आंकड़ा नहीं: देश में भीड़ की मार से मारे गए लोगों का नहीं है रिकॉर्ड, संसद में सरकार ने फिर दिया यह जवाब
देशभर में हर साल मॉब लिंचिंग की घटनाएं होती हैं, लेकिन उनका कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता। माननीयों द्वारा संसद में इसके आंकड़े मांगे जाते हैं तो सरकार हाथ खड़े कर देती है।
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मीडिया में अक्सर ये खबरें आती रहती हैं कि भीड़ ने किसी व्यक्ति को पीट पीटकर मार डाला (मॉब लिंचिंग), लेकिन हैरानी की बात यह है कि ऐसी आपराधिक घटनाओं का भी रिकॉर्ड नहीं रखा जाता है। इसे लेकर सरकार के पास कोई जानकारी नहीं होती है। साल 2018 से लेकर अब तक दर्जनों बार यह सवाल संसद के पटल पर आ चुका है, लेकिन सरकार का जवाब हमेशा एक ही रहता है कि सरकार ऐसे आंकड़े नहीं रखती। पुलिस तथा कानून व्यवस्था, राज्यों का विषय है।
संसद के चालू सत्र में राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने जब यह सवाल किया तो उन्हें भी वही जवाब दे दिया गया। बता दें कि 2018 के दौरान कोई एक-दो नहीं, बल्कि दर्जनों सांसदों ने पूछा था-देश में अफवाह के चलते या सोशल मीडिया से भम्रित हुई भीड़ ने अभी तक कितने लोगों को पीट-पीट कर मार डाला? ऐसे मामलों की संख्या बताई जाए। उनमें क्या कार्रवाई हुई? यह भी बताया जाए। उस वक्त भी गृह मंत्रालय ने यही जवाब दिया था कि सरकार ऐसे आंकड़े नहीं रखती। पुलिस तथा कानून व्यवस्था, राज्यों का विषय है। ऐसे में तो राज्य सरकारें ही इस सवाल का जवाब दे सकती हैं।
क्या ऐसी घटनाओं में साजिश होती है?
जुलाई 2018 में संसद सत्र के दौरान राज्यसभा के तीन सांसदों- विशंभर प्रसाद निषाद, छाया वर्मा औैर चौधरी सुखराम यादव ने सवाल पूछा कि बच्चा चोरी के नाम पर भीड़ ने पीट-पीट कर कितने लोगों को मार डाल? पिछले तीन साल में किस राज्य में ऐसे कितने मामले सामने आए हैं? यह भी पूछा गया कि क्या ऐसी घटनाओं के पीछे कोई साजिश होती है? जवाब में तत्कालीन गृह राज्यमंत्री हंसराज गंगाराम अहीर ने उत्तर देते हुए कहा, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ऐसा कोई डेटा नहीं रखता। पुलिस और कानून व्यवस्था राज्य सरकारों का विषय है। जान-माल की रक्षा करने की जिम्मेदारी भी राज्य सरकार की होती है।
रटा रटाया जवाब दिया गया
उसी सत्र में कई बार यह सवाल उठा था। रिपुन बोरा और हुसैन दलवई जैसे सांसदों ने भी वही सवाल दोहरा दिया। देश में भीड़ ने पीट-पीट कर कितने लोगों को मार डाला है? उन्हें भी रटा रटाया वही जवाब दे दिया गया। उन्हें यह भी बताया गया कि केंद्र ने सभी राज्य सरकारों एवं संघ शासित प्रदेशों को एक परामर्श पत्र जारी किया है। इसमें कहा गया कि ऐसी अफवाहों का पता लगाएं। इस तरह की घटनाओं पर नजर रखें। आरोपियों के साथ प्रभावशाली तरीके से निपटें। कानून हाथ में लेने वालों को दंडित करें।
24 जुलाई 2018 को तत्कालीन 10 लोकसभा सांसदों ने वही सवाल पूछा। उन्हें भी वही जवाब मिला। लोकसभा सांसद सौगत राय ने पूछा, बताओ कितने बेगुनाह लोगों को भीड़ ने मार डाला? तो सांसद ओवैसी ने सवाल किया, सरकार ने अभी तक कितनों के खिलाफ कार्रवाई की है? तत्कालीन सांसद मुथम सेटी श्रीनिवास राव अवंती, कौशलेंद्र कुमार, हरीश मीना, केसी वेणुगोपाल, मौसम नूर, सीएन जयदेवन और शिशिर कुमार अधिकारी ने भी ऐसे ही सवाल किए थे। इस पर भी सरकार का जवाब वही रहा।
मनोज झा ने यह सवाल किया
चालू संसद सत्र में 28 जुलाई को राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने पूछा, क्या सुप्रीम कोर्ट द्वारा तहसीन पूनावाला विनिर्णय में प्रस्तावित घृणा संबंधी अपराधों/लिंचिंग से संबंधित कानून का मसौदा मंत्रालय ने तैयार किया है? इसे सभा पटल पर कब तक रखा जाएगा? क्या इस विनिर्णय के अनुसार, मंत्रालय ने घृणा संबंधी अपराधों के आंकड़े एकत्रित करने का निर्देश एनसीआरबी को दिया है?
नागरिक केंद्रित ढांचा तैयार कर रही सरकार: नित्यानंद राय
इस पर गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने बताया, सरकार ने मौजूदा दांडिक कानूनों की व्यापक समीक्षा शुरू की है। भारत सरकार एक ऐसा कानूनी ढांचा तैयार करने की मंशा रखती है, जो नागरिक केंद्रित हो तथा जीवन को सुरक्षित बनाने और मानवाधिकारों के संरक्षण को प्राथमिकता देता हो। एनसीआरबी यह डेटा एकत्रित करेगी या नहीं, इस बारे में राज्यमंत्री ने कहा, तहसीन पूनावाला बनाम भारत संघ के मामले में 2016 की रिट याचिका 'सिविल' संख्या 754 में सुप्रीम कोर्ट के दिनांक 17 जुलाई 2018 के निर्णय में ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया गया है। गृह मंत्रालय ने कानून व्यवस्था बनाए रखने तथा यह सुनिश्चित करने के लिए समय-समय पर राज्यों और संघ क्षेत्रों को एडवायजरी जारी की है। कानून अपने हाथ में लेने वाले व्यक्तियों से सख्ती पूर्वक निपटा जाए। सरकार ने भीड़ द्वारा हत्या के खतरे को समाप्त करने के लिए मीडिया के माध्यम से लोगों में जागरूकता उत्पन्न की है।