीय राजनीति को मिले सबसे ज्यादा सक्रिय नेताओं में से है। पार्टी के नेताओं को प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष की चुनाव प्रचार और जनता से कनेक्ट होने की तकनीक पर पूरा भरोसा है।

 

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