इमरान खान का क्रिकेट से लेकर पाकिस्तान की सत्ता तक का सफर
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इमरान खान, इस नाम के आते ही दुनिया भर के क्रिकेट प्रेमियों के जेहन में वो चेहरा आता है जिसने पाकिस्तान को 1992 का वर्ल्ड कप दिलाया। करीब दो दशकों तक क्रिकेट पर राज करने के बाद इमरान ने संन्यास ले लिया और फिर उन्होंने राजनीति में कदम रखा।
आज स्थिति यह है कि 22 साल पहले पाकिस्तान की राजनीति में कदम रखने वाले जिस इमरान खान को बतौर राजनेता कभी उतनी तवज्जो नहीं मिली वो ही पाकिस्तान की सियासी कमान संभालने की कगार पर खड़े हैं।
राजनीतिक पारी की शुरुआत में जिस इमरान खान को पाकिस्तानी मीडिया और वहां की आवाम तवज्जो नहीं देती थी, अब महिलाओं और युवाओं का एक बड़ा वर्ग उनका समर्थन कर रहा है। इसके पीछे बड़ी वजह आम तौर पर उनका राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन में विवादों से दूर रहना है। हालांकि 2018 के चुनाव प्रचार के दौरान इमरान खान पर अमर्यादित भाषा के प्रयोग का आरोप लगा और चुनाव आयोग ने उन्हें ऐसा नहीं करने की हिदायत तक दी।
क्रिकेट से राजनीति का सफर
आज इमरान खान की पहचान एक क्रिकेटर से कहीं अधिक उनकी राजनीतिक सक्रियता की वजह से है। गाहे बगाहे वो क्रिकेट कमेंटेटर के रूप में भी दिख जाते हैं। क्रिकेट से संन्यास के बाद और राजनीति में आने से पहले इमरान खान ने दुनियाभर में चंदा इकट्ठा कर 2008 में अपनी मां शौकत खानम के नाम पर एक कैंसर अस्पताल बनवाया।
1996 में अपनी पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ के गठन के बाद से इमरान पाकिस्तान की संसद के लिए निर्वाचित अपनी पार्टी के एकमात्र सदस्य रहे। 2002 से 2007 तक उन्होंने नेशनल असेंबली में मियांवाली का प्रतिनिधित्व किया। राजनीति के शुरुआती वर्षों में इमरान खान की गंभीरता से नहीं लिया जाता था और उनसे जुड़ी अधिकांश खबरें एक कॉलम का जगह ही पाती थीं।
1996 में इमरान खान पाकिस्तान की राजनीति में उतरे उन्होंने तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी की स्थापना की। लेकिन एक साल बाद देश में हुए आम चुनावों में उनकी पार्टी कोई सीट नहीं जीत सकी। इमरान खान ने 1999 में जनरल परवेज मुशर्रफ के सैन्य तख्ता पलट का समर्थन किया लेकिन 2002 के आम चुनावों से पहले मुशर्रफ की आलोचना की।
2002 में इमरान की पार्टी को केवल 0.8 फीसदी वोट और 272 में से केवल एक सीट मिली। तब इमरान खान खुद मियांवाली के एनए-71 निर्वाचन क्षेत्र से चुने गए थे। बतौर सांसद इमरान खान कश्मीर और लोकलेखा की स्थायी समिति के सदस्य रहे। उन्होंने राष्ट्रपति मुशर्रफ को अमरीकी राष्ट्रपति का जूता चाटने वाला बताया। इमरान खान को उनके विरोध प्रदर्शन के कारण उनके घर में नजरबंद कर दिया गया।
नजरबंद किया गया, जेल भी गए
3 नवंबर 2007 में राष्ट्रपति मुशर्रफ ने पाकिस्तान में आपातकाल घोषित कर दिया। इमरान ने इसके लिए मुशर्रफ के लिए मृत्युदंड की मांग की जिसे उन्होंने 'देशद्रोह' माना। इमरान खान को एक बार फिर नजरबंद कर दिया गया लेकिन इमरान वहां से फरार हो गए। उन पर आतंकवाद अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए। उन्हें डेरा गाजी खान जेल में बंद कर दिया जहां केवल रिश्तेदारों को मिलने की अनुमति थी। उन्होंने जेल में भूख हड़ताल शुरू कर दी। बाद में 21 नवंबर को राजनीतिक कैदियों के साथ साथ उन्हें भी जेल से रिहा कर दिया गया।
फरवरी 2008 में उनकी पार्टी ने चुनावों का बहिष्कार किया। मार्च 2009 में इमरान एक बार फिर नजरबंद किये गए। सरकार विरोधी प्रदर्शन को लेकर इस बार आसिफ अली जरदारी सरकार ने उन्हें उनके घर में बंद कर दिया। इसके बाद 2013 के चुनाव के लिए इमरान ने एक रणनीति के तहत काम किया।
उन्होंने तत्कालीन पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार का मुद्दा उछाला और अफगानिस्तान-पाकिस्तान बॉर्डर एरिया में अमरीकी ड्रोन हमलों का विरोध किया। इमरान अपनी राजनीति में स्वच्छ सरकार, भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून, स्वतंत्र न्यायपालिका, दुरुस्त पुलिस व्यवस्था और आंतकवाद विरोधी पाकिस्तान की वकालत करते हैं।
इमरान ने की तीन शादियां
25 नवम्बर 1952 को जन्मे इमरान खान ने लाहौर के एचीसन कॉलेज, कैथेड्रल स्कूल और इंग्लैंड के रॉयल ग्रामर स्कूल में पढ़ाई की। उन्होंने केबल कॉलेज, ऑक्सफोर्ड से राजनीति और अर्थशास्त्र की पढ़ाई भी की है। क्रिकेट खेलने के दौरान इमरान खान की छवि क्लबों और पार्टियों में जाने और लगातार रोमांस से जुड़े रहने वाले युवा की बनी। बाद में इमरान खान ने 1995 में ब्रिटिश जेमिमा गोल्डस्मिथ से निकाह किया। जेमिमा से इमरान के दो बेटे हैं। लेकिन नौ साल तक साथ रहने के बाद जेमिमा और इमरान का 2004 में तलाक हो गया।
इसके बाद 2014 में इमरान ने टीवी एंकर रेहम खान से दूसरी शादी की। रेहाम खान के माता-पिता पाकिस्तानी हैं और उनका जन्म लीबिया में हुआ है। दोनों की शादी सिर्फ 10 महीने चल पाई थी। बाद में उन्होंने एक किताब लिख कर इमरान पर यौन शोषण जैसे गंभीर आरोप लगाए। इसके बाद इमरान खान ने फरवरी 2018 में बुशरा मानिका से निकाह किया।
क्रिकेट करियर
इमरान खान कितने बड़े क्रिकेटर रहे हैं इसका अंदाजा इसी से लग जाता है कि वो पाकिस्तान के ऐसे क्रिकेटर हैं जिनके संन्यास (1987 में) लेने के बाद उन्हें राष्ट्रीय टीम के लिए दुबारा (1988 में) बुलाया गया और फिर 39 साल की उम्र में उन्होंने बतौर कप्तान पाकिस्तान को उसका एकमात्र वर्ल्ड कप दिलाया।
महज 16 साल की उम्र में इमरान खान ने लाहौर में एक फीके प्रदर्शन के साथ अपनी क्रिकेट करियर शुरू किया। वो अपने देश की घरेलू टीमों के लिए उतरे तो वहीं ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की ब्लूज क्रिकेट टीम का हिस्सा भी रहे और काउंटी क्रिकेट भी खेले। आखिरकार 1971 में उन्हें इंग्लैंड के खिलाफ बर्मिंघम टेस्ट के लिए पाकिस्तान की टीम में जगह मिली।
तीन साल बाद इमरान को वनडे टीम में भी जगह मिल गई। इसके बाद अपने प्रदर्शन की बदौलत उन्होंने टीम में अपनी जगह पक्की कर ली। क्रिकेट की दुनिया में इमरान की पहचान एक तेज गेंदबाज के रूप में 1978 में पर्थ में आयोजित एक समारोह में उनके फेंके गए 139।7 किलोमीटर की रफ्तार से फेंकी गई गेंद की वजह से हुई। इस दौरान इमरान खान ने डेनिस लिली और एंडी रॉबर्ट्स जैसे गेंदबाजों को पीछे छोड़ दिया और तीसरे स्थान पर रहे। उनसे आगे माइकल होल्डिंग, जेफ थॉमसन थे।
इमरान खान ने 88 टेस्ट मैचों में छह शतक और 18 अर्धशतकों की मदद से 3,807 रन बनाए और 362 विकेट लिए। क्रिकेट से संन्यास के वक्त इमरान खान पाकिस्तान के सर्वाधिक टेस्ट विकेट लेने वाले गेंदबाज थे। दो दशक के क्रिकेट करियर में इमरान की शुरुआती पहचान ऑलराउंडर गेंदबाज के रूप में हुई वहीं बाद में जब उन्होंने 1982 में जावेद मियांदाद से कप्तानी संभाली तब वो बहुत शर्मीले व्यक्ति थे। शुरुआती टीम बैठकों में वो टीम से बात नहीं कर पाते थे।
वर्ल्ड कप जीतने वाले कप्तान
हालांकि इसके बाद बतौर कप्तान और एक क्रिकेटर उनकी उपलब्धियां शिखर पर रहीं। इंग्लैंड को उसकी जमीं पर हराना, भारत के खिलाफ घरेलू सिरीज के छह टेस्ट में 40 विकेट चटकाना, श्रीलंका के खिलाफ करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन और पहले ही साल बतौर कप्तान 13 टेस्ट में 88 विकेट लेने का कारनामा करना उनके शुरुआती कारनामे रहे।
इसके बाद वो चोटिल हो गए और करीब दो साल तक क्रिकेट से बाहर रहने के बाद भारत के खिलाफ भारत में ही टेस्ट सिरीज जीतने के साथ वापसी की। इंग्लैंड को उसी की सरजमीं पर हराया। लेकिन 1987 वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में हारने के बाद संन्यास ले लिया लेकिन पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक के आग्रह पर दोबारा कप्तानी संभाली और वेस्टइंडीज के खिलाफ तीन टेस्ट में 23 विकेट लेकर अपनी जोरदार वापसी का एलान कर दिया।
एक कप्तान और क्रिकेटर के रूप में उनके करियर का सबसे बड़ा मुकाम तब आया जब उन्होंने 1992 वर्ल्ड कप में टीम का नेतृत्व किया। इमरान ने न केवल पाकिस्तान को पहली बार वर्ल्ड कप दिलाया बल्कि 39 साल की उम्र में भी अपनी टीम की ओर से टूर्नामेंट में सबसे ज़्यादा रन उन्होंने ही बनाए। क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद इमरान खान ने यह स्वीकार किया कि कभी उन्होंने गेंद से छेड़छाड़ की थी। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा काउंटी के एक मैच में किया था।
राजनीति में आने से पहले इमरान खान ने यह भी कहा कि उन्होंने पाकिस्तान के चुनाव में कभी वोट नहीं डाले। बहरहाल चुनाव में इमरान खान की पार्टी की जीत से पाकिस्तान की राजनीति पर भुट्टो और शरीफ के परिवार के दशकों तक रहे वर्चस्व का खात्मा हो गया है।