{"_id":"5bd997d8bdec2269796a98ea","slug":"no-difference-between-congress-and-bjp-in-mizoram","type":"story","status":"publish","title_hn":"Assembly Election 2018: मिजोरम में तो साझेदार हैं कांग्रेस और भाजपा","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Assembly Election 2018: मिजोरम में तो साझेदार हैं कांग्रेस और भाजपा
चुनाव डेस्क, अमर उजाला
Updated Wed, 31 Oct 2018 05:24 PM IST
विज्ञापन
प्रतीकात्मक तस्वीर
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पूरे देश में कांग्रेस और भाजपा के नेता भले एक-दूसरे को बुरा-भला कह कर अपनी राजनीति चमकाने में जुटे हों, लेकिन एक जगह ऐसी भी है जहां यह दोनों कट्टर प्रतिद्वंद्वी एक-दूसरे के सहयोगी हैं और मिल कर सत्ता चला रहे हैं। यह बात सुनने में भले आश्चर्यजनक लगे, लेकिन है सोलह आने सच। ये जगह है पूर्वोत्तर का पर्वतीय राज्य मिजोरम, जहां 28 नवंबर को विधानसभा चुनाव होने हैं।
राज्य में कांग्रेस बीते दस वर्षों से सत्ता में है। अबकी भाजपा यहां उसको सत्ता से बाहर करने के लिए कमर कस कर मैदान में उतरी है। पूर्वोत्तर का यही अकेला राज्य है जहां कांग्रेस सत्ता में है और भाजपा सत्ता से बाहर। बाकी छह राज्यों में खुद अपने बूते या घटक दलों के सहारे पार्टी सत्ता में है। मिजोरम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के नेता एक-दूसरे खिलाफ आग उगलने में जुट गए हैं। लेकिन यहीं एक जगह ऐसी भी है जहां दोनों दल आपसी सद्भाव और सहयोग की मिसाल बने हुए हैं।
अब विपक्षी मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) समेत राज्य के तमाम क्षेत्रीय दल इस मुद्दे पर दोनों दलों को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। शायद इसी वजह से भाजपा के नेता यह सफाई देते फिर रहे हैं वह अबकी कांग्रेस या दूसरी किसी पार्टी के साथ कोई चुनावी तालमेल नहीं करेंगे।
विज्ञापन
यह पूरा माजरा समझने के लिए कुछ महीने पीछे लौटना होगा। दरअसल, म्यांमार व बांग्लादेश की सीमा से लगे दक्षिण-पश्चिम मिजोरम में रहने वाले चकमा जनजाति के लोगों के लिए गठित चकमा स्वायत्त जिला परिषद की 20 में से 19 सीटों के लिए बीते अप्रैल में चुनाव कराए गए थे। उसमें किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था। तब एमएनएफ को आठ, कांग्रेस को छह और भाजपा को पांच सीटें मिली थीं।
उसके बाद ही एमएनएफ को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस और भाजपा ने हाथ मिला कर यूनाइटेड लेजिस्लेचर पार्टी (यूएलपी) नामक नया गठबंधन बनाया था। कांग्रेस के छह सदस्यों के समर्थन से भाजपा ने तब बोर्ड का गठन किया था। उस समय राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने भी इस पर हैरत जताई थी। इसकी वजह यह थी कि मई. 2016 में भाजपा ने पूर्वोत्तर के तमाम दलों को लेकर जिस नार्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक एलायंस (नेडा) का गठन किया था उसमें एमएनएफ भी शामिल था।
अब दोनों दल इस मुद्दे पर सफाई देने में जुटे हैं। कांग्रेस के नेता जोडिंत्लुआंगा कहते हैं कि पार्टी के नेताओं ने स्थानीय समीकरणों के आधार पर भाजपा को निजी हैसियत से समर्थन देने का फैसला किया था। उन्होंने दावा किया कि राष्ट्रीय या राज्य की राजनीति में इसका कोई असर नहीं होगा।
दूसरी ओर, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष जे.वी.लूना कहते हैं कि पार्टी ने कांग्रेस से समर्थन नहीं मांगा था। उसके सदस्यों ने खुद समर्थन का प्रस्ताव दिया था। दिलचस्प बात यह है कि स्वायत्त परिषद के नतीजे आने और बोर्ड के गठन के बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी अपने एक ट्वीट में इसे मिजोरम में भाजपा का उदय करार देते हुए स्थानीय नेताओं को बधाई दी थी।
विज्ञापन
राज्य में कांग्रेस बीते दस वर्षों से सत्ता में है। अबकी भाजपा यहां उसको सत्ता से बाहर करने के लिए कमर कस कर मैदान में उतरी है। पूर्वोत्तर का यही अकेला राज्य है जहां कांग्रेस सत्ता में है और भाजपा सत्ता से बाहर। बाकी छह राज्यों में खुद अपने बूते या घटक दलों के सहारे पार्टी सत्ता में है। मिजोरम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के नेता एक-दूसरे खिलाफ आग उगलने में जुट गए हैं। लेकिन यहीं एक जगह ऐसी भी है जहां दोनों दल आपसी सद्भाव और सहयोग की मिसाल बने हुए हैं।
विज्ञापन
अब विपक्षी मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) समेत राज्य के तमाम क्षेत्रीय दल इस मुद्दे पर दोनों दलों को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। शायद इसी वजह से भाजपा के नेता यह सफाई देते फिर रहे हैं वह अबकी कांग्रेस या दूसरी किसी पार्टी के साथ कोई चुनावी तालमेल नहीं करेंगे।
विज्ञापन
यह पूरा माजरा समझने के लिए कुछ महीने पीछे लौटना होगा। दरअसल, म्यांमार व बांग्लादेश की सीमा से लगे दक्षिण-पश्चिम मिजोरम में रहने वाले चकमा जनजाति के लोगों के लिए गठित चकमा स्वायत्त जिला परिषद की 20 में से 19 सीटों के लिए बीते अप्रैल में चुनाव कराए गए थे। उसमें किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था। तब एमएनएफ को आठ, कांग्रेस को छह और भाजपा को पांच सीटें मिली थीं।
उसके बाद ही एमएनएफ को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस और भाजपा ने हाथ मिला कर यूनाइटेड लेजिस्लेचर पार्टी (यूएलपी) नामक नया गठबंधन बनाया था। कांग्रेस के छह सदस्यों के समर्थन से भाजपा ने तब बोर्ड का गठन किया था। उस समय राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने भी इस पर हैरत जताई थी। इसकी वजह यह थी कि मई. 2016 में भाजपा ने पूर्वोत्तर के तमाम दलों को लेकर जिस नार्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक एलायंस (नेडा) का गठन किया था उसमें एमएनएफ भी शामिल था।
अब दोनों दल इस मुद्दे पर सफाई देने में जुटे हैं। कांग्रेस के नेता जोडिंत्लुआंगा कहते हैं कि पार्टी के नेताओं ने स्थानीय समीकरणों के आधार पर भाजपा को निजी हैसियत से समर्थन देने का फैसला किया था। उन्होंने दावा किया कि राष्ट्रीय या राज्य की राजनीति में इसका कोई असर नहीं होगा।
दूसरी ओर, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष जे.वी.लूना कहते हैं कि पार्टी ने कांग्रेस से समर्थन नहीं मांगा था। उसके सदस्यों ने खुद समर्थन का प्रस्ताव दिया था। दिलचस्प बात यह है कि स्वायत्त परिषद के नतीजे आने और बोर्ड के गठन के बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी अपने एक ट्वीट में इसे मिजोरम में भाजपा का उदय करार देते हुए स्थानीय नेताओं को बधाई दी थी।