विश्व पर्यावरण दिवस 2018: पर्यावरण संरक्षण चाहिए, विनाश नहीं
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विकास के पहले सतत् शब्द जोड़ना कुछ अटपटा-सा लगता है। इसकी आवश्यकता इसलिए पड़ी कि मूल पूंजी को खाकर आर्थिक वृद्धि को 'विकास' माना जाने लगा है। यह पश्चिम की भोगवादी सभ्यता की देन है। इसकी प्रकृति की ओर से देखने की दृष्टि है- जल, जंगल और जमीन को एक संसाधन मात्र मानना। मनुष्य जब प्रकृति का स्वामी बन जाता है तो वह उसके साथ कसाई जैसा व्यवहार करने लग जाता है। पश्चिम की सभ्यता की ये उपलब्धियां और उसके आधार पर दुनिया पर उसका आर्थिक साम्राज्य उन देशों के लिए भी अनुकरणीय बन गया जिनकी लूट-खसोट से वे वैभवशाली बने।
प्रकृति के भण्डार सीमित हैं और यदि उनका दोहन पुनर्जनन की क्षमता से अधिकमात्रा में किया जाए तो ये भण्डार खाली हो जाएंगे। जल, जंगल और जमीन का एक-दूसरे के घनिष्ट संबंध है। भोगवादी सभ्यता जंगलों को उद्योग व निर्माण सामग्री का भण्डार मानती है। उधर वृद्धि वाले विकास ने वनों के स्वरूप में परिवर्तन कर उन्हें इमारती लकड़ी और औद्योगिक कच्चे माल की खानों में परिवर्तित कर दिया। वास्तव में वन तो जिंदा प्राणियों का एक समुदाय है जिसमें पेड़, पौधे, लताएं, कन्द-मूल, पशु-पक्षी और कई जीवधारी शामिल हैं। इनका अस्तित्व एक-दूसरे पर निर्भर है।
औद्योगिक सभ्यता ने इस समुदाय को नष्ट कर दिया, वन लुप्त हो गए। इसका प्रभाव जल स्त्रोतों पर पड़ा। वन वर्षा की बूंदों की मार अपने हरित कवच के ऊपर झेलकर एक ओर तो मिट्टी का कटाव रोकते हैं और उसका संरक्षण करते हैं। पत्तियों को सड़ाकर नई मिट्टी का निर्माण करते हैं और दूसरी ओर स्पंज की तरह पानी को चूसकर जड़ों में पहुंचाते हैं, वहीं पानी का शुद्धिकरण और संचय करते हैं, फिर धीरे-धीरे इस पानी को छोड़कर नदियों के प्रवाह को सुस्थिर रखते हैं। इसीलिए मुहावरा बना है कि 'जंगल नदियों की मां है।'
वास्तव में विकास के दो मूलभूत लक्षण हैं। पहला, जो कुछ हमें प्राप्त हैं उससे अधिक नहीं तो कम से कम उतना हमारी संतानों को इस प्रकार उपलब्ध होना चाहिए जिससे वे सुख, शांति और संतोष का उपयोग कर सकें। बाहुल्य वाले विकास में सुख और शांति का स्त्रोत अधिकाधिक भोग की वस्तुओं का होना माना जाता है। हमारे शास्त्रों में 'संतोषं परमं सुखं' का मुहावरा आया है। इसलिए विकास की परिभाषा यह है कि विकास वह स्थिति है, जिसमें व्यक्ति और समाज स्थायी सुख, शांति और संतोष का उपयोग करते हैं। वहां प्राकृतिक संसाधनों को क्षरण नहीं होता बल्कि उनकी वृद्धि होती रहती है।
दूसरा, जिससे एक व्यक्ति या समूह का लाभ होता है, उसे दूसरों की क्षति न हो, विकास के कारण समाज में असंतुलन पैदा नहीं होना चाहिएा। असंतुलन असंतोष की जननी है। इस असंतोष को दबाने के लिए अभिजात्य वर्ग पशुबल-दण्डशक्ति का सहारा लेता है। इससे जमी हुई हिंसा जो समाज में व्याप्त रहती है, मौका मिलते ही प्रकट होती है, सारी व्यवस्था को नष्ट कर, उससे भी अधिक प्रचण्ड हिंसा के आधार पर नई व्यवस्था कायम हो जाती है।
विकास के आधार प्राकृतिक संसाधन होते हैं। यद्यपि हम विकास के क्षेत्र में कई लंबी छलांग लगा चुके हैं। हमने पृथ्वी का कोना-कोना छान लिया है। किसी भी कोने के संसाधन सर्वत्र उपलब्ध हो सकते हैं। जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन की वृद्धि के नए-नए तौर-तरीके भी निकाल लिए हैं, लेकिन भोग विलासिता का यही अंत नहीं हुआ। दूसरे ग्रहों में संसाधनों की खोज में जाने का सिलसिला जारी है। हमारे अपने उपग्रह में संसाधनों का प्रबंध और दोहन इस प्रकार हुआ है कि दूसरे जीवधारियों के जीवन के आधार ही समाप्त हो गए हैं। अन्य जीवधारियों और वनस्पतियों की कई प्रजातियां लुप्त हो गई हैं। विकास का सबसे बुरा शिकार वन हुए हैं।
लगभग तीस साल पहले 'यूनेस्को कूरियर' में एक व्यंग चित्र में इसका दर्शन कराया गया। एक बौना आदमी एक विशाल वृक्ष को अपनी बगल में दबाकर बेहताशा भाग रहा था किसी ने रास्ते में उसे रोककर पूछा 'कहा जा रहे हो?' उसने दौड़ते-दौड़ते उत्तर दिया- 'पहले मैं इस पेड़ को किसी सुरक्षित जगह रख आऊं, तब बात करूंगा।' प्रति प्रश्न हुआ, इस पेड़ के लिए क्या खतरा है? उसने कहा देखते नहीं, सीमेंट की सड़क मेरा पीछा कर रही है। सीमेंट की सड़क आधुनिक विकास की प्रतीक है जहां-जहां सड़क जाती है वहां सेप्रकृति लुप्त हो जाती है। हम यह भूल गए हैं कि हमारी बनाई हुई कृत्रिम दुनिया में जिंदा रहने के लिए मूलभूत साधन-प्राणवायु देने वाले वन और वृक्ष, जल और जमीन लुप्त होते जा रहे हैं। तो क्या यह अन्य कई जीवधारियों की तरह मानव प्रजाति के लुप्त होने की शुरूआत है?
वास्तव में प्राकृतिक स्थिति में मनुष्य जितना शक्तिशाली था, वह आज उतना शक्तिशाली नहीं रह गया है। उसने अवश्य ही अपने लिए कृत्रिम साधनों का एक दृढ़ कवच बना लिया है लेकिन उसकी स्वयं की प्रतिरोध की शक्ति क्षीण हो गई है। भौतिक विकास की दृष्टि से जो समाज आगे बढ़े हैं उनमें इस चेतना का उदय हुआ है कि हमारी जिंदा रहने के लिए प्रकृति का अंधाधुंध शोषण और दोहन नहीं बल्कि उसका संरक्षण होना चाहिए।
सवाल यह उठता है कि किन-किन संसाधनों का संरक्षण? और फिर संरक्षण और उपभोग की सीमाएं क्या-क्या हों? संरक्षण के लिए आज की भोगवादी सभ्यता को प्राथमिकताओं-बाहुल्य के स्थान पर सादगी और संयम को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। सौभाग्य से भारतीय संस्कृति में सादगी और संयम का पालन करने वाले ही समाज में पूज्य और सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति माने जाते रहे हैं। महात्मा गांधी ने भारतीय संस्कृति के इस संदर्भ को स्वयं अपने आचरण द्वारा पुनः जीवित कर सारी दुनिया को राह बता दी। उन्होंने कहा-'प्रकृति के पास हर एक की आवश्यकता को पूरा करने के लिए पर्याप्त है लेकिन किसी एक के भी लोभ लालच को संतुष्ट करने के लिए कुछ नहीं हैं।' उन्होंने सच्चे धार्मिक जीवन के लिए एकादश व्रतों को नियमित प्रार्थना का अंग बनाया।
निश्चित रूप से कई वस्तुएं ऐसी होगी जिनके बिना हमारा काम नहीं चल सकता इसके विकल्प ढूंढने होंगे। ऊर्जा इनमें से एक है। आज पर्यावरण प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण तापीय और आणविक ऊर्जा है। ऊर्जा के विकल्प भारत जैसे जनसंखया बाहुल्य वाले देश में प्राथमिकता के आधार पर मानव, पशु, बायो, सौर पवन, भूमिगत ताप और बहते प्रवाह से जल विद्युत होने चाहिए। ये अक्षय स्त्रोत भी हैं, जबिक ताप और परमाणु ऊर्जा के लिए कच्चा माल सीमित मात्र में होने के कारण ये स्थायी स्त्रोत नहीं हो सकते।
सही विकास की असली कसौटी तो यह है कि जीवन के लिए अनिवार्य प्राण वायु, जल, भोजन, वस्त्र, आवास और पशुओं का चारा एक ही स्थान पर उपलब्ध होना चाहिए। इसका साधन वनीकरण वृक्ष खेती है। वृक्ष प्राणवायु के अजस्त्र स्त्रोत और कार्बनडाई ऑक्साइड का प्रदूषण करने वाले हैं। वे बादलों को आकर्षित कर वर्षा लेते हैं। वर्षा के पानी का अपनी जड़ों में संचित कर नदी-नालों में बहाते हैं, पत्तियों को सड़ाकर तथा जड़ों से चट्टानों को तोड़कर मिट्टी बनाने के कारखाने का काम करते हैं। जनसंख्या वृद्धि और कृषि भूमि के क्षेत्र के घटने के साथ खाद्य आपूर्ति के लिए कम जमीन पर अधिक उत्पादन करना अनिवार्य हो गया है। वृक्ष आकाश की ओर बढ़कर खाली स्थान का उत्पादन के लिए उपयोग करते हैं। वृक्ष खेती के प्रजातियों के अनुसार अन्न के मुकाबले पांच से दस गुना तक अधिक उत्पादन हो सकता है।
पर्यावरण की चुनौती का वृक्ष खेती नवीनतम और वैज्ञानिक उत्तर है। सौभाग्य से भारतीय संस्कृति ने वृक्षों के समूह 'अरण्य' के महत्व को हजारों वर्षों पहले स्वीकार कर लिया था। गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने तो इसे 'अरण्य संस्कृति' की संज्ञा ही दी। इन अरण्यों में ही शिक्षा के मंदिर थे। जब अरण्य में जीवन संस्कृति की बुनियाद पड़ी तो वृक्षों के प्रति मानव में एक पूजा की भावना दिव्यता का विकास हुआ, वह वृक्ष के पास कुल्हाड़ी लेकर नहीं गया बल्कि उसके नीचे नतमस्तक होकर ज्ञान की प्राप्ति के लिए गया, जब वृक्ष से मकान बनाने के लिए लकड़ी की आवश्यकता होती थी तो वह काटने से पहले उससे क्षमा मांगता था।
वनों का विनाश अन्न की खेती के साथ प्रारंभ हुआ। वृक्ष मानव रिचर्ड सेन्ट बार्ब बेकर के अनुसार अंग्रेजी का 'फील्ड (खेत) शब्द 'फ्यल' (पेड़ गिराना) से बना है। इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में हमें अपनी उपलब्धियों और हानियों का लेखा-जोखा करना चाहिए। यह एक मनोवैज्ञानिक क्षण है। हमने अपनी सदियों पुरानी विरासत नष्ट कर दी है। इसका पुनर्जनन हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। प्रदूषण के दानव से त्रस्त्र प्राणी मात्र के जिंदा रहने की इस पहली आवश्यकता को हम शीघ्रातिशीघ्र पूरा कर सकें। यह सबसे बड़ी उपलब्धि होगी। पर्यावरण की रक्षा केवल वायु प्रदूषण से मुक्ति तक ही सीमित नहीं रखी जा सकती, यह तो जैसे हमारे शांति मंत्र में याचना की गई है। 'आकाश में शांति, और सर्वत्र शांति'। इस शांति के लिए हमें एक स्वच्छ और मुक्त वातावरण चाहिए। यही पर्यावरण की रक्षा का मूल मंत्र है।
श्री सुन्दरलाल बहुगुणा प्रसिद्ध पर्यावरणविद् लेखक एवं वक्ता हैं।