असम: एनआरसी के डर से आतंक के साये में दिन गुजार रहे हैं लाखों लोग, सरकार ने की राहत देने वाली घोषणा
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अब तो बस चंद दिन ही बचे हैं। हमारी आंखों की नींद तो महीनों से उड़ी हुई है। सूची में नाम नहीं आया तो न जाने हमारा क्या होगा? यह कहते हुए धुबड़ी जिले की शमीना खातून के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी हो जाती हैं और उनकी आंखें दूर कहीं शून्य में ताकने लगती हैं। असम के उन लाखों लोगों की इन दिनों यहीं स्थिति है जिनके नाम नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजंस (एनआरसी) के मसविदे से बाहर थे।
उनमें से 36.28 लाख लोगों ने नए दस्तावेजों के साथ अपने नाम शामिल करने का आवेदन किया है, लेकिन उनकी बेचैनी लगातार बढ़ रही है। राज्य में 31 अगस्त को एनआरसी की अंतिम सूची का प्रकाशन होना है। इससे पहले सरकार ने ऐहतियाती तौर पर पूरी तैयारियां कर ली हैं। बावजूद इसके पूरे राज्य में आतंक का माहौल पैदा हो गया है। इस बीच, कई लोगों पर फर्जी दस्तावेजों के सहारे एनआरसी में शामिल होने के आरोप लग रहे हैं। राज्य में सत्तारुढ़ भाजपा ने भी एनआरसी की निष्पक्षता की कवायद पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि फर्जी दस्तावेजों के सहारे कई बांग्लादेशी नागरिक भी इसमें शामिल हो गए हैं।
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सूची प्रकाशित होने के बाद कानून-व्यवस्था की चिंता
अंतिम सूची के प्रकाशन के बाद पैदा होने वाली कानून व व्यवस्था की संभावित परिस्थिति पर निगाह रखने के उपायों पर विचार-विमर्श की खातिर मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने हाल में तमाम जिलों के उपायुक्तों व पुलिस अधीक्षकों के साथ एक समीक्षा बैठक की थी। इस दौरान अधिकारियों से जिले के हालात पर नजदीकी निगाह रखने को कहा था। जिला प्रशासन को सोशल मीडिया पर फैलने वाली फर्जी खबरों और अफवाहों की भी निगरानी करने को कहा गया है। केंद्रीय बलों की कई टुकड़ियों को भी संवदनशील इलाकों में तैनात कर दिया गया है।
एनआरसी में शामिल नहीं हो सका तो क्या होगा
लाखों हिंदी भाषियों और अल्पसंख्यकों को मसविदे में जगह नहीं मिल सकी थी। सेना और अर्धसैनिक बलों के कई जवानों को भी विदेशी घोषित किया जा चुका है। इससे लोग आतंकित हैं। वे यह अनुमान नहीं लगा पा रहे हैं कि अंतिम सूची में शामिल नहीं होने की स्थिति में उनका क्या होगा। ऑल असम भोजपुरी परिषद के अध्यक्ष मोहन कुमार शाह कहते हैं कि एनआरसी के दोनों मसविदों से बिहार व उत्तर प्रदेश के लाखों लोगों के नाम गायब हैं। वहीं, सारा असम बंगाली एकता मंच के महासचिव शांतनु मुखर्जी कहते हैं कि दस्तावेजों के अभाव में हजारों हिंदू बंगालियों के नाम एनआरसी में नहीं हैं।
एनआरसी में छूटे जरूरतमंदों को असम सरकार देगी कानूनी सहायता
असम सरकार ने मंगलवार को दावा किया है कि एनआरसी सूची से छूटे जरूरतमंदों को सरकार कानूनी सहायता उपलब्ध कराएगी। एनआरसी की अंतिम सूची प्रकाशित होने में चार दिन शेष रहते सरकार ने सूची में नाम नहीं आने से डरे हुए भारतीयों को राहत देने वाली घोषणा की है।
सत्तारूढ़ भाजपा के अलावा विरोधी कांग्रेस भी एनआरसी में छूट रहे भारतीयों की मदद के लिए आगे आए हैं। तीस्ता सीतलवाड़ के एनजीओ सेंटर फॉर जस्टिस एंड पीस ने भी फाइनल एनआरसी के प्रकाशन के बाद नागरिकता से जुड़े जटिल मामलों को निपटाने में मदद की पेशकश की है। राज्य सरकार ने एनआरसी में नाम नहीं आने पर हटाए जाने के डर से सहमे लोगों को राहत देने के लिए कानूनी मदद देने की घोषणा की है। लोगों को डर है कि उन्हें नाम नहीं होने पर बांग्लादेश भेजा जा सकता है। असम के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) कुमार संजय कृष्णा ने मंगलवार को कहा कि एनआरसी में नाम नहीं होने के बाद भी जब तक विदेशी न्यायाधिकरण किसी को विदेशी नागरिक नहीं घोषित कर देता उसे हटाया नहीं जा सकता।
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जून में हटाए गए थे एक लाख लोग
जून 2019 में छपी एनआरसी सूची में करीब एक लाख और लोगों के नाम हटा दिए गए थे।
अपील का मौका मिलेगा
कुमार संजय ने बताया कि जिनके नाम एनआरसी की अंतिम सूची में नहीं होंगे उनके पास नागरिकता की अनुसूची की धारा-8 के तहत अपील करने का मौका होगा। केंद्र ने अपील दायर करने की अवधि को 60 दिन से बढ़ाकर 120 दिन कर दिया है। इसके अलावा करीब 200 न्यायाधिकरण इन अपीलों की सुनवाई के लिए बनाए जाएंगे।