{"_id":"5d77b3578ebc3e93c95f0dff","slug":"need-to-redefine-family-values-says-rss","type":"story","status":"publish","title_hn":"पारिवारिक मूल्यों को पुनरभाषित करने की जरूरत, कुटुंब प्रबोधन कार्यक्रम शुरू : संघ","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
पारिवारिक मूल्यों को पुनरभाषित करने की जरूरत, कुटुंब प्रबोधन कार्यक्रम शुरू : संघ
Tue, 10 Sep 2019 07:59 PM IST
आसिम खान
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: आसिम खान
Updated Tue, 10 Sep 2019 07:59 PM IST
विज्ञापन
प्रतीकात्मक तस्वीर
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बदलते परिवेश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी खुद को बदल रहा है। उसका मानना है आज जब लिव इन संबंधों, ट्रांसजेंडर और एलजीबीटीक्यू समुदायों को कानूनी मान्यता मिल रही है ऐसे में देशभर में पारिवारिक मूल्यों को पुन: परिभाषित करने की आवश्यक्ता है। इसके लिए संघ कुटुंब प्रबोधन (परिवार की जागृति) कार्यक्रम शुरू कर रहा है जिससे कि समाज में पारिवारिक मूल्यों के प्रति आस्था जगे।
विज्ञापन
आज संघ लिव इन संबंधों को मान्यता दे रहा है हालांकि उसका मानना है कि इस तरह की शादियों में सफलता की दर बहुत कम है। साथ ही लागत और खतरा, खासतौर से महिलाओं के लिए, बहुत ज्यादा है। संघ के वरिष्ठ अधिकारी और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री सुनील आंबेकर का कहना है परिषद के कार्यकर्ता ट्रांसजेंडर समुदाय के साथ काम कर रहे हैं।
विज्ञापन
हालांकि संघ समान लिंग या गे शादियों में विश्वास नहीं रखता क्योंकि इनसे कई तरह की जटिलताएं पैदा होती हैं। लेकिन आंबेकर का मानना है कि उनका संगठन इस विषय पर भी खुली चर्चा करने के लिए राजी है। संघ का मानना है कि हमें पारिवारिक मूल्यों का अपना मॉडल विकसित करना होगा ना कि पश्चिमी देशों के मॉडल की नकल करना। पश्चिमी समाज परिवार के अपने मॉडल की वजह से मुसीबत में हैं।
विज्ञापन
संघ छोटे परिवार का हिमायती है और उसका जोर सामाजीकरण या एक-दूसरे से मिलने-मिलाने पर है। आंबेकर ने इन विषयों पर अपनी पुस्तक द आरएसएस-रोडमैप्स फॉर 21 सेंचुरी (21वीं शताब्दी के लिए संघ के रोडमैप) में विस्तार से चर्चा की है। संघ के किसी वरिष्ठ पदाधिकारी द्वारा संगठन पर लिखी गई यह पहली किताब है। कुछ समय पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत के तीन दिनों तक चले समागम के बाद आमजन तक अपना दृष्टिकोण पहुंचाने का यह उसका एक और प्रयास है।
नई सामाजिक व्यवस्था चाहिए
उनका कहना था संघ के विचारों में सामाजिक न्याय जरूरी है लेकिन वे यह भी मानते हैं कि आज जातिगत विषमता कम हुई है। जातिभेद धीरे-धीरे अपनी प्रासंगिकता खोते जा रहे हैं। व्यवस्था से कहीं ज्यादा अव्यवस्था हो गई है। लोगों में समरसता लाने में आज कहीं ज्यादा बाधाएं हैं। एक नई व्यवस्था की जरूरत है लेकिन यह कहीं बाहर से नहीं लाई जा सकती है। नई व्यवस्था हमें खुद विकसित करनी होगी। उसके लिए अनुकूल माहौल बनाना होगा। समरसता बढ़ाने के हर प्रयास का संघ समर्थन करता है।