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हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के परीक्षण पर रोक के फैसले पर डब्ल्यूएचओ के खिलाफ भारत में बढ़ा विरोध

Sun, 31 May 2020 06:40 AM IST
श्रीधर मिश्रा डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: श्रीधर मिश्रा Updated Sun, 31 May 2020 06:40 AM IST
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Protest against WHO over the decision to stop the testing of hydroxychloroquine ,hydroxychloroquine for covid 19 ,hydroxychloroquine for coronavirus ,donald trump ,usa coronavirus ,white house
फाइल फोटो - फोटो : PTI

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की तरफ से हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के परीक्षण पर रोक लगाए जाने की सलाह का विरोध बढ़ता ही जा रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के बाद अब वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के महानिदेशक शेखर मंडे, इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (आईजीआईबी) दिल्ली के निदेशक अनुराग अग्रवाल और चेन्नई मैथमेटिकल इंस्टीट्यूट के निदेशक राजीव करणडिकर ने डब्ल्यूएचओ को पत्र लिखकर लैंसेट पत्रिका के अध्ययन पर इस दवा के परीक्षण पर अस्थायी रोक लगाने के फैसले को गलत बताया है।

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शेखर मंडे ने पत्र में कहा है कि दवा के परीक्षण को अस्थायी रूप से रोकने का निर्णय सही नहीं है और हम डब्ल्यूएचओ से अनुरोध करते हैं कि कोरोना मामलों में इसके उपयोग के लिए परीक्षणों को जल्द से जल्द फिर से शुरू करने की अनुमति दी जाए। इन लोगों ने अपना खत ईमेल से लैंसेट पेपर संपादक रिचर्ड चार्ल्स हॉर्टन को भी भेजा है। इसमें कहा गया है कि एचसीक्यू और क्लोरोक्वीन और कोविड-19 पर इसके प्रभाव पर लैंसेट में प्रकाशित अध्ययन सही नहीं है। 
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मंडे ने कहा कि अध्ययन का डिजाइन और सांख्यिकीय सही नहीं है। ऐसे में यह अध्ययन ध्यान देने योग्य नहीं है। हमारी राय में डब्ल्यूएचओ का फैसला सवालों के घेरे में है और सांख्यिकीय समीक्षा सही नहीं है।
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दरअसल, साइंस जर्नल ‘लैंसेट’ ने अपने अध्ययन में पाया कि मलेरिया की इस दवाई से कोरोना मरीजों को किसी तरह का स्वास्थ्य लाभ नहीं हो रहा है। पत्रिका के अध्ययन में कोरोना से संक्रमित 96 हजार मरीजों को शामिल किया गया। इनमें से 15 हजार लोगों को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन या फिर कोई दूसरी दवाई दी गई। बाद में पता चला कि दूसरे मरीजों की तुलना में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन खाने वाले वर्ग में ज्यादा मौतें हुईं। इन मरीजों में हृदय रोग की समस्या भी देखी गई। जिन्हें हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दी गई उनमें मृत्यु दर 18 फीसदी रही।  

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