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विधानसभा चुनाव : अलगाववाद उलझाएगा पंजाब का सियासी समीकरण, अमृतपाल के दल से सभी सतर्क; किसने-कितनी ताकत झोंकी?
सार
पंजाब विधानसभा चुनाव में अलगाववाद का मुद्दा सियासी समीकरण उलझा सकता है। अमृतपाल के दल से सभी खेमे और राजनेता सतर्क हैं। अकाली दल (वारिस पंजाब दे) समेत किस दल ने कितनी ताकत झोंकी है? जानिए इस खबर में
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Punjab assembly election
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
पंजाब में बीते लोकसभा चुनाव में अलगाववाद की राजनीति ने मजबूत दस्तक दी थी। अब विधानसभा चुनाव में यही राजनीति राज्य के सियासी समीकरण को उलझा सकती है। दरअसल राज्य के माझा और मालवा क्षेत्र में जमीनी स्तर पर सक्रिय अकाली दल (वारिस पंजाब दे) की मजबूत चुनावी तैयारी से सूबे के दल सतर्क हैं। माना जा रहा है कि अगर विस चुनाव में भी अलगाववादी राजनीति ने इन दो क्षेत्रों में अपना प्रभाव छोड़ा तो त्रिशंकु जनादेश की भी स्थिति बन सकती है।
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अहम तथ्य यह है कि बीते लोकसभा चुनाव में अलग-अलग निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले खालिस्तान समर्थक सांसद अमृतपाल सिंह और इंदिरा गांधी के हत्यारे बेअंत सिंह के सांसद पुत्र सरबजीत अब एक साथ हैं। अमृतपाल के जेल में बंद होने के कारण उसके पिता और सरबजीत ही राज्य के दोनों क्षेत्रों में पार्टी का ढांचा मजबूत करने में जुटे हैं। बीते चुनाव में इन दोनों ने खडूर साहिब और फरीदकोट से निर्दलीय जीत हासिल कर न सिर्फ सियासी दलों बल्कि सुरक्षा एजेंसियों को भी चौंका दिया था। ये दोनों सीटें माझा और मालवा से ही जुड़ी थी।
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94 सीटों पर तैयारी
पंजाब की चुनावी रणनीति से जुड़े भाजपा के वरिष्ठ नेता के मुताबिक इनका पंथक बेल्ट कहे जाने वाले माझा में जमीनी प्रभाव को महसूस किया जा सकता है। लोकसभा में सिर्फ अमृतपाल और सरबजीत चुनाव लड़े थे और दोनों जीते। अब विधानसभा चुनाव में इनकी निगाहें माझा और मालवा की 94 सीटों पर दस्तक देने की है।
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क्यों बदलेंगे समीकरण, किसे होगा घाटा
राज्य में सिख बिरादरी पर आप, अकाली दल और कांग्रेस का प्रभाव रहा है। अगर वारिस पंजाब दे का इस बिरादरी में दखल बढ़ा तो सर्वाधिक घाटा सत्तारूढ़ आप को होगा। अकाली दल पहले से ही राज्य की सियासत में कमजोर होती जा रही है। ऐसे में राज्य में वारिस पंजाब दे की जीती एक-एक सीट परिणाम को त्रिशंकु जनादेश की ओर ले जाएगी। हालांकि भाजपा को लगता है कि अगर अलगाववाद की भावना बढ़ी तो असुरक्षा की मानसिकता में राज्य के हिंदू मतदाताओं का ध्रुवीकरण उसके पक्ष में हो सकता है।