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वृंदावन के ब्रज गंधर्व ने नाटक कृष्णोत्सव से दर्शकों का मन मोह लिया, इस्कॉन नोएडा में किया मंचन
अमर शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Mon, 17 Sep 2018 07:49 PM IST
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राधा और गोपियों संग महारास करते भगवान श्री कृष्ण
- फोटो : Amar Ujala
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भगवान श्रीकृष्ण का रूप जितना आकर्षक है उनके नाम, गुण, लीलाएं भी उतने ही मनोहर हैं। राधा रानी के प्राकट्य दिवस राधाष्टमी की पूर्व संध्या पर 16 सितंबर को इस्कॉन नोएडा में 'कृष्णोत्सव' नृत्य-नाटिका का आयोजन किया गया। इस नाट्य प्रस्तुति में भगवान के वृंदावन की लीलाओं से लेकर मथुरा, द्वारका लीलाओं को बहुत खूबसूरती से पेश किया गया जो दर्शकों के दिल को छू गया।
दैवीय युगल राधाकृष्ण के मधुर लीलामृत को वृंदावन से आए नाट्य समूह 'ब्रज गंधर्व' ने प्रस्तुत किया। हालांकि भगवान अनंत हैं और इसी तरह उनकी लीलाएं भी अनंत हैं। इस प्रस्तुति में भगवान श्रीकृष्ण की वृंदावन, मथुरा, द्वारका की मुख्य लीलाओं को नृत्य-नाटिका के रूप में पेश करने की कोशिश की गई।
कष्णोत्सव में कृष्ण की भूमिका में थे राहुल राघव और राधा और रूकमिणी के किरदार को निभाया नाम चिंतामणि देवी दासी जी ने। वे इस नृत्य नाटिका की निर्देशक भी थीं और नृत्य संयोजन भी उन्होंने किया था। अमर उजाला से बातचीत में नाम चिंतामणि देवी ने बताया कि इस नृत्य-नाटिका के जरिये हमारा प्रयास है कि जो कृष्ण के चरित्र को नहीं जानते हैं कृष्ण के प्रति उनके हृदय में भक्ति का आगमन हो।
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नाटक की शुरुआत होती है वृंदावन के महारास से। इसमें कृष्ण राधा और अन्य गोपियों और सखियों के संग महारास खेल रहे हैं। हृदय को छू जाने वाले संगीत और खूबसूरत दृश्य संयोजन से मंच पर साक्षात वृंदावन का आभास होने लगा। इसके बाद कृष्ण का गोपियों से बिछड़ना, फिर मथुरा आगमन, कुब्जा उद्धार, कंस वध, उद्धव जी की बृज यात्रा को बहुत ही सजीव तरीके से दिखाया गया।
उद्धव जी भगवान कृष्ण के बहुत बड़े भक्त थे। उन्हें अपनी भक्ति पर घमंड हो गया था। लेकिन भगवान अपने भक्त के हृदय में किसी तरह की कोई मलिनता नहीं रहने देते इसलिए उन्हें गोपियों को संदेश देने के बहाने ब्रज भेजते हैं।
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दैवीय युगल राधाकृष्ण के मधुर लीलामृत को वृंदावन से आए नाट्य समूह 'ब्रज गंधर्व' ने प्रस्तुत किया। हालांकि भगवान अनंत हैं और इसी तरह उनकी लीलाएं भी अनंत हैं। इस प्रस्तुति में भगवान श्रीकृष्ण की वृंदावन, मथुरा, द्वारका की मुख्य लीलाओं को नृत्य-नाटिका के रूप में पेश करने की कोशिश की गई।
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कष्णोत्सव में कृष्ण की भूमिका में थे राहुल राघव और राधा और रूकमिणी के किरदार को निभाया नाम चिंतामणि देवी दासी जी ने। वे इस नृत्य नाटिका की निर्देशक भी थीं और नृत्य संयोजन भी उन्होंने किया था। अमर उजाला से बातचीत में नाम चिंतामणि देवी ने बताया कि इस नृत्य-नाटिका के जरिये हमारा प्रयास है कि जो कृष्ण के चरित्र को नहीं जानते हैं कृष्ण के प्रति उनके हृदय में भक्ति का आगमन हो।
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नाटक की शुरुआत होती है वृंदावन के महारास से। इसमें कृष्ण राधा और अन्य गोपियों और सखियों के संग महारास खेल रहे हैं। हृदय को छू जाने वाले संगीत और खूबसूरत दृश्य संयोजन से मंच पर साक्षात वृंदावन का आभास होने लगा। इसके बाद कृष्ण का गोपियों से बिछड़ना, फिर मथुरा आगमन, कुब्जा उद्धार, कंस वध, उद्धव जी की बृज यात्रा को बहुत ही सजीव तरीके से दिखाया गया।
उद्धव जी भगवान कृष्ण के बहुत बड़े भक्त थे। उन्हें अपनी भक्ति पर घमंड हो गया था। लेकिन भगवान अपने भक्त के हृदय में किसी तरह की कोई मलिनता नहीं रहने देते इसलिए उन्हें गोपियों को संदेश देने के बहाने ब्रज भेजते हैं।
राधा और गोपियों की भक्ति देख उद्धव जी का घमंड टूटा
उद्धव जी से ब्रज जाने को कहते हुए कृष्ण जी
- फोटो : Amar Ujala
बृज पहुंचकर उद्धव जी गोपियों से कहते हैं, "तुम्हारे इस दुख को दूर करने के लिए कृष्ण ने मुझे यहां भेजा है। अब तुम अपने मन को निर्गुण और निराकार ब्रह्म में लगाकर ध्यान करो, केवल यही तुम्हें शांति दिलाएगा।"
इस पर राधा कहती हैं, "किंतु भईया हमारे पास तो केवल एक ही मन था जो कृष्ण के साथ चला गया अब हम दूसरा मन कहां से लेकर आएं। यदि कृष्ण से मिलो तो उन्हें हमारा एक संदेश अवश्य देना कि वे अपने ज्ञान योग और तप की शिक्षा वापस मथुरा ले जाये और वहीं की स्त्रियों को दे।
यदि हमें कुछ देना ही चाहते हैं तो कृपा कर केवल एक बार अपना सुंदर सलोना मुख फिर दिखला दे। फिर उम्र भर हम उनसे ना कुछ कहेंगी, न कुछ मांगेंगी। इसके अलावा हमें कुछ नहीं चाहिए।"
राधा और गोपियों के हृदय में कृष्ण के लिए प्रेम को देखकर उद्धव जी का घमंड टूट जाता है। उद्धव जी कहते हैं, "इतना निश्छल प्रेम! ऐसी अहैतुकी भक्ति! योगी जनों की करोड़ों करोड़ों जन्मों की तपस्या भी लज्जित हो जाए उनकी भक्ति के आगे। जो इनका स्थान है वह तो लक्षमियों के लिए भी दुर्लभ है। अद्वितीय है इनका सौभाग्य कि स्वयं श्री कृष्ण, जो कि ब्रहम का स्रोत हैं, वो इनका आलिंगन करते हैं।"
वे भगवान से प्रार्थना करते हैं कि अगले जन्म में मुझे वृंदावन में कोई घास का तिनका या कोई लता बना देना ताकि आपकी सबसे बड़ी भक्त गोपियों के पैरों की धूल मुझ पर पड़ती रहे। यही मेरे लिए परम सिद्धि होगी। मैं श्रीमति राधिका के चरणों में शत शत प्रणाम करता हूं।"
इस दृश्य ने दर्शकों को भाव विभोर कर दिया।
इस पर राधा कहती हैं, "किंतु भईया हमारे पास तो केवल एक ही मन था जो कृष्ण के साथ चला गया अब हम दूसरा मन कहां से लेकर आएं। यदि कृष्ण से मिलो तो उन्हें हमारा एक संदेश अवश्य देना कि वे अपने ज्ञान योग और तप की शिक्षा वापस मथुरा ले जाये और वहीं की स्त्रियों को दे।
यदि हमें कुछ देना ही चाहते हैं तो कृपा कर केवल एक बार अपना सुंदर सलोना मुख फिर दिखला दे। फिर उम्र भर हम उनसे ना कुछ कहेंगी, न कुछ मांगेंगी। इसके अलावा हमें कुछ नहीं चाहिए।"
राधा और गोपियों के हृदय में कृष्ण के लिए प्रेम को देखकर उद्धव जी का घमंड टूट जाता है। उद्धव जी कहते हैं, "इतना निश्छल प्रेम! ऐसी अहैतुकी भक्ति! योगी जनों की करोड़ों करोड़ों जन्मों की तपस्या भी लज्जित हो जाए उनकी भक्ति के आगे। जो इनका स्थान है वह तो लक्षमियों के लिए भी दुर्लभ है। अद्वितीय है इनका सौभाग्य कि स्वयं श्री कृष्ण, जो कि ब्रहम का स्रोत हैं, वो इनका आलिंगन करते हैं।"
वे भगवान से प्रार्थना करते हैं कि अगले जन्म में मुझे वृंदावन में कोई घास का तिनका या कोई लता बना देना ताकि आपकी सबसे बड़ी भक्त गोपियों के पैरों की धूल मुझ पर पड़ती रहे। यही मेरे लिए परम सिद्धि होगी। मैं श्रीमति राधिका के चरणों में शत शत प्रणाम करता हूं।"
इस दृश्य ने दर्शकों को भाव विभोर कर दिया।
कंस का वध किया
कंस के साथ संवाद करते कृष्ण और बलराम
- फोटो : Amar Ujala
विशेष रूप से माखन चोरी, गोपियों के साथ नृत्य को देखकर दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए। वहीं कंस वध की लीला ने दर्शकों का आत्मविश्वास बढ़ाया कि भगवान भक्तों की रक्षा करने के लिए हमेशा उत्सुक रहते हैं।
इसके बाद श्रीकृष्ण द्वारका लीला में प्रवेश करते हैं। रुकमिणी जी का द्वारकाधीश को पत्र लिखना, फिर सुदामा चरित्र।
इसके बाद श्रीकृष्ण द्वारका लीला में प्रवेश करते हैं। रुकमिणी जी का द्वारकाधीश को पत्र लिखना, फिर सुदामा चरित्र।
सुदामा लीला: कृष्ण तो सिर्फ भाव के भूखे हैं
महल के मुख्य द्वार पर सुदामा से गले मिलते कृष्ण
- फोटो : Amar Ujala
द्वारका में सुदामा के साथ भगवान की लीला का बहुत मार्मिक चित्रण किया गया। भगवान ने अपने आंसू से अपने मित्र सुदामा के पैर पखारे और उसके भेंट स्वरूप लाए गए रूखे-सूखे चावल को बहुत चाव से खाया।
सुदामा अपने भेंट को छुपाते हुए कृष्ण से कहते हैं कि ये आपके लायक नहीं। इस पर भगवान कहते हैं मैं तो सिर्फ प्रेम का भूखा हूं। मैं अपने भक्त की संपन्नता नहीं बल्कि सिर्फ उसके भाव देखता हूं। यह दृश्य दर्शकों के हृदय में उतर जाता है और रूआंसा कर देता है।
सुदामा अपने भेंट को छुपाते हुए कृष्ण से कहते हैं कि ये आपके लायक नहीं। इस पर भगवान कहते हैं मैं तो सिर्फ प्रेम का भूखा हूं। मैं अपने भक्त की संपन्नता नहीं बल्कि सिर्फ उसके भाव देखता हूं। यह दृश्य दर्शकों के हृदय में उतर जाता है और रूआंसा कर देता है।
कृष्ण का कुरुक्षेत्र में बृजवासियों से पुनर्मिलन
मैया यशोदा कृष्ण को दुलारते हुए
- फोटो : Amar Ujala
सुदामा लीला के बाद भगवान का कुरुक्षेत्र में ब्रजवासियों से पुनर्मिलन होता है। मैया यशोदा और नंद बाबा कृष्ण की अनुपस्थिति में बहुत दुखी हो जाते हैं। लेकिन जब कृष्ण को दोबारा अपनी आंखों के सामने देखते हैं तो उनके नेत्र छलछला जाते हैं और वे खूब रोते हैं।
मैया कहती हैं, "तुम्हारी अनुपस्थिति में मैंने हर उस दिन के लिए खुद को कोसा कि क्यों मैंने तुम्हें बचपन में बांधा और मटकी फोड़ देने पर डांटा।" इस पर कृष्ण कहते हैं, "नहीं मैया मैं कर्तव्य से विवश हो गया था, लेकिन मैं तुम्हें हर क्षण याद करता था।" इस भावप्रण दृश्य में मैया यशोदा और नंद बाबा कृष्ण को अपने हाथों से माखन खिलाते हैं।
कृष्णोत्सव के आखिर में फिर महारास होता है। नाम चिंतामणि देवी दासी बताती हैं कि भगवान वृंदावन छोड़कर कहीं नहीं जाते। सदा वृंदावन में ब्रजवासियों के साथ रहते हैं। इसलिए वृंदावन सबसे पवित्र स्थान है।
मैया कहती हैं, "तुम्हारी अनुपस्थिति में मैंने हर उस दिन के लिए खुद को कोसा कि क्यों मैंने तुम्हें बचपन में बांधा और मटकी फोड़ देने पर डांटा।" इस पर कृष्ण कहते हैं, "नहीं मैया मैं कर्तव्य से विवश हो गया था, लेकिन मैं तुम्हें हर क्षण याद करता था।" इस भावप्रण दृश्य में मैया यशोदा और नंद बाबा कृष्ण को अपने हाथों से माखन खिलाते हैं।
कृष्णोत्सव के आखिर में फिर महारास होता है। नाम चिंतामणि देवी दासी बताती हैं कि भगवान वृंदावन छोड़कर कहीं नहीं जाते। सदा वृंदावन में ब्रजवासियों के साथ रहते हैं। इसलिए वृंदावन सबसे पवित्र स्थान है।
400 दर्शकों ने नाटक का आनंद उठाया
सभी कलाकारों का परिचय करातीं निर्देशक नाम चिंतामणि देवी दासी
- फोटो : Amar Ujala
बलराम और सुदाम के किरदार में थे महात्मा विदुर दास। पराभक्ति देवी दासी ने यशोदा मैया और राधारमण दास ने नंद बाबा की भूमिका निभाई। अक्रूर जी बने थे कृष्ण कुमार दास, कंस के किरदार में थे सहस्र बाहु दास, उद्धव भैया बने थे दुर्गम दास। उत्तमगति देवी दासी ने कुब्जा का किरदार निभाया।
नोएडा इस्कॉन में इस नृत्य-नाटिका को परम पूज्य लोकनाथ स्वामी महाराज के आशीर्वाद से संपन्न कराया गया। इस नृत्य-नाटिका को इस्कॉन नोएडा के सभागार में आयोजित किया गया था जहां करीब 400 दर्शकों ने इसका आनंद उठाया।
नोएडा इस्कॉन में इस नृत्य-नाटिका को परम पूज्य लोकनाथ स्वामी महाराज के आशीर्वाद से संपन्न कराया गया। इस नृत्य-नाटिका को इस्कॉन नोएडा के सभागार में आयोजित किया गया था जहां करीब 400 दर्शकों ने इसका आनंद उठाया।