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नई पाबंदियां: उठा सवाल-कब तक चुप रहेंगे सेवानिवृत्त सुरक्षा और गुप्तचर अधिकारी, गोपनीयता अधिनियम काफी था  

Mon, 05 Jul 2021 08:12 PM IST
सुरेंद्र जोशी जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली 
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली  Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Mon, 05 Jul 2021 08:12 PM IST
सार

गोपनीयता के नाम रिटायर्ड अधिकारियों पर लगाई गई नई पाबंदियों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सरकार ने हाल ही में कुछ नई पाबंदियां लगाई हैं। 
 

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New restrictions: The question raised - for how long will the retired security and intelligence officers remain silent, the secrecy act was enough
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विस्तार

केंद्र सरकार ने सिविल सेवा (पेंशन) नियमावली, 1972 में संशोधन कर 'सुरक्षा एवं जांच' एजेंसियों से सेवानिवृत हुए अधिकारियों के बोलने व लेखन को लेकर कई तरह की पाबंदियां लगाई हैं। सेवानिवृत्त अधिकारी किस विषय पर बोल सकते हैं और किस पर नहीं, ऐसा कोई वर्गीकरण नहीं किया गया है। नई पाबंदियों को लेकर सेवानिवृत्त अधिकारियों ने सवाल उठाए हैं। 

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देश में पहले से ही 'शासकीय गोपनीयता अधिनियम' है, उसके बावजूद केंद्र को दूसरा रास्ता अख्तियार करना पड़ा। पूर्व अफसरों का कहना है कि केंद्र सरकार ने इस बाबत सोच समझकर पहल नहीं की। सरकार ने सबके लिए एक जैसी पाबंदियां लगा दी। इन्हें खोलकर यानी विस्तार से बताना चाहिए था कि सेवा के दौरान या उसके बाद, कौनसी बातें पाबंदी के दायरे में आएंगी और कौनसी नहीं। 
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एकाएक जारी किया आदेश
युद्ध और सामान्यकाल के दौरान सुरक्षा एजेंसियों के पास कई ऐसी जानकारी होती हैं, जिनके द्वारा फोर्स का उत्साह बढ़ाया जा सकता है। वह किसी अंतरराष्ट्रीय संधि समझौते का उल्लंघन भी नहीं है। केंद्र सरकार ने इसकी परवाह न करते हुए एकाएक 'सुरक्षा एवं जांच' एजेंसियों के अफसरों के लिए एक आदेश जारी कर किसी भी तरह की जानकारी सार्वजनिक करने से मना कर दिया है। 

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रिटायर्ड अधिकारियों के लेखन पर रोक

भारत सरकार ने केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियमावली, 1972 में संशोधन कर 'सुरक्षा और गुप्तचर' महकमों के अधिकारियों के लेखन पर पाबंदियां लगा दी हैं। इस बाबत जारी की गई अधिसूचना में लिखा है, किसी गुप्तचर विभाग या सूचना के अधिकार कानून, 2005 की दूसरी अनुसूची में शामिल सुरक्षा-संबंधित संगठन में काम कर चुका कोई भी सरकारी सेवक अपनी सेवानिवृत्त के बाद संगठन के मुखिया की पूर्व मंजूरी के बिना अपना कोई लेख प्रकाशित नहीं करवा सकता। इस आदेश का मतलब है कि कोई पूर्व अधिकारी न तो अच्छी और न ही खराब बात, लिख सकता है। 

सुरक्षा मामला संवेदनशील: प्रदीप कुमार भारद्वाज
किसी भी तरह की विशिष्ट कार्य-आधारित सूचनाओं के प्रकाशन पर तो पहले से ही पाबंदी लगी हुई है। अब लेखन, परिचर्चा या वार्ता पर भी रोक लगाई जा रही है। आईबी में लंबे समय तक रहे पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रदीप कुमार भारद्वाज का कहना है, राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला बहुत संवेदनशील होता है। उससे जुड़ी बातें, बाहर न ही आएं तो अच्छा है। अगर विभाग का कोई निर्णय है तो उसे सार्वजनिक क्यों किया जाए। इसमें किसी अफसर को ऐतराज नहीं होना चाहिए। सरकारी सेवा के क्लॉज में कई बातें लिखी होती हैं। सीक्रेसी भी कई तरह की होती है। 

आखिर कौन से मामले में बात नहीं करनी है। ये देखने वाली बात है। सेवा के दौरान कोई अधिकारी किसी विशेष रणनीति से दंगे पर काबू पा जाता है, आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन में सफलता मिलती है, वह 'तकनीक', विभाग या एजेंसी से बाहर न जाए, यह प्रयास होना चाहिए। हालांकि केंद्र सरकार को पाबंदियों का आदेश जारी करने से पहले संशोधन में कही गई बातों का वर्गीकरण करना चाहिए था। इसके लिए गाइडलाइंस जारी की जा सकती थी। 

26 संगठन इंटेलिजेंस के दायरे में 

बता दें कि देश में करीब 26 संगठनों को 'इंटेलिजेंस' के दायरे में शामिल किया गया है। इनमें तीनों सेनाओं और उनकी इंटेलिजेंस इकाइयां, सभी केंद्रीय सशस्त्र एवं अर्धसैनिक बलों की खुफ़िया विंग, वित्तीय जांच एजेंसियों की सीक्रेट इकाई, जैसे ईडी, डीआरआई, आईटी, सीबीडीटी, केंद्र की टॉप सीक्रेट एजेंसी रॉ और आईबी के अलावा एनआईए व सीबीआई की इंटेलिजेंस यूनिट शामिल हैं। 

पूर्व सेनाध्यक्ष मलिक बोले-तीनों सेनाओं पर संशोधन लागू नहीं
बीते दिनों एक साक्षात्कार में पूर्व सेनाध्यक्ष वीपी मलिक ने दावा किया था कि केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियमावली, 1972 का यह संशोधन तीनों सेनाओं पर लागू नहीं होता। बीएसएफ में अहम पदों पर तैनात रहे पूर्व एडीजी संजीव कृष्ण सूद का कहना है, इन आदेशों में कुछ बदलाव की जरुरत है। हमें संशोधन की भावना पर ऐतराज नहीं है। अगर किसी पूर्व अधिकारी को लगता है कि कोई बात देश हित में है और उसके बारे में लोगों को पता होना चाहिए तो वहां विभाग के मुखिया को सारी पावर दे दी गई है। मुखिया, संशोधन को देखकर यह नहीं बोलेगा कि वह सामग्री छपने लायक है या नहीं। वह केंद्र को देखकर यह सब तय करेगा। 

सरकार ने कोई समय सीमा भी तय नहीं की है कि ये पाबंदियां कब तक जारी रहेंगी। केटेगरी नहीं है कि कहां पर पाबंदी लागू होगी। उचित और अनुचित बात का भेद नहीं किया गया है। कई बार सामग्री ठीक होती है, लेकिन खेमेबाजी के चलते उसके प्रकाशन पर रोक लग जाती है। कुछ ऐसे मामले भी होते हैं, जहां किसी विषय पर दिए गए बयान या चर्चा से विपक्ष को सहानुभूति मिलने की संभावना है तो ऐसे में सरकार उसकी इजाजत नहीं देगी। सरकार को यह बताना चाहिए कि कौन सी बात संवदेनशील है और कौन सी नहीं। अगर कोई पूर्व अधिकारी इन पाबंदियों की परवाह किए बिना कुछ लिखता है तो उसे पेंशन संबंधी अधिकार में कटौती का परिणाम भुगतना पड़ता है। 

मनमोहन सरकार के वक्त अलग आदेश जारी नहीं हुआ था

डॉ. मनमोहन सिंह सरकार में इस तरह की पाबंदियां लगाने की बात हुई थी। हालांकि उस वक्त अलग से आदेश जारी नहीं हुए थे। देश में पहले से ही शासकीय गोपनीयता अधिनियम लागू था, उसी के तहत कार्यप्रणाली को कस दिया गया। मतलब उस वक्त भी यही थी कि ये पाबंदियां, संवेदनशील सूचनाओं के उन खुलासों पर लागू होंगी, जिनसे राज्य की सुरक्षा और संप्रभुता को खतरा पहुंचता हो। 

बतौर सजा यह किया जाएगा
जो अधिकारी इसका उल्लंघन करेगा, उसे पेंशन संबंधी अधिकार में कटौती की सजा भुगतनी पड़ेगी। कई दूसरे देशों में भी इस तरह के एक्ट मौजूद हैं। अमेरिका, ब्रिटेन और दूसरे कई देशों में शासकीय गोपनीयता कानून व गुप्तचर सेवा अधिनियम लागू हैं। हालांकि वहां किसी एक एजेंसी को सारे अधिकार नहीं दिए गए हैं। 

अमेरिका में पाबंदी नहीं
अमेरिका में ऐसे लेखन पर पाबंदी नहीं है, लेकिन गोपनीय करार की शर्तों का ध्यान संबंधित अधिकारी को रखना पड़ता है। भारत में जो पावर विभाग के मुखिया को मिली है, यूएसए में इसके लिए अलग से प्री–पब्लिकेशन क्लासिफ़िकेशन रिव्यू बोर्ड स्थापित किया गया है। यहां से लेख को मंजूरी मिलती है तो वह छपाई के लिए भेज दिया जाता है। 

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