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अयोध्या विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- क्या अहाते के बाहर सीता रसोई है
Tue, 06 Aug 2019 01:27 PM IST
Trainee Trainee
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Trainee Trainee
Updated Tue, 06 Aug 2019 01:27 PM IST
सार
- निर्मोही अखाड़ा ने कहा 1934 से कोई मुसलमान को राम जन्मस्थान में प्रवेश की अनुमति नहीं थी
- अखाड़ा के वकील ने कहा उनका वाद मालिकाना हक के लिए है
- सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार से सुनवाई शुरू
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद में मंगलवार को उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) में हिंदू पक्षकार ने दावा किया कि 1934 से इस विवादित ढांचे में किसी भी मुस्लिम को प्रवेश की इजाजत नहीं थी और यह पूरी तरह से निर्मोही अखाड़े के अधिकार में था।
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प्रघान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदसयीय संविधान पीठ के समक्ष अयोध्या प्रकरण में निर्मोही अखाड़े की ओर से बहस शुरू करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सुशील जैन ने यह ढांचा पूरी तरह से उसके अधिकार में ही है और वे इस क्षेत्र का प्रबंधन और इस पर अधिकार चाहते हैं।
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इस विवाद का मध्यस्थता के माध्यम से समाधान खोजने का प्रयास विफल होने के बाद संविधान पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सितंबर, 2010 के फैासले के खिलाफ दायर 14 अपीलों पर शुक्रवार से सुनवाई शुरू की है। संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति धनंजय वाई चन्द्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल हैं।
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संविधान पीठ ने दैनिक सुनवाई शुरू करते हुए अयोध्या प्रकरण की कार्यवाही की रिकार्डिंग करने के लिये राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के पूर्व विचारक के एन गोविन्दाचार्य का आवेदन अस्वीकार कर दिया। सुशील जैन ने संविधान पीठ से कहा कि निर्मोही अखाड़े का वाद मूलत: इस पर अधिपत्य और इसके प्रबंधन के अधिकार के लिये है। उन्होने कहा, ‘मैं एक पंजीकृत संस्था हूं। मेरा वाद मूल रूप से वस्तुओं, अधिपत्य और प्रबंधन के अधिकार के लिए है।’ उन्होंने कहा कि इस ढांचे का भीतरी बरामदा और राम जन्मस्थान सैकड़ों साल से निर्मोही अखाड़े के पास है
जैन से कहा, ‘भीतरी बरामदा और राम जन्मस्थान सैकड़ों साल से हमारे पास है। इसके बाहरी बरामदे में स्थित ‘सीता रसोई’, ‘चबूतरा’, ‘भण्डार गृह’ हमारे पास है और यह कभी भी किसी मामले में विवाद का हिस्सा नहीं था।’
इन अपीलों पर चल रही सुनवाई के दौरान पीठ के सदस्यों और एक मुस्लिम पक्षकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन के बीच तीखी नोंकझोंक भी हुई। पीठ ने निर्मोही अखाड़े के अधिवक्ता से कहा कि वह अपनी दलीलें दीवानी विवाद तक ही सीमित रखें और कुछ लिखित दस्तावेजों को पढ़ना छोड़ दें, इस पर धवन ने हस्तक्षेप किया और कहा कि संभवत: दलीलों में किसी प्रकार की कमी नहीं होगी।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि किसी भी तरह से सुनवाई या बहस में कटौती नहीं की जाएगी और इस बारे में किसी के भी मन में कोई संदेह नहीं रहना चाहिए। धवन ने दुबारा कहा कि यही तो हम भी कह रहे थे। इस पर प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘डा धवन, न्यायालय की गरिमा बनाकर रखिए।’ धवन ने इस पर कहा कि उन्होंने तो कुछ सवालों के सिर्फ जवाब ही दिए थे।
पीठ ने उनसे कहा, ‘कृपया यह ध्यान रखिए कि आप न्यायालय के एक अधिकारी हैं और हम सिर्फ यही कह रहे हैं कि हम किसी की भी दलीलों को छोटा नहीं करने जा रहे हैं।’ सुनवाई के दौरान निर्मोही अखाड़े की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद भूमि के 2.77 एकड़ विवादित हिस्से पर अपना दावा किया और कहा कि यह आदि काल से उसके ही पास है और इस स्थल पर राम लला की पूजा हो रही है।
इस पर पीठ ने कहा, ‘वैसे भी, उच्च न्यायालय की प्रारंभिक डिक्री में आपको विवादित क्षेत्र का एक तिहाई हिस्सा दिया गया है।’ सुप्रीम कोर्ट इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सितंबर, 2010 के फैसले के खिलाफ दायर अपीलों पर सुनवाई कर रही हैं। उच्च न्यायालय ने बहुमत के फैसले में कहा था कि विवादित 2.77 एकड़ भूमि तीनों पक्षकारों-सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला के बीच बराबर बराबर बांट दिया जाए।