फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   OPS Vs NPS: NPS is disaster after retirement, no representation of personnel in committee of finance ministry

OPS Vs NPS: सेवानिवृत्ति के बाद एक आपदा है एनपीएस, कमेटी में कर्मियों का नुमाइंदा तक नहीं, होगी ओपीएस की लड़ाई

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Mon, 10 Apr 2023 06:15 PM IST
विज्ञापन
सार
OPS Vs NPS: एआईडीईएफ के महासचिव सी. श्रीकुमार के मुताबिक, जब मुद्दा ही कर्मचारियों का है, तो सरकार को इस कमेटी में उनका प्रतिनिधि शामिल करना चाहिए था। दूसरा, लड़ाई तो पुरानी पेंशन को लेकर है, मगर समिति को जो टॉस्क दिया गया है, उसका दायरा तो एनपीएस के आसपास रहेगा...
loader
OPS Vs NPS: NPS is disaster after retirement, no representation of personnel in committee of finance ministry
Old Pension Scheme - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

केंद्र सरकार के कर्मचारी संगठनों द्वारा 'पुरानी पेंशन' को लेकर जो आंदोलन शुरू किया गया है, वह अपना मुकाम हासिल करने के बाद ही खत्म होगा। ओपीएस बहाली के लिए गठित नेशनल ज्वाइंट काउंसिल ऑफ एक्शन (एनजेसीए) की संचालन समिति के सदस्य और एआईडीईएफ के महासचिव सी. श्रीकुमार ने साफ कर दिया है कि सरकारी कर्मचारी की सेवानिवृत्ति के बाद 'एनपीएस' एक आपदा है। एनपीएस से रिटायर हुए कर्मचारी को महज चार-पांच हजार रुपये की पेंशन मिलेगी। वित्त मंत्रालय द्वारा गठित कमेटी में केंद्रीय कर्मियों का नुमाइंदा तक नहीं है। इतना ही नहीं, कमेटी में पुरानी पेंशन का जिक्र ही नहीं है। उसमें केवल एनपीएस के अंतर्गत पेंशन की बात की गई है। उसके मौजूदा ढांचे और संरचना के आलोक में, यदि कोई परिवर्तन आवश्यक है, तो कमेटी उस पर सुझाव दे सकती है। रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कोई समय सीमा भी तय नहीं की गई है। केंद्रीय कर्मचारी संगठन, किसी भी सूरत में 'ओपीएस' से परे नहीं जाएंगे। उनका आंदोलन केवल 'पुरानी पेंशन बहाली' के लिए है।

यह भी पढ़ें: OPS: वित्त मंत्रालय ने किया पैनल का गठन, सरकारी कर्मचारियों के लिए पेंशन प्रणाली की समीक्षा के लिए देगा सुझाव

वित्त सचिव की अध्यक्षता में गठित हुई कमेटी

24 मार्च को संसद सत्र में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सरकारी कर्मचारियों के 'पेंशन सिस्टम' की समीक्षा के लिए एक समिति गठित करने की घोषणा की थी। छह अप्रैल को समिति का गठन कर दिया गया है। वित्त सचिव टीवी सोमनाथन की अध्यक्षता में कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के सचिव, व्यय विभाग के विशेष सचिव एवं पेंशन फंड नियामक विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए) के अध्यक्ष, इस कमेटी के सदस्य होंगे। यह समिति इस बात को लेकर सुझाव देगी कि सरकारी कर्मचारियों पर लागू एनपीएस के मौजूदा ढांचे में किसी तरह का कोई बदलाव जरूरी है या नहीं। समिति जो भी सुझाव देगी, उसमें राजकोषीय निहितार्थों और समग्र बजटीय प्रभाव को ध्यान में रखा जाएगा।

पुरानी पेंशन बहाली होगी या नहीं, कमेटी में जिक्र नहीं

एआईडीईएफ के महासचिव सी. श्रीकुमार के मुताबिक, जब मुद्दा ही कर्मचारियों का है, तो सरकार को इस कमेटी में उनका प्रतिनिधि शामिल करना चाहिए था। दूसरा, लड़ाई तो पुरानी पेंशन को लेकर है, मगर समिति को जो टॉस्क दिया गया है, उसका दायरा तो एनपीएस के आसपास रहेगा। पुरानी पेंशन बहाली होगी या नहीं, इस पर तो बात ही नहीं की गई है। समिति अपनी रिपोर्ट कब तक प्रस्तुत करेगी, ऐसी कोई समय सीमा नहीं रखी गई। कमेटी में केंद्र सरकार के कर्मचारी संगठन ही नहीं, बल्कि राज्यों के प्रतिनिधियों को भी दरकिनार कर दिया गया। दरअसल, एनपीएस पर बनी केंद्र सरकार की यह कमेटी, आंखों में धूल झोंकने का एक जरिया है। कर्मचारी संगठनों ने तो एनपीएस में सुधार के लिए कभी कोई मांग ही नहीं उठाई है। शुरुआत से ही कर्मचारियों की एक ही मांग है कि एनपीएस को खत्म करें और परिभाषित एवं गारंटीशुदा पुरानी पेंशन योजना को बहाल किया जाए। सरकार ने ध्यान भटकाने और कर्मचारियों को चकमा देने के लिए इस कमेटी का गठन किया है।

कॉरपोरेट का 10 लाख करोड़ रुपये का ऋण छोड़ा

केंद्र सरकार के दिमाग में कर्नाटक विधानसभा चुनाव और अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव हैं। सातवें केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों के बाद भी सरकार ने पेंशन सचिव की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई थी। श्रीकुमार के अनुसार, तब स्टाफ साइड की राष्ट्रीय परिषद (जेसीएम), आईएएस और आईपीएस एसोसिएशन के प्रतिनिधि भी समिति के समक्ष उपस्थित हुए थे। उन्होंने आंकड़ों के साथ यह बात साबित की थी कि जो कर्मचारी एनपीएस में सेवानिवृत होंगे, उनके लिए वह स्थिति एक आपदा की तरह होगी। वजह, एनपीएस से जो पेंशन मिलेगी, वह पुरानी पेंशन के मुकाबले कहीं भी नहीं ठहरती। कमेटी ने भरोसा दिया था कि कर्मचारियों की उचित सिफारिशों के साथ रिपोर्ट पेश की जाएगी। हैरानी की बात है कि वह रिपोर्ट अभी तक कर्मचारी संगठनों के पास नहीं पहुंची है। इसी तरह वर्तमान में 'एनपीएस' के लिए जो समिति गठित की गई है, वह सरकारी कर्मचारियों के साथ कोई न्याय करेगी, ऐसी उम्मीद बिल्कुल नहीं है। कॉरपोरेट सेक्टर द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से लिया गया 10 लाख करोड़ रुपये का ऋण छोड़ दिया जाता है, अब वही सरकार, पुरानी पेंशन को सरकारी खजाने पर बोझ बता रही है।

यह भी पढ़ें: OPS: हिमाचल अप्रैल में नहीं कटेगा एनपीएस का शेयर, ओपीएस के लिए अभी नहीं मांगा विकल्प

ओपीएस को लेकर लड़ाई जारी रखेंगे कर्मचारी संगठन

सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्पष्ट तौर यह फैसला सुनाया गया है कि पेंशन कोई उपहार नहीं है। यह सरकारी कर्मचारियों का मौलिक अधिकार है। ऐसे में केंद्र सरकार द्वारा यह कहने का कोई औचित्य नहीं है कि पेंशन एक बोझ है। सरकार और उसके प्रतिनिधि लगातार ऐसी बयानबाजी कर रहे हैं। इससे पहले केंद्र सरकार ने कर्मचारियों के 18 महीने के डीए का बकाया भी रोक दिया है। पांचवें और छठे केंद्रीय वेतन आयोग ने 40 फीसदी फिटमेंट लाभ दिया था, मगर सातवें केंद्रीय वेतन आयोग ने 13 फीसदी फिटमेंट लाभ भी नहीं दिया है। संसदीय स्थायी समिति द्वारा पेंशनरों को लेकर जो सिफारिशें दी जाती हैं, उसे भी सरकार स्वीकार नहीं करती। सरकार यह जानती है कि कर्मियों द्वारा हर महीने अपने वेतन का एनपीएस में 10 फीसदी योगदान देने के बावजूद उन्हें कुछ नहीं मिल रहा। कोई व्यक्ति महज दो चार हजार रुपये की मासिक पेंशन में कैसे गुजारा कर सकता है। 'एनपीएस' को किसी भी तरह से 'ओपीएस' के समकक्ष या उसके करीब भी नहीं माना जा सकता। कर्मचारी संगठन, ओपीएस को लेकर अपनी लड़ाई जारी रखेंगे।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed