कांग्रेस के शासनकाल में ही शुरू हुआ एनसीआर अपडेट करने का काम
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असम में 1951 के बाद नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (एनआरसी) अपडेट करने का काम 2005 में शुरू हुआ था। उस समय केंद्र और राज्य में कांग्रेस की ही सरकार थी। इससे पहले 1985 में असम गण परिषद और तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के बीच एनसीआर को अपडेट करने के लिए हुए ‘असम समझौते’ के दौरान भी दोनों जगह कांग्रेस की ही सरकार थी। तब असम में कांग्रेस की हितेश्वर सेकिया सरकार थी।
देश के बंटवारे के बाद तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से घुसने वाले अवैध अप्रवासियों की पहचान के लिए असम में पहला नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (एनआरसी) 1951 में बनाया गया था। इसमें राज्य के हर गांव में रहने वाले लोगों के नाम, उनकी संख्या, घर, संपत्तियों का विवरण था। बावजूद इसके बांग्लादेश से घुसपैठ जारी रही। 1971 के बाद बड़ी तादाद में शरणार्थी असम पहुंचे।
1980 में बांग्लादेशी घुसपैठियों को बाहर करने के लिए एनसीआर को अपडेट करने की मांग के साथ असम में आंदोलन जोर पकड़ने लगा। इसका नेतृत्व अखिल असम छात्र संघ (आसू) और असम गण परिषद ने किया। अगस्त, 1985 में केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार और आंदोलन के नेताओं के बीच ‘असम समझौता’ हुआ। समझौते में तय हुआ कि 1971 तक असम में घुसे बांग्लादेशियों को नागरिकता दी जाएगी। बाकी को निर्वासित किया जाएगा।
असम आंदोलन के दम पर विधानसभा चुनावों में पहुंची असम गण परिषद और उसके मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत ने समझौते के ज्यादातर प्रावधानों को भुला दिया। महंत की सरकार दो बार सत्ता में रही। 2005 में एक बार फिर इसी मुद्दे को लेकर आंदोलन हुआ।
एनसीआर अपडेट करने का काम शुरू किया गया, लेकिन तेजी दिखाई नहीं दी। इसके बाद आसू और विभिन्न संगठनों ने 2013 में मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिकाएं दायर कीं। भाजपा ने भी असम में लोकसभा और विधानसभा चुनाव के दौरान इसे बड़ा मुद्दा बनाया। जब असम में पहली बार पूर्ण बहुमत वाली भाजपा सरकार आई, तो मांग ने जोर पकड़ा। 2015 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और निगरानी में यह काम शुरू हुआ।
अवैध प्रवासियों ने बदला असम की आबादी का स्वरूप
असम में अवैध बांग्लादेशियों का मामला बहुत बड़ा मुद्दा रहा है। दरअसल, देश के बंटवारे के बाद उस समय के पूर्वी पाकिस्तान से बड़ी तादाद में अवैध प्रवासी असम में घुस आए। इसके बाद 1971 में बांग्लादेशी घुसपैठ ने असम की आबादी का स्वरूप बदल दिया।
धीरे-धीरे असम में मुस्लिमों और बांग्ला भाषी लोगों की तादाद बढ़ने लगी। इसके बाद पश्चिम बंगाल से भी बड़ी तादाद में लोग असम में जाकर बसने लगे। असम के मूल निवासियों ने आरोप लगाना शुरू कर दिया कि अवैध अप्रवासी उनके अवसरों को कम कर रहे हैं। यही नहीं बांग्लाभाषी स्थानीय लोगों पर हावी होते जा रहे हैं। अवैध अप्रवासियों के मुद्दे को लेकर असम में कई बार बड़े और हिंसक आंदोलन हुए हैं।
अगर सफल हुए तो सबसे बड़ा निर्वासन होगा
अगर केंद्र सरकार एनआरसी में अवैध ठहराये 40 लाख से ज्यादा लोगों को उनके देश वापस भेज पाती है तो यह दुनिया में अब तक का सबसे बड़ा निर्वासन होगा। इससे पहले किसी भी देश ने इतनी बड़ी तादाद में शरणार्थियों को अपने देश नहीं भेजा है।
महंत से नाराज भृगु फूकन ने बनाई ‘नूतन अगप’
1985 में प्रफुल्ल कुमार महंत के साथ असम समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले चार लोगों में आसू के महासचिव भृगु कुमार फूकन भी थे। राज्य में दिसंबर, 1985 में बनी अगप सरकार में वह गृह मंत्री बनाए गए। आपसी नाराजगी के कारण 1991 में फूकन ने महंत से अलग राह पकड़ ली और नूतन असम गण परिषद बनाई।
1994 में दोनों फिर साथ आए। फूकन को अगप का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया, लेकिन महंत से मतभेद सुलझ नहीं पाए और 1996 में वह फिर अलग हो गए। लगातार तीन बार विधायक रहे फूकन 2001 में राकांपा के टिकटपर चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन हार गए। इसके बाद 2004 में वह अगप के टिकट पर गुवाहाटी से लोकसभा चुनाव में उतरे। इस बार भी उन्हें शिकस्त मिली। 20 मार्च, 2006 को दिल्ली के अस्पताल में पीलिया के इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।