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एक समय में बीजेपी ने भी बनवाई थी यूपी में मुलायम की सरकार

Wed, 22 Feb 2017 11:15 AM IST
बीबीसी
बीबीसी Updated Wed, 22 Feb 2017 11:15 AM IST
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साल 2003 की बात है, उत्तर प्रदेश में बीएसपी और बीजेपी की मिली-जुली सरकार चल रही थी। जिसमे मायावती मुख्यमंत्री थीं। भाजपा के लालजी टंडन, ओमप्रकाश सिंह, कलराज मिश्र, हुकुम सिंह जैसे नेता कबीना मंत्री थे। यह सरकार 2002 के विधानसभा चुनाव में त्रिशंकु विधानसभा का परिणाम थी। इसमें समाजवादी पार्टी को 143, बीएसपी को 98, बीजेपी को 88, कांग्रेस को 25 और अजित सिंह की रालोद को 14 सीटें आई थीं।
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किसी भी पार्टी की सरकार न बनते देख पहले तो राष्ट्रपति शासन लगा। फिर बीजेपी और रालोद के समर्थन से तीन मई, 2002 को मायावती मुख्यमंत्री बन गईं। मायावती का तर्क था कि 1989 में मुलायम सिंह भी बीजेपी के समर्थन से सरकार चला चुके हैं। और फिर उनके राज में तो अल्पसंख्यक हमेशा सुरक्षित रहते हैं। साल 2003 की शुरुआत हंगामाखेज रही। मायावती ने निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह ऊर्फ राजा भैया पर आतंकवाद निरोधक अधिनियम (पोटा) के तहत केस लगा दिया।
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राजा भैया और धनंजय सिंह उन 20 विधायकों में शामिल थे, जिन्होंने राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री से मिलकर मायावती सरकार को बर्खास्त करने की माँग की थी। इसलिए उन्हें नवंबर में ही जेल में बंद कर दिया गया था। भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष विनय कटियार ने राजा भैया पर से पोटा हटाने की मांग की, लेकिन मायावती ने यह मांग ठुकरा दी और कहा कि राजा भैया पर लगा पोटा नहीं हटाया जाएगा। इससे बात बिगड़ती चली गई।
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बिगड़ते हालातो के साथ बिगड़ गए रिश्ते

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इस बीच दोनों दलों के बीच खटास बढ़ने की एक और वजह पैदा हो गई। ताज हैरिटेज कॉरिडोर के निर्माण को को लेकर यूपी सरकार और केंद्र सरकार के बीच तनातनी बढ़ गई, क्योंकि केंद्रीय पर्यटन मंत्री जगमोहन ने बिना प्रक्रियाओं को पूरे किए, हो रहे निर्माण के लिए यूपी सरकार को जिम्मेदार ठहरा दिया।

इससे नाराज मायावती ने 29 जुलाई, 2003 को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके, जगमोहन को केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटाने की मांग कर दी, इसके साथ ही जगमोहन के इस्तीफे की मांग को लेकर बीएसपी सांसदों ने लोकसभा में जमकर हंगामा किया।

इससे भाजपा-बसपा के रिश्ते बिगड़ते चले गए। भाजपा के साथ बढ़ते तनाव के बीच 26 अगस्त, 2003 को मायावती ने कैबिनेट की बैठक बुलाकर विधानसभा भंग करने की सिफारिश के साथ राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप दिया।

मायावती के इस कदम से हैरान भाजपा विधायकों ने लालजी टंडन के नेतृत्व में आनन-फानन में राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री से मुलाकात कर उन्हें सरकार से समर्थन वापस लेने की जानकारी दी।
राज्यपाल ने यह कहते हुए विधानसभा भंग नहीं की कि उनको मायावती सरकार से समर्थन वापसी का भाजपा विधायकों का पत्र, कैबिनेट के विधानसभा भंग करने के प्रस्ताव से पहले ही मिला।

मुलायम सिंह ने सरकार बनाने का कर दिया था दावा पेश

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26 अगस्त को ही मुलायम सिंह ने सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया। तब तक उनके पक्ष में पर्याप्त विधायक नहीं थे। इस बीच, 27 अगस्त को बसपा के 13 विधायकों ने राज्यपाल से मुलाकात कर उन्हें एक पत्र सौपा। इसमें बताया गया था कि वे मुलायम सिंह यादव का मुख्यमंत्री पद हेतु समर्थन करते हैं।

बसपा ने इस घटनाक्रम पर ऐतराज जताया और कहा कि उसके विधायक दल के 13 विधायकों का राज्यपाल से मिलकर विपक्षी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव को मुख्यमंत्री पद हेतु समर्थन देना, स्वेच्छा से अपनी पार्टी (बीएसपी) छोड़ना माना जाए, जो कि दलबदल निरोधक क़ानून और संविधान की 10वीं अनुसूची का उल्लंघन है, इसलिए उनकी सदस्यता खारिज की जाए।

इसके लिए बसपा विधायक दल के तत्कालीन नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने विधानसभा अध्यक्ष और भाजपा के वरिष्ठ नेता केसरीनाथ त्रिपाठी को एक याचिका सौंपी, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष ने इस पर कोई फैसला नहीं लिया। दरअसल, इस बीच दिल्ली में बीजेपी की संसदीय बोर्ड की 26 अगस्त की सुबह हुई बैठक में यह फैसला लिया जा चुका था कि यूपी की विधानसभा भंग करने से बेहतर विकल्प वहां राष्ट्रपति शासन लगाया जाना है, क्योंकि पार्टी नए चुनाव के लिए तैयार नहीं है।

विधानसभा भंग करने की जगह अगर मुलायम सिंह की सरकार बनती हो, तो ऐसी सरकार बनने दी जाए। बसपा के 13 बागी विधायकों का समर्थन मिलते ही मुलायम सिंह ने 210 विधायकों की सूची राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री को सौंप दी और बिना समय गंवाए शास्त्री ने उन्हें शपथ ग्रहण का न्योता दे दिया।

राज्यपाल ने 29 अगस्त, 2003 को मुलायम सिंह को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। उन्हें बहुमत सिद्ध करने के लिए दो हफ्ते का समय दिया गया। भाजपा नेता लालजी टंडन ने राज्यपाल के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि इससे लोकतंत्र मजबूत होगा।

मीडिया ने भी इस दिलचस्प स्थिति को अपनी रिपोर्टस में किया था दर्ज

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मिसाल के तौर पर, फ्रंटलाइन ने लिखा ," जिस भाजपा ने फरवरी, 2002 में मुलायम सिंह को मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया, उसी ने उन्हें सरकार बनाने में मदद की। 14 साल से मुलायम सिंह विरोधी राजनीति कर रहे अजित सिंह ने उन्हें समर्थन दिया। जो कल्याण सिंह, मुलायम सिंह को रामसेवकों की हत्या करने वाला रावण कहते थे, उन्होंने मुलायम सिंह को बहुमत जुटाने में मदद की और जिस सोनिया गांधी को मुलायम सिंह ने 1999 में प्रधानमंत्री बनने से रोक दिया था, उन्होंने मुलायम सिंह की सरकार को समर्थन दिया।"

मुलायम सिंह यादव ने विधानसभा में बहुमत साबित कर दिया। मुलायम की इस सरकार में राष्ट्रीय लोकदल, कल्याण सिंह की राष्ट्रीय क्रांति पार्टी के अलावा निर्दलीय और छोटी पार्टियों के 19 विधायक शामिल थे। इसके अलावा उन्हें कांग्रेस और सीपीएम ने बाहर से भी समर्थन दिया। इस बीच, बीएसपी के 37 विधायकों नें दारुलसफा में मीटिंग की और छह सितंबर को विधानसभा अध्यक्ष केसरीनाथ त्रिपाठी से मुलाकात कर उन्हें अलग दल के रूप में मान्यता देने की मांग की।

केसरीनाथ त्रिपाठी ने उसी शाम इस विभाजन को मान्यता दे दी, जबकि 13 विधायकों के दलबदल मामले में वो अब तक कोई फैसला नहीं कर पाए थे। दरअसल वो इंतजार कर रहे थे कि बसपा से बाहर आने वाले विधायकों की संख्या कब एक-तिहाई से ज्यादा हो जाए, ताकि उनका विभाजन दलबदल कानून के दायरे में न आए।

मुलायम का यह जंबो मंत्रिमंडल रहा इतिहास का सबसे बड़ा मंत्रिपरिषद

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बसपा के बागी विधायकों को लोकतांत्रिक बहुजन दल के रूप में मान्यता दी गई थी, जिसका बाद में सपा में विलय हो गया था। सरकार चलाने के लिए मुलायम सिंह को एक जंबो मंत्रिपरिषद बनानी पड़ी। इसमें बसपा के तमाम बागियों को मंत्री बनाने के कारण मंत्रियों की कुल संख्या 98 हो गई।

यूपी के इतिहास की यह सबसे बड़ी मंत्रिपरिषद थी, वह भी तब जब कांग्रेस और सीपीएम ने बाहर से समर्थन देते हुए, सरकार में शामिल होने से इनकार कर दिया था। इसके बाद पूरा मामला कोर्ट में शिफ्ट हो गया। बसपा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में एक रिट याचिका दायर कर 13 बागी बसपा विधायकों की सदस्यता खारिज नहीं करने और बसपा में विभाजन को मान्यता देने के विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को चुनौती दी।

राज्य सरकार इस मामले में लगातार तारीख मांगती चली गई। इससे केस टलता रहा। हालांकि भाजपा सरकार में शामिल नहीं थी, लेकिन विधानसभा में बहुमत होने के बाद भी मुलायम सिंह ने भाजपा के केसरीनाथ त्रिपाठी को विधानसभा अध्यक्ष बने रहने दिया। केसरीनाथ त्रिपाठी ने 19 मई 2004 को केंद्रीय नेतृत्व के कहने पर विधानसभा अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर उत्तर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष का पदभार संभाला।

हाईकोर्ट ने 12 मार्च 2006 को अपना निर्णय सुनाया। अदालत ने बसपा से 37 विधायकों के विभाजन को अलग दल के रूप में मान्यता देने के विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को खारिज कर दिया। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष से 13 विधायकों की सदस्यता पर पुनः फैसला करने का आग्रह किया। हाई कोर्ट के इस निर्णय को दोनों ही पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

आखिर भाजपा ने ऐसा क्यों किया?

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सुप्रीम कोर्ट ने 14 फरवरी, 2007 को अपने फैसले में बसपा बीएसपी में हुई टूट को अवैध बताते हुए 13 बागी विधायकों की सदस्यता खारिज कर दी। भले ही सुप्रीम कोर्ट ने बसपा के सभी दलीलों को मानते हुए, उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को पलट दिया, लेकिन कानूनी प्रक्रिया में इतनी देर होने की वजह से इसका कोई मतलब नहीं रहा क्योंकि विधानसभा का कार्यकाल पूरा हो चला था। अप्रैल-मई 2007 में राज्य में विधानसभा चुनाव हुए इसमें बसपा को पूर्ण बहुमत मिला।

इस पूरे प्रकरण से स्पष्ट होता है कि 26 अगस्त, 2003 तक रही मायावती सरकार भाजपा के प्रत्यक्ष समर्थन से बनी थी। लेकिन उसके बाद बनी मुलायम सिंह यादव की सरकार भी भाजपा ने ही बनवाई थी।
भाजपा ने अप्रत्यक्ष रूप से विधानसभा अध्यक्ष केसरीनाथ त्रिपाठी और राज्यपाल के जरिए मदद की थी, क्योंकि यह सर्वविदित तथ्य है कि राज्य का राज्यपाल किस तरह गृह मंत्रालय के अधीन काम करते हैं।
अब प्रश्न उठता है कि भाजपा ने आखिर ऐसा क्यों किया?

इसका जवाब शायद 26 अगस्त, 2003 को हुई भाजपा संसदीय दल की बैठक में छिपा है। इसमें कहा गया कि भाजपा यूपी में नया चुनाव नहीं चाहती है। बीजेपी के एमएलए एक साल के अंदर फिर से जनता के बीच जाने को तैयार नहीं थे।

इस बात की संभावना थी कि अगर बसपा नहीं टूटती, तो भाजपा टूट जाती। इसलिए बीजेपी ने न सिर्फ मुलायम सिंह की सरकार बनवाई, बल्कि उसे चलाने में भी सहयोग किया।
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