President Droupadi Murmu: अपने पहले भाषण में नई राष्ट्रपति ने इस संत को किया याद, मोदी-शाह के भी हैं प्रणेता
President Droupadi Murmu: संसद के केंद्रीय कक्ष में अपने पहले भाषण के दौरान राष्ट्रपति मुर्मू ने महान संत महर्षि अरविंद को याद किया। अपने भाषण में श्री अरविंद का जिक्र करते हुए राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा, दशकों पहले मुझे रायरंगपुर में श्री अरबिंदो इंटीग्रल स्कूल में शिक्षक के रूप में कार्य करने का अवसर मिला था। शिक्षा के बारे में श्री अरबिंदो के विचारों ने मुझे निरंतर प्रेरित किया है...
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द्रौपदी मुर्मू ने देश के 15वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ले ली है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमण ने उन्हें शपथ दिलाई। मुर्मू देश की दूसरी महिला राष्ट्रपति हैं। वे सर्वोच्च संवैधानिक पद संभालने वाली पहली आदिवासी महिला और स्वतंत्र भारत में पैदा होने वाली पहली राष्ट्रपति हैं। संसद के केंद्रीय कक्ष में अपने पहले भाषण के दौरान राष्ट्रपति मुर्मू ने महान संत महर्षि अरविंद को याद किया। अपने भाषण में श्री अरविंद का जिक्र करते हुए राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा, दशकों पहले मुझे रायरंगपुर में श्री अरबिंदो इंटीग्रल स्कूल में शिक्षक के रूप में कार्य करने का अवसर मिला था। कुछ ही दिनों बाद श्री अरबिंदो जी की 150वीं जन्म जयंती मनाई जाएगी। शिक्षा के बारे में श्री अरबिंदो के विचारों ने मुझे निरंतर प्रेरित किया है।
पीएम 15 अगस्त पर लाल किला से याद कर देते हैं श्रद्धांजलि
महर्षि अरविंद को पीएम नरेंद्र मोदी हर साल लाल किला से याद कर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। वे हर बार 15 अगस्त के अपने भाषण में एक बार महर्षि अरविंद का जिक्र जरूर करते हैं। 15 अगस्त के दिन ही वर्ष 1872 में महान क्रांतिकारी और योगी श्री अरविंद का जन्म हुआ था। वहीं जब भी पीएम मोदी पुडुचेरी जाते हैं तो वे श्री अरविंद आश्रम जाकर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करना नहीं भूलते हैं। इस साल भी पीएम ने लाल किला से अपने भाषण में महर्षि अरविंद का जिक्र करते हुए कहा था कि आज देश के महान विचारक श्री अरबिंदो की जन्मजयंती है। साल 2022 में उनकी 150वीं जन्मजयंती है। श्री अरविंद कहते थे कि हमें उतना सामर्थ्यवान बनना होगा, जितना हम पहले कभी नहीं थे। हमें अपनी आदतें बदलनी होंगी। एक नए हृदय के साथ अपने को फिर से जागृत करना होगा।
भारत की आत्मा को समझना है तो श्री अरविंद को पढ़ना-सुनना पड़ेगा- शाह
पीएम नरेंद्र मोदी अलावा केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भी श्री अरविंद के भक्तों में शामिल हैं। हाल ही में 150वीं जयंती के समारोह में शामिल होने शाह पुडुचेरी स्थित श्री अरविंद के आश्रम पहुंचे थे। वहां कार्यक्रम को संबोधित करते हुए शाह ने कहा था कि अगर भारत की आत्मा को समझना है, तो श्री अरविंद को पढ़ना-सुनना पड़ेगा। उन्होंने भारत की अलग प्रकार से व्याख्या की है। उनके संदेश को समझेंगे तो पता चलेगा कि भारत एकमात्र ऐसा देश है जो संस्कृति के आधार पर बना है। अमर उजाला से चर्चा में श्री अरविंद के अनुयायी सर्वेश तिवारी कहते हैं कि श्री अरविंद भारत के एक महान संत, योगी और देव तुल्य व्यक्ति हैं। उन्होंने देश की आजादी के लिए संघर्ष किया। पत्रकारिता के साथ योग के क्षेत्र में बड़ा काम किया। नई राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के अलावा पीएम नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह की श्री अरविंद और उनके विचारों के प्रति अटूट श्रद्धा है।
कौन हैं महर्षि अरविंद?
क्रांतिकारी महर्षि अरविंद घोष का जन्म 15 अगस्त 1872 को कोलकाता में हुआ था। उनके पिता का नाम डॉ. कृष्णधन घोष और माता का नाम स्वमलता था। जब वे सात वर्ष के थे उन्हें शिक्षा के लिये अपने भाइयों के साथ इंग्लैंड भेज दिया गया। श्री अरविंद के पिता की इच्छा थी कि प्रशासनिक सेवा की प्रतियोगिता में भाग लें और भारत आकर एक उच्च पद पर सरकार की सेवा करें। पिता की इच्छा के लिए उन्होंने परीक्षा दी लेकिन उनकी इसमें रूचि नहीं थी, जिसके बाद वे जानबूझकर घुड़सवारी की परीक्षा देने नहीं गए। श्री अरविंद इस परीक्षा में सम्मिलित न होने का कारण अंग्रेजों की नौकरी के प्रति घृणा की भावना थी।
भारत लौटने के बाद श्री अरविंद का रुझान स्वाधीनता की ओर होने लगा। इसी बीच 1902 में उनकी मुलाकात क्रांतिकारी बाल गंगाधर तिलक से हुई। तिलक के क्रांतिकारी विचारों से घोष बेहद ही प्रभावित हुए। इस दौरान उनकी मुलाकात कई अन्य प्रमुख नेताओं से हुई फिर वे आक्रामक राष्ट्रवाद के वे प्रबल समर्थक बन गए। श्री अरविंद ने वंदेमातरम नाम के अखबार का प्रकाशन किया था। उनके संपादकीय लेखों ने उन्हें अखिल भारतीय ख्याति दिला दी।
महर्षि अरविंद की क्रांतिकारी गतिविधियों से अंग्रेजों ने भयभीत होकर सन 1908 में उन्हें और उनके भाई को अलीपुर जेल भेजा। यहां उन्हें दिव्य अनुभूति हुई। जेल से छूटकर अंग्रेजी में कर्मयोगी और बंगाली भाषा में धर्मः पत्रिकाओं का संपादन भी उन्होंने किया। सन 1912 तक सक्रिय राजनीति में भाग लेने के बाद उनकी रूचि गीता, उपनिषद और वेदों में हो गई। जेल से बाहर आने के बाद वे कलकत्ता छोड़कर पुडुचेरी में रहने लगे।
महर्षि अरविंद ने लाइफ डिवाइन, ऐसेज ऑन गीता और फाउंडेशन ऑफ इंडियन कल्चर समेत कई प्रसिद्ध पुस्तकें लिखीं। श्री अरविंद की एक और महत्त्वपूर्ण कविता संग्रह जिसे महाकाव्य का दर्जा हासिल है, वह सावित्री है। सावित्री के बारे में श्री अरविंद की आध्यात्मिक सहयोगिनी श्री मां कहती हैं कि वह विनोद की अंतर्दृष्टि की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है। सन 1926 से 1950 तक वे अरविंद आश्रम में तपस्या और साधना में लीन रहे। यहां उन्होंने मानव कल्याण के लिए चिंतन किया। पुडुचेरी में ही 1950 में पांच दिसंबर को वे समाधिस्थ हो गए थे।