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Supreme Court: मिया-मुस्लिम और लव जिहाद जैसे शब्दों पर रोक की मांग, पूर्व LG समेत 12 लोगों ने दाखिल की याचिका
Mon, 09 Feb 2026 06:41 PM IST
शिवम गर्ग
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शिवम गर्ग
Updated Mon, 09 Feb 2026 06:41 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है, जिसमें असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और अन्य संवैधानिक पदाधिकारियों द्वारा समुदाय विरोधी और संविधान के अनुरूप न होने वाले भाषणों पर दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई है।
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CM हिमंत की बढ़ीं मुश्किलें
- फोटो : Amar Ujala Graphics
विस्तार
एक समूह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है, जिसमें असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और अन्य संवैधानिक पदाधिकारियों द्वारा दिए जा रहे भाषणों को संविधान के अनुरूप नहीं और अपमानजनक बताया गया है। याचिकाकर्ताओं ने इस मामले में अनुच्छेद 32 के तहत कोर्ट से दिशा-निर्देश जारी करने का अनुरोध किया है।
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सीएम सरमा के अलावा 2 मुख्यमंत्रियों का भी नाम
याचिका में उल्लेख किया गया है कि सीएम सरमा ने हाल ही में 'मिया मुसलमान' समुदाय के खिलाफ टिप्पणियां कीं। इसके अलावा, उन्होंने कुछ समुदाय के नागरिकों को सब्जियों की कीमत बढ़ाने, लव जिहाद और फ्लड जिहाद जैसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार ठहराया और यहां तक कहा कि चुनावी मतदाता सूची से 4-5 लाख लोगों को हटाना चाहते हैं। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि केवल असम ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों के उच्च पदाधिकारियों द्वारा दिए गए भाषण भी संवैधानिक नैतिकता के खिलाफ हैं। उदाहरण के तौर पर, उत्तराखंड सीएम लैंड जिहाद और लव जिहाद की बातें करते हैं, जबकि उत्तर प्रदेश सीएम उर्दू भाषा समर्थकों के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं।
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केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी मुसलमानों को घुसपैठियों और विदेशी समर्थकों के रूप में प्रस्तुत करते हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि भले ही ये भाषण सीधे तौर पर हेट स्पीच कानून के दायरे में न आते हों, लेकिन इनका संवैधानिक नैतिकता को कमजोर करने वाला है। उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया है कि उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के सार्वजनिक भाषणों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाए जाएं।
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संवेदनशील समुदायों पर हानिकारक असर
याचिकाकर्ताओं ने जोर देकर कहा सार्वजनिक पदधारक साधारण वक्ता नहीं होते। उनके शब्द राज्य का प्रभाव रखते हैं, प्रशासनिक कार्रवाई को प्रभावित करते हैं और संवेदनशील समुदायों पर हानिकारक असर डाल सकते हैं। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के नवतेज सिंह जोहर बनाम भारत संघ (2018), जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ (2019) और गवर्नमेंट ऑफ एनसीटी ऑफ दिल्ली बनाम भारत संघ (2018) के फैसलों का हवाला दिया गया है, जिसमें कहा गया है कि संवैधानिक नैतिकता लोकप्रिय भावना पर हावी होनी चाहिए। याचिकाकर्ता इस बात पर भी प्रकाश डालते हैं कि संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों के भाषणों को नियंत्रित करने के लिए कोई मानक या दिशा-निर्देश नहीं हैं। इस कमी ने अपमानजनक और भेदभावपूर्ण भाषणों को अन्चेक्ट तरीके से फैलने का अवसर दिया।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से प्रार्थना की गई है कि संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों द्वारा किए जाने वाले भाषण समानता, बंधुत्व, धर्मनिरपेक्षता और अनुच्छेद 14 और 21 के मानकों के अनुरूप हों। साथ ही, मुक्त अभिव्यक्ति के अधिकार को बाधित किए बिना सार्वजनिक भाषणों पर दिशानिर्देश जारी किए जाएं।
इन लोगों ने दाखिल की पीआईएल
याचिकाकर्ताओं में डॉ रूप रेखा वर्मा, मोहम्मद अदिब, हर्ष मंडर, दिल्ली के पूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर नजीब हामिद जंग, डॉ जॉन डेअल, दया सिंह, अदिति मेहता, सुरेश के गोयल, अशोक कुमार शर्मा और सुभोद लाल शामिल हैं। इसके अलावा, हाल ही में जमीयत उलमा-ए-हिंद ने भी असम सीएम सरमा के भाषण की निंदा करते हुए कोर्ट से निर्देश जारी करने की मांग की है।
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