विपक्ष ने की दलितों के मुद्दे पर बहस करने की मांग, सरकार ने कहा-नहीं
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गुजरात के ऊना में दलितों की पिटाई का मामला हो, कर्नाटक में दलितों की पिटाई, या एमपी में गोमांस ले जाने के शक में मुस्लिम महिला की पिटाई का मामला, देश में दलितों की पिटाई का मुद्दा गरमाया हुआ है, वो भी ऐसे वक्त जब संसद का मॉनसून सत्र भी चल रहा है। ऐसा नहीं है कि दलित उत्पीड़न के ये तीन मामले ही हैं, दरअसल, इन मुद्दों ने देश भर में दलितों पर एक नई बहस छेड़ दी है।
दलितों के खिलाफ अत्याचार कैसे खत्म हो, उन्हें मुख्यधारा से कैसे जोड़ा जाए, उनकी आर्थिक हालत, रोजगार और शिक्षा के बारे में सरकार क्या कर रही है, इन तमाम सवालों पर विचार होना चाहिए और सरकार को जवाब भी देना चाहिए। लेकिन बजाए समस्याओं के निपटारे पर, मामले पर राजनीतिक लाभ लेने की होड़ मची हुई है।
इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुतबिक इसी होड़ में संसद में विपक्षी दल दलितों के मुद्दे पर बहस चाहते हैं, वहीं, पहले से किरकिरी झेल रही सरकार ने दलितों के मुद्दे पर बहस करने से पांव पीछे खींच लिए हैं।
'और भी मुद्दे हैं, पहले उन पर बात होनी चाहिए'
सरकारी सूत्रों की मानें तो संसद में इस मुद्दे पर पहले ही बहस हो चुकी है। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने मामले को 'सामाजिक मुद्दा' मानकर बहस कराने की सोची, लेकिन विपक्षी दल इसे राजनीतिक मुद्दा बना देते, इसलिए महाजन ने कहा कि संसद में 'विकास के मुद्दे' पर ही बहस होनी चाहिए।
बुधवार को बीएसी मीटिंग के दौरान टीएमसी के कल्याण बैनर्जी ने कहा कि सरकार को दलितों पर हो रहे हमलों के मुद्दे पर बहस के लिए अलग से समय निकालना चाहिए। कांग्रेस के केसी वेनुगोपाल, सीपीएम के मोहम्मद सलीम और बीजू जनता दल के तथागत सतपति ने कल्याण बैनर्जी की बात से सहमति जताई।
संसदीय मामलों के मंत्री अनंत कुमार ने कहा कि सरकार दलितों के मामले पर बात करने से इनकार नहीं कर रही है, लेकिन पहले देश में बाढ़ की स्थिति, सतत विकास लक्ष्यों और जिला विकास समन्वय और निगरानी समिति के कामकाज पर बहस होनी चाहिए।
दलितों के मुद्दे पर बात करने से पीछे क्यों हट रही सरकार?
सूत्रों की मानें तो लोक जनशक्ति पार्टी के चिराग पासवान बीएसी मीटिंग में मौजूद थे लेकिन उन्होंने किसी भी मुद्दे पर अपनी राय प्रकट नहीं की।
पिछले कुछ दिनों में जीरो आवर के दौरान सदन में गौहत्या के आरोप में दलितों के पीटने वाले मुद्दे पर सवाल खड़े किए जा चुके हैं।
दोपहर के बाद जब लोकसभा की कार्रवाई शुरू हुई तो कांग्रेस के वेनुगोपाल ने कहा कि सरकार की तरफ से 193 नियम के तहत एसडीजी बहस पर सरकार का कौन सा नेता बोलेगा। उपाध्यक्ष एम तांबिदुरै ने सलाह दी कि प्लानिंग मंत्री राव इंद्रजीत या रेलमंत्री सुरेश प्रभु विपक्ष के सवालों का जबाव दे सकते हैं, लेकिन राव ने ऐसा करने से मना कर दिया।
सुरेश प्रभु के आश्वासन के बाद शुरू हुई कार्रवाई
इसके बाद कांग्रेस के एम वीरप्पा मोइली और बीजेडी के भरतहरि महताब ने वेनुगोपाल का साथ दिया। लेकिन इस मौके पर सरकार के मंत्री मौजूद नहीं थे, वीरप्पा मोइली ने सरकार के मंत्री की गैरमौजूदगी पर गुस्सा जताया और कहा कि बहस को तब तक स्थगित किया जाना चाहिए, जब तक कि सरकार के मंत्री न आ जाएं।
विपक्ष के अशांत नेताओं को शांत करते हुए प्रभु ने कहा कि उनकी बातों का संज्ञान लिया जाएगा। मेनका गांधी ने कहा कि वह केवल उनके यानी महिला एवं बाल विकास मंत्रालय पर ही जबाव देंगी। लेकिन मोइली ने कहा कि जब से एसडीजी (सतत विकास लक्ष्यों) को लेकर 17 अलग मंत्रियों के नाम जुड़े हैं उन्हें उपस्थित रहना चाहिए।
आखिर में लोकसभा की कार्रवाई तब शुरू हो सकी जब प्रभु ने कहा ''कैबिनेट का कोई भी सदस्य कैबिनेट की जवाबदेही प्रदान करेगा, इसलिए बहस के आखिर में सटीक जवाब मिलेगा।''