{"_id":"69448e35cb0e1af4ba01db5a","slug":"new-global-study-has-warned-that-climate-change-threatens-to-cause-extinction-of-8-000-species-by-end-era-2025-12-19","type":"story","status":"publish","title_hn":"चिंताजनक: सदी के अंत तक 8000 प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा, जैव विविधता के अस्तित्व पर गंभीर संकट","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
चिंताजनक: सदी के अंत तक 8000 प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा, जैव विविधता के अस्तित्व पर गंभीर संकट
Fri, 19 Dec 2025 04:59 AM IST
लव गौर
अमर उजाला नेटवर्क
अमर उजाला नेटवर्क
Published by: लव गौर
Updated Fri, 19 Dec 2025 04:59 AM IST
सार
एक नए वैश्विक अध्ययन ने चेताया है कि जलवायु परिवर्तन से पैदा हो रही भीषण गर्मी और भूमि उपयोग में हो रहे बदलाव मिलकर सदी के अंत तक करीब 8,000 प्रजातियों को विलुप्ति की ओर धकेल सकते हैं। अध्ययन ऑक्सफोर्ड विवि के स्कूल ऑफ जियोग्राफी एंड द एनवायरमेंट से जुड़े वैज्ञानिक डॉ. रुत वर्दी के नेतृत्व में किया गया है।
विज्ञापन
जलवायु परिवर्तन
- फोटो : Freepic
विस्तार
धरती का तापमान बढ़ रहा है और इन्सानी गतिविधियों का दायरा फैलता जा रहा है। इन दोनों के संयुक्त असर ने जंगलों, घास के मैदानों और दलदलों में पल रही जैव विविधता के अस्तित्व पर गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। एक नए वैश्विक अध्ययन ने चेताया है कि जलवायु परिवर्तन से पैदा हो रही भीषण गर्मी और भूमि उपयोग में हो रहे बदलाव मिलकर सदी के अंत तक करीब 8,000 प्रजातियों को विलुप्ति की ओर धकेल सकते हैं।
अध्ययन ऑक्सफोर्ड विवि के स्कूल ऑफ जियोग्राफी एंड द एनवायरमेंट से जुड़े वैज्ञानिक डॉ. रुत वर्दी के नेतृत्व में किया गया है। इसमें इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस, बंगलूरू के शोधकर्ता गोपाल मुरली समेत यूके, ऑस्ट्रेलिया और इजराइल के वैज्ञानिक शामिल थे। अध्ययन के नतीजे अंतरराष्ट्रीय जर्नल ग्लोबल चेंज बायोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं। शोध में करीब 30,000 उभयचर, पक्षी, स्तनधारी और सरीसृप प्रजातियों का विश्लेषण किया गया, ताकि यह समझा जा सके कि बढ़ती गर्मी और भूमि उपयोग में बदलाव उनके प्राकृतिक आवास और गर्मी सहने की क्षमता को किस हद तक प्रभावित कर सकते हैं।
डॉ. वर्दी का कहना है कि जब कई पर्यावरणीय दबाव एक साथ सक्रिय होते हैं तो जैव विविधता पर उनका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। इसी वजह से संरक्षण उपायों और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती के लिए तुरंत और समन्वित कदम उठाना जरूरी है। अध्ययन के अनुसार सदी के अंत तक 7,895 प्रजातियां ऐसी स्थिति में पहुंच सकती हैं, जहां उनके पूरे प्राकृतिक आवास क्षेत्र में या तो अत्यधिक गर्मी होगी या भूमि उनके रहने योग्य नहीं बचेगी, या फिर दोनों संकट एक साथ हावी होंगे। ऐसी परिस्थितियां उन्हें वैश्विक स्तर पर विलुप्ति के खतरे में डाल सकती हैं।
विज्ञापन
आवास का संकट सबसे गंभीर
शोधकर्ताओं ने पाया कि सबसे गंभीर स्थिति में औसतन प्रजातियों के 52 फीसदी आवास क्षेत्र रहने लायक नहीं रहेंगे। औसतन 10 फीसदी क्षेत्र अनुपयुक्त हो जाएगा। रिपोर्ट में बताया गया है कि साहेल क्षेत्र, मध्य पूर्व और ब्राजील जैसे इलाके जलवायु परिवर्तन और भूमि उपयोग बदलाव के संयुक्त असर से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। कुछ परिदृश्यों में तो कई प्रजातियों के लिए हालात बेहद खराब होने का अनुमान है, जहां उनके पास आवास का विकल्प ही नहीं बचेगा।
कुछ दशकों में बदल जाएगा जैव विविधता का नक्शा
वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले दशकों में पर्यावरणीय बदलाव धरती की जैव विविधता का नक्शा पूरी तरह बदल सकते हैं। अगर जलवायु परिवर्तन और भूमि उपयोग से जुड़े इन आपस में जुड़े खतरों को समय रहते नहीं रोका गया, तो हजारों प्रजातियां पृथ्वी से हमेशा के लिए गायब हो सकती हैं।
ये भी पढ़ें: चिंताजनक: उम्र और कैंसर समान लेकिन ज्यादा जान गंवाते हैं गरीब बच्चे, वैश्विक आंकड़े चिंता का विषय
समाधान जरूरी
विशेषज्ञों के अनुसार जैव विविधता को बचाने के लिए केवल संरक्षित क्षेत्र बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में तेजी से कटौती, टिकाऊ भूमि उपयोग नीतियां और स्थानीय समुदायों को संरक्षण प्रयासों में भागीदार बनाना जरूरी है।
विज्ञापन
अध्ययन ऑक्सफोर्ड विवि के स्कूल ऑफ जियोग्राफी एंड द एनवायरमेंट से जुड़े वैज्ञानिक डॉ. रुत वर्दी के नेतृत्व में किया गया है। इसमें इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस, बंगलूरू के शोधकर्ता गोपाल मुरली समेत यूके, ऑस्ट्रेलिया और इजराइल के वैज्ञानिक शामिल थे। अध्ययन के नतीजे अंतरराष्ट्रीय जर्नल ग्लोबल चेंज बायोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं। शोध में करीब 30,000 उभयचर, पक्षी, स्तनधारी और सरीसृप प्रजातियों का विश्लेषण किया गया, ताकि यह समझा जा सके कि बढ़ती गर्मी और भूमि उपयोग में बदलाव उनके प्राकृतिक आवास और गर्मी सहने की क्षमता को किस हद तक प्रभावित कर सकते हैं।
विज्ञापन
डॉ. वर्दी का कहना है कि जब कई पर्यावरणीय दबाव एक साथ सक्रिय होते हैं तो जैव विविधता पर उनका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। इसी वजह से संरक्षण उपायों और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती के लिए तुरंत और समन्वित कदम उठाना जरूरी है। अध्ययन के अनुसार सदी के अंत तक 7,895 प्रजातियां ऐसी स्थिति में पहुंच सकती हैं, जहां उनके पूरे प्राकृतिक आवास क्षेत्र में या तो अत्यधिक गर्मी होगी या भूमि उनके रहने योग्य नहीं बचेगी, या फिर दोनों संकट एक साथ हावी होंगे। ऐसी परिस्थितियां उन्हें वैश्विक स्तर पर विलुप्ति के खतरे में डाल सकती हैं।
विज्ञापन
आवास का संकट सबसे गंभीर
शोधकर्ताओं ने पाया कि सबसे गंभीर स्थिति में औसतन प्रजातियों के 52 फीसदी आवास क्षेत्र रहने लायक नहीं रहेंगे। औसतन 10 फीसदी क्षेत्र अनुपयुक्त हो जाएगा। रिपोर्ट में बताया गया है कि साहेल क्षेत्र, मध्य पूर्व और ब्राजील जैसे इलाके जलवायु परिवर्तन और भूमि उपयोग बदलाव के संयुक्त असर से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। कुछ परिदृश्यों में तो कई प्रजातियों के लिए हालात बेहद खराब होने का अनुमान है, जहां उनके पास आवास का विकल्प ही नहीं बचेगा।
कुछ दशकों में बदल जाएगा जैव विविधता का नक्शा
वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले दशकों में पर्यावरणीय बदलाव धरती की जैव विविधता का नक्शा पूरी तरह बदल सकते हैं। अगर जलवायु परिवर्तन और भूमि उपयोग से जुड़े इन आपस में जुड़े खतरों को समय रहते नहीं रोका गया, तो हजारों प्रजातियां पृथ्वी से हमेशा के लिए गायब हो सकती हैं।
ये भी पढ़ें: चिंताजनक: उम्र और कैंसर समान लेकिन ज्यादा जान गंवाते हैं गरीब बच्चे, वैश्विक आंकड़े चिंता का विषय
समाधान जरूरी
विशेषज्ञों के अनुसार जैव विविधता को बचाने के लिए केवल संरक्षित क्षेत्र बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में तेजी से कटौती, टिकाऊ भूमि उपयोग नीतियां और स्थानीय समुदायों को संरक्षण प्रयासों में भागीदार बनाना जरूरी है।