जवाहर बाग कांडः रामवृक्ष को अनुमति पर मुकर गए अफसर
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रामवृक्ष को जवाहर बाग की अनुमति पर सारे अधिकारी मुकर गए हैं। सभी ने कहा है कि उन्होंने किसी भी सत्याग्रह के लिए परमीशन नहीं दी थी। रामवृक्ष खुद ही भीड़ लेकर जवाहर बाग में दाखिल हो गया था। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि जबरन जवाहर बाग में घुसने वाले रामवृक्ष को उस वक्त निकाला क्यों नहीं गया।
उस समय तो रामवृक्ष के साथ लोग भी मुश्किल से 200 के करीब रहे होंगे। रामवृक्ष यादव मार्च, 2014 में मथुरा पहुंचा और जवाहर बाग में अपने साथियों को लेकर दाखिल हो गया। बताया जाता है कि उसने जवाहर बाग में सत्याग्रह के लिए प्रशासन से अनुमति मांगी थी। इसके लिए बाकायदा आवेदन किया गया था।
लेकिन अब मार्च, 2014 से जून, 2016 तक मथुरा में तैनात रहे पुलिस और प्रशासनिक अफसरों ने अनुमति की बात से साफ इंकार कर दिया है। खुफिया विभाग ने भी यही रिपोर्ट दाखिल की है। तत्कालीन अफसरों ने जो रिपोर्ट दी है उसमें कहा गया है कि उनसे कभी कोई अनुमति ली ही नहीं गई। कुछ ने तो यहां तक कहा है कि उनके पास रामवृक्ष यादव या उसका कोई आदमी परमीशन के लिए आया ही नहीं था। लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि सरकारी भूमि पर एक व्यक्ति अपने साथियों के साथ काबिज हो जाता है लेकिन पुलिस और प्रशासनिक अफसर खामोश रहे।
आदेश थे कि बल प्रयोग न करें
आखिर क्या वजह थी कि ढाई साल तक अफसर चुप्पी साधे रहे। अगर उसी वक्त जवाहर बाग को खाली करा लिया जाता तो इतनी बड़ी हिंसा न होती। उस वक्त पुलिस और प्रशासनिक बैठकों में जवाहर बाग का मुद्दा उठाया जाता था।
आला अफसरों का कहना होता था कि वार्ता करके जवाहर बाग को खाली कराया जाए। किसी के साथ कोई अप्रिय घटना नहीं होनी चाहिए। बल का प्रयोग नहीं करना है। लखनऊ की बैठकों में भी इस मुद्दे को उठाया गया लेकिन वहां से भी किसी ने कोई आदेश नहीं किया।
हर बार यह कह दिया जाता था कि थक हारकर खुद ही यहां से निकल जाएंगे। प्रशासन की इसी सुस्ती के कारण यहां भीड़ बढ़ती चली गई। जहां कभी 200 लोग थे वहां 2,500 ने डेरा जमा लिया था।