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चीन सीमा को लेकर बढ़ने लगा है भारत पर स्थायी सैन्य तैनाती बढ़ाने का दबाव

Sun, 31 May 2020 09:11 PM IST
शशिधर पाठक शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Published by: शशिधर पाठक Updated Sun, 31 May 2020 09:11 PM IST
सार

  • न चीन पीछे हटेगा और न ही भारत मोर्चा छोड़ेगा
  • राष्ट्रपति ट्रंप के कूदने का जितना नफा उतना ही नुकसान
  • सैन्य कमांडर कॉन्फ्रेंस में छाएगा चीन के साथ सैन्य कूटनीति का मुद्दा
  • आक्रामक होते जा रहे चीन ने बढ़ाई सैन्य रणनीतिकारों की टेंशन

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Pressure is being build up on India for permanent army deployment on China Border
भारत और चीन की सेना (फाइल फोटो) - फोटो : पीटीआई

विस्तार

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ समेत तीनों सेनाएं चीन के रुख को लेकर बेहद सतर्क हैं। दोकलाम में चीन के सैनिकों के साथ बने 70 दिन से अधिक समय के गतिरोध के बाद लद्दाख में चीनी सेना के रुख ने हैरान किया है। इस घुसपैठ में चीन के सैनिकों ने फिर आक्रामक रवैया दिखाया। कंटीली लाठी, पत्थरों से हमला करने जैसे टैक्टिकल मूव पर उतर आए। 

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पूर्व वायुसेनाध्यक्ष एयरचीफ मार्शल पीवी नाइक का कहना है कि मामला गंभीर रूप ले रहे हैं। इससे चीन की सीमा पर जरूरत के हिसाब से सैन्य तैयारी का दबाव बढ़ रहा है। पूर्व एयरचीफ मार्शल का कहना है कि सैन्य कमांडर कांफ्रेस के लिए भी यह एक गंभीर और संवेदनशील मुद्दा है। मेजर जनरल(पूर्व) लखविंदर के अनुसार चीन की तरफ से मुद्दा सुलझाने की रुचि नहीं दिखाई दे रही है। 
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उनका रुख सीमा विवाद को जीवित रखने और इसे और उलझाते जाने का दिखाई पड़ रहा है। मेजर जनरल भी कहते हैं कि चीन से लगती सीमा पर स्थायी सैन्य तैनाती केवल स्थान-स्थान पर संभव है। एयरचीफ मार्शल भी सवाल उठाते हैं कि इतनी फौज आप लाएंगे कहां से? लेकिन चुनौती तो है। इसलिए इसके समाधान के बारे में सोचना पड़ेगा।

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न चीन पीछे हटेगा, न भारत मोर्चा छोड़ेगा

लद्दाख में गलवां नाला क्षेत्र और इसके आसपास अपनी तैनाती बढ़ा रही है। स्थायी सैन्य तैनाती की दिशा में चीन के संकेत मिल रहे हैं। इसके सामानांतर भारत ने चुनौती को देखते हुए सैन्य तैनाती बढ़ाई है। रक्षा मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि भारत पड़ोसी देश चीन से तनाव कम करने के सभी उपायों को अजमा रहा है। इसके लिए कूटनीतिक, राजनीतिक दोनों स्तर से प्रयास हो रहे हैं। 

रक्षा मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, प्रधानमंत्री कार्यालय तीनों चीन के अपने समकक्षों के साथ चर्चा कर रहे हैं। सेना के स्तर पर भी संवाद के जरिये समाधान निकालने की कोशिश हो रही है। हालांकि इस पूरे परिप्रेक्ष्य में भारत कहीं भी अपनी कमजोरी जाहिर नहीं करना चाहता। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को भी उम्मीद है कि जल्द ही कोई समाधान निकल आएगा। भारत और चीन सौहार्दपूर्ण तरीके से आगे बढ़ चलेंगे।

राष्ट्रपति ट्रंप के कूदने से नफा हुआ या नुकसान?

पूर्व एयरचीफ मार्शल पीवी नाइक कहते हैं कि चीन का शीर्ष प्रशासन अब अमेरिका के राष्ट्रपति को बहुत भाव नहीं देता। इसलिए ट्रंप के मध्यस्थता का प्रस्ताव लेकर कूदने से समाधान कम पेचीदगी ज्यादा बढ़ेगी। क्योंकि चीन हमारा पड़ोसी देश है। एयरचीफ मार्शल नाइक कहते हैं कि इसका समाधान सैन्य तैयारी को उत्कृष्ट बनाने के साथ-साथ आपसी स्तर पर ही ज्यादा बेहतर संभव है। राष्ट्रपति ट्रंप चीन को चिढ़ा रहे हैं, अमेरिका चीन को परेशान करने के अवसर तलाश रहा है और भारत को इसका मोहरा बनने से बचना चाहिए। 

विदेश मामलों के जानकार स्वर्ण सिंह कहते हैं कि ट्रंप के मध्यस्थता के बाद चीन का रुख कुछ जरूर नरम हुआ है। चीन प्रवक्ता ने अमेरिका के मध्यस्थता के प्रस्ताव को बुरी तरह से खारिज किया है, लेकिन इसके साथ उसे भारत और अमेरिका के मधुर रिश्ते का अंदाजा हो गया है। इसलिए इसका कुछ असर पड़ेगा। मेजर जनरल लखविंदर सिंह कहते हैं कि भारत को चीन की सीमा पर अपने सड़कों के जाल, संसाधन बढ़ाने का प्रयास जारी रखना चाहिए। इसके साथ-साथ संवाद का स्तर भी मजबूत बना रहना चाहिए।

इसे समझिए

चीन मामले पर गहरी पकड़ रखने वाले स्वर्ण सिंह कहते हैं कि चीन की लद्दाख में घुसपैठ का तरीका संजीदा नहीं कहा जाएगा। यह टैक्टिकल मूव दिखाई देता है। चीन का दोकलाम में आना, 70 से अधिक दिनों तक भारतीय सेना के साथ जूझना, स्थायी सैन्य संरचना का विकास करना कुछ कह रहा है। स्वर्ण सिंह कहते हैं कि चीनी घुसपैठ भी बढ़ी है। पिछले साल 600 बार से अधिक थी। पहले शांतिपूर्ण घुसपैठ होती थी। शिकवा- शिकायत पर चले जाते थे। अब पत्थर, लाठी, डंडों का इस्तेमाल हो रहा है। यही चिंता का विषय है। साफ है कि वह जानबूझकर ऐसा कर रहे हैं। इसके साथ-साथ चीन अब नेपाल को भी उकसा रहा है। इसलिए पेचीदगियां बढ़ रही हैं।

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