अर्धशतक से एक कदम दूर पीएसएलवी, 209 विदेशी उपग्रहों को पहुंचा चुका है अंतरिक्ष
- तीसरी पीढ़ी के रॉकेट पीएसएलवी ने अपनी 49वीं उड़ान सफलता से पूरी कर ली
- इसरो के अनुसार अब तक पीएसएलवी 49 भारतीय और 209 विदेशी उपग्रह अंतरिक्ष में पहुंचा चुका है।
- बुधवार को कार्टोसेट-3 और 13 अमेरिकी उपग्रह को पहुंचाया अंतरिक्ष में
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विस्तार
कार्टोसेट-3 और 13 अमेरिकी उपग्रह जैसे ही सफलता से अंतरिक्ष में पहुंचे, भारत द्वारा विकसित तीसरी पीढ़ी के रॉकेट पीएसएलवी ने अपनी 49वीं उड़ान सफलता से पूरी कर ली। अब यह अर्धशतक से एक कदम दूर रह गया है।
भारत द्वारा विकसित तीसरी पीढ़ी के रॉकेट पीएसएलवी की 49वीं उड़ान छह ठोस रॉकेट स्ट्रैप-ऑन मोटर के साथ पूरी की गई। अंतरिक्ष में जाने के लिए पीएसएलवी ने ऐसा 21वीं बार किया। इसरो के अनुसार अब तक पीएसएलवी 49 भारतीय और 209 विदेशी उपग्रह अंतरिक्ष में पहुंचा चुका है।
अब तक केवल दो बार विफल
पीएसएलवी अक्तूबर 1994 में पहले सफल प्रक्षेपण के बाद से काम में लिया जा रहा है। इससे 2008 में चंद्रयान-1 और 2013 में मार्स ऑर्बिटर स्पेसक्राफ्ट छोड़े गए। इसके 49 प्रक्षेपणों में अब तक दो बार विफलता मिली, पहली बार 20 सितंबर 1993 को पहले प्रक्षेपण में और दूसरी दफा 31 अगस्त 2017 को 41वें प्रक्षेपण में। 2019 में इससे पांचवां प्रक्षेपण किया गया।
रिमोट सेंसिंग कार्यक्रम को नई दिशा
इसरो द्वारा विकसित कार्टोसेट-3 भारत द्वारा अब तक उपयोग किए जा रहे इंडियन रिमोट सेंसिंग (आईआरएस) कार्यक्रम में सबसे उन्नत उपग्रह है। आईआरएस-1ए 1988 में शुरू इस श्रेणी का पहला भारतीय उपग्रह था, जिसे सोवियत रूस ने बाइकोनर केंद्र से प्रक्षेपित किया था। इसकेे जरिए भारत ने कृषि, जल संसाधन, वन, पर्यावरण, तटीय क्षेत्र व मछली उद्योग जैसे क्षेत्रों में काम लिया। भारत ने आईआरएस कार्यक्रम के तहत अब तक 24 उपग्रह छोड़े थे, जिनमें से केवल एक आईआरएस-पी1 विफल रहा। आठ मिशन पूरा कर चुके हैं। बाकी सेवा में हैं। इनमें सबसे पुराना आईआरएस-पी6 वर्ष 2003 में प्रक्षेपित किया गया था।
कार्टोसेट एक नक्शे बनाने वाला सैटेलाइट
आईआरएस के तहत भेजे गए उपग्रह चार तरह के काम आ रहे हैं। आईआरएस की शुरुआती सीरीज धरती से जुड़ा डाटा संग्रह करने के काम आती थी तो ओशियन-सेट समुद्र और रिसोर्ससेट संसाधनों के लिए बने। कार्टोग्राफी यानी नक्शा बनाने के काम से कार्टोसेट को यह नाम मिला।
14 साल में 10 गुना बेहतर हुई नजर
कार्टोसेट सीरीज के पहले उपग्रह कार्टोसेट-1 को मई 2005 में प्रक्षेपित किया गया था। इनके जरिए 2.5 मीटर की रेजोल्यूशन की तस्वीरें अंतरिक्ष से ली जा सकती थीं। आज 14 साल बाद भेजे गए कार्टोसेट-3 से 25 सेमी रेजोल्यूशन की तस्वीरें लेना संभव है।
ऐसा है कार्टोसेट-3
विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र के निदेशक एस सोमनाथ ने बताया, यह कार्टोसेट शृंखला का नौवां उपग्रह है। यह अंतरिक्ष उपकरण, संपर्क और निगरानी की नए तकनीक का प्रतीक बनेगा। 1625 किलो का उपग्रह पांच वर्ष काम करेगा। यह सन सिंक्रोनाइज्ड यानी सूर्य से समन्वय के साथ पृथ्वी के परिक्रमा पथ पर रहेगा। इसे पृथ्वी की निगरानी करने वाला भारत का अब तक का सबसे आधुनिक उपग्रह माना जा रहा है।
अमेरिकी उपग्रह भी भेजे
मिशन के साथ भेजे गए बाकी 13 उपग्रह नैनो यानी छोटी श्रेणी के हैं। ये सभी व्यावसायिक उपग्रह हैं। इन्हें इसरो की व्यावसायिक शाखा न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड से हुए करार के तहत भेजा गया।
फ्लोक-4पी : ये 12 उपग्रह इस प्रक्षेपण के साथ भेजे गए। इनका काम पृथ्वी की निगरानी है।
मेशबेड : यह अपनी श्रेणी का अकेला उपग्रह है। इसका उपयोग कम्युनिकेशन तकनीक में होगा।
हमें यह होंगे फायदे
- सामरिक के साथ ही शहरों के लिए बड़े स्तर पर विकास व निर्माण योजनाएं सटीकता से बनाने में मदद मिलेगी।
- ग्रामीण संसाधनों व बुनियादी सुविधाओं के विकास और तटीय क्षेत्रों में भूमि के उपयोग की जानकारी मिलेगी।
- मानव द्वारा या प्राकृतिक वजहों से धरती पर हुए छोटे-छोटे बदलाव भी यह पकड़ सकता है।
कैमरे की शक्ति : 509 किमी ऊपर से देख सकता है 25 सेमी की वस्तु
कार्टोसेट-3 में लगे कैमरे 509 किमी की ऊंचाई पर अंतरिक्ष से 25 सेमी तक की वस्तु देख सकते हैं। इसकी मदद से पड़ोसी देश पाकिस्तान द्वारा सीमा व इर्द-गिर्द की जा रही गतिविधियों को पकड़ा जा सकेगा। ऐसा कैमरा अब तक किसी देश के पास नहीं है। इस समय अमेरिकी कंपनी वर्ल्ड व्यू - 3 के पास ऐसा उपग्रह है जो 31 सेमी तक की वस्तु को देश सकता है।
चंद्रयान-2 के 81 दिन बाद
इसी वर्ष सात सितंबर में चंद्रयान-2 के जरिए चांद की सतह पर लैंडर विक्रम को उतारने में पूरी सफलता न मिलने के मात्र 81वें दिन इसरो ने यहै सफल प्रक्षेपण किया है। चंद्रयान-2 के बाद यह इसरो का पहला मिशन है।