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शोध: बिजली संयंत्रों से निकलने वाले प्रदूषण से घट रही पैदावार, देश के कई हिस्सों में धान-गेहूं का उत्पादन घटा

Mon, 17 Feb 2025 04:55 AM IST
दीपक कुमार शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Mon, 17 Feb 2025 04:55 AM IST
सार

शोधकर्ताओं ने एक विशेष मॉडल का उपयोग करके यह अध्ययन किया कि कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से होने वाला प्रदूषण फसलों को किस तरह प्रभावित करता है। इसके लिए उन्होंने वायु प्रवाह के पैटर्न, 144 बिजली संयंत्रों की गतिविधियों और उपग्रह से मिले आंकड़ों का विश्लेषण किया। 

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Pollution from coal based power plants in India reducing rice and wheat production
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : freepik.com

विस्तार

भारत में कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से निकलने वाला प्रदूषण किसानों के लिए महंगा साबित हो रहा है। इन संयंत्रों से उत्सर्जित नाइट्रोजन ऑक्साइड देश के कई हिस्सों में गेहूं और धान की पैदावार को हर साल 10 फीसदी या उससे अधिक तक कम कर रहा है।

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स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के डोएर स्कूल ऑफ सस्टेनेबिलिटी के वैज्ञानिकों के शोध में यह सामने आया है, जिसके निष्कर्ष प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (पनास) पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं। शोधकर्ताओं ने एक विशेष मॉडल का उपयोग करके यह अध्ययन किया कि कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से होने वाला प्रदूषण फसलों को किस तरह प्रभावित करता है। इसके लिए उन्होंने वायु प्रवाह के पैटर्न, 144 बिजली संयंत्रों की गतिविधियों और उपग्रह से मिले आंकड़ों का विश्लेषण किया। इससे पता चला कि यदि इन संयंत्रों से निकलने वाले नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन पर नियंत्रण किया जाए  तो गेहूं और धान की पैदावार में सुधार हो सकता है, जिससे किसानों को सालाना 82 करोड़ डॉलर तक का आर्थिक लाभ हो सकता है।
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वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बिजली संयंत्र 100 किलोमीटर के दायरे में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के स्तर को बढ़ा रहे हैं जिससे आसपास की फसलें प्रभावित हो रही हैं। यदि मुख्य फसल सीजन (जनवरी-फरवरी और सितंबर-अक्टूबर) के दौरान इस प्रदूषण पर नियंत्रण किया जाए तो भारत में धान की पैदावार को सालाना 42 करोड़ डॉलर और गेहूं की पैदावार को 40 करोड़ डॉलर तक का फायदा हो सकता है।
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छत्तीसगढ़ के प्रदूषण में कोयले का योगदान 13 से 19 फीसदी
शोधकर्ताओं के अनुसार छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में, जहां बिजली उत्पादन में कोयले की बड़ी हिस्सेदारी है, वहां नाइट्रोजन डाइऑक्साइड प्रदूषण में कोयले का योगदान 13 से 19 फीसदी तक है। वहीं, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में यह योगदान 3 से 5 फीसदी के बीच है। इसके अलावा वाहनों और औद्योगिक इकाइयों से होने वाला जीवाश्म ईंधन का दहन भी नाइट्रोजन डाइऑक्साइड प्रदूषण का एक प्रमुख स्रोत है। कोयला बिजली संयंत्रों के कारण फसल उत्पादन को होने वाला नुकसान इन संयंत्रों से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के कारण होने वाली मौतों की तुलना में कम आंका जाता है। हालांकि प्रति यूनिट बिजली उत्पादन के हिसाब से देखें तो फसलों को होने वाला नुकसान कहीं अधिक हो सकता है। अध्ययन किए गए 144 संयंत्रों में से 58 में धान की क्षति, प्रदूषण से होने वाली मौतों की तुलना में अधिक पाई गई। इसी तरह 35 संयंत्रों में गेहूं की फसल को हुआ नुकसान मौतों से अधिक था।

भविष्य में उत्सर्जन नियंत्रण से मिल सकते हैं बड़े फायदे
अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि यदि कोयला बिजली संयंत्रों के उत्सर्जन को कम किया जाए तो इससे कृषि, पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य तीनों को लाभ मिलेगा। इसलिए भारत में इन संयंत्रों से जुड़े नियमों को बनाते समय न केवल स्वास्थ्य बल्कि फसलों को होने वाले नुकसान को भी ध्यान में रखना जरूरी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रदूषण को नियंत्रित करने वाली नीतियों से न सिर्फ स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा मिलेगा बल्कि किसानों की आय में भी वृद्धि होगी और जलवायु को भी लाभ होगा।

कोयले पर अत्यधिक निर्भरता से प्रभावित होगा खाद्य उत्पादन
भारत में गेहूं और धान मुख्य खाद्य फसलें हैं जो देश की बढ़ती आबादी की खाद्य जरूरतों को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। भारत न केवल दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है बल्कि यहां कुपोषित लोगों की एक बड़ी संख्या भी है। ऐसे में फसलों की पैदावार में गिरावट खाद्य सुरक्षा के लिए एक गंभीर समस्या बन सकती है। शोध से जुड़े प्रमुख वैज्ञानिक कीरत सिंह के अनुसार यह जानना जरूरी था कि कोयला आधारित बिजली उत्पादन से होने वाला प्रदूषण भारतीय कृषि को कैसे प्रभावित कर रहा है। बिजली उत्पादन के लिए कोयले पर अत्यधिक निर्भरता खाद्य उत्पादन को नुकसान पहुंचा सकती है।


सकारात्मक कदम उठाने की पहल का समर्थन
पिछले अध्ययनों से यह भी पता चला है कि कोयले के जलने से उत्पन्न प्रदूषण न केवल स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालता है बल्कि अर्थव्यवस्था और पर्यावरण को भी गंभीर नुकसान पहुंचाता है। वर्तमान में भारत की लगभग 72 फीसदी बिजली कोयले से उत्पादित हो रही है जो कृषि और स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही है। इसलिए यह नया शोध सुधार की दिशा में सकारात्मक कदम उठाने की पहल का समर्थन करता है।

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