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क्या जातिवाद के खत्म होने का प्रमाण है नरेंद्र मोदी को मिली प्रचंड जीत?

Mon, 27 May 2019 12:08 AM IST
Amit Digital अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amit Digital Updated Mon, 27 May 2019 12:08 AM IST
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Narendra Modi victory is the evidence of the end of casteism
प्रचंड बहुमत के बाद नरेंद्र मोदी - फोटो : PTI

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा ने 31.34 फीसदी वोटों के साथ 282 सीटों पर बड़ी जीत दर्ज की थी। पूरे एनडीए खेमे ने 38.50 फीसदी वोट शेयर के साथ 336 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस चुनाव के बाद कहा गया था कि नरेंद्र मोदी के गुजरात मॉडल और हिंदूवादी चेहरे ने पूरे भारत, विशेषकर हिंदी भाषी हिस्से में जातिवाद की दीवार तोड़ दी जिसकी वजह से भाजपा को इतनी बड़ी सफलता हासिल हुई। अब 2019 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी का करिश्मा एक बार फिर चला है और भाजपा अभूतपूर्व 303 सीटों पर जीत के साथ एक इतिहास रच चुकी है। 

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एनडीए खेमें को कुल 353 सीटें मिली हैं। कहा जा रहा है कि एक बार फिर नरेंद्र मोदी ने जातिवाद की दीवार तोड़ने में सफलता पाई है। कथित रुप से जातिवादी राजनीति करने वाले दलों समाजवादी पार्टी और बहुजनसमाज पार्टी को केवल पांच और दस सीटें मिली हैं। बीजेपी को मिली यह बड़ी जीत क्या भारत में जातिवादी राजनीति के अंत की घोषणा है जैसा कि भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह कहते हैं? या फिर यह सिर्फ एक समय का दौर है जहां जातिवाद कुछ समय के लिए पीछे छूटा है, और जैसे ही केंद्र में कोई कमजोर नेतृत्व आएगा, जातिवाद का  मुद्दा एक बार फिर भारत की राजनीति में आ जाएगा?  
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'अब दलितों को सिर्फ आरक्षण नहीं चाहिए'
दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञाने के प्राध्यापक स्वदेश सिंह कहते हैं दलित राजनीति करने वाले दलों-राजनेताओं ने दलित-पिछड़े युवाओं को आज तक सिर्फ आरक्षण के दम पर साधे रखा, जबकि सच्चाई यह है कि आज का दौर सरकारी नौकरी का नहीं, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बाजारवाद का है। यहां व्यापार करने के लिए पूंजी चाहिए, व्यापार करने के लिए योग्यता और कौशल चाहिए। यह नब्ज नरेंद्र मोदी ने खूब पकड़ी। एक तरफ तो वे कुंभ में दलितों के पैर धुल उनमें स्वाभिमान की भावना भरते रहे, दूसरी तरफ कौशल प्रशिक्षण और मुद्रा लोन के जरिए उन्हें मजबूत करते रहे। इससे अनेक वर्गों के युवाओं ने खुद को नरेंद्र मोदी से जुड़ा पाया। 
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शौचालय और घर देकर उनके आत्मसम्मान को मजबूत किया। इससे जिन दलित दबकों ने कभी सम्मान के साथ बैठने का अवसर नहीं पाया था, उसने स्वयं को सम्मानित महसूस किया। जिन योजनाओं का विपक्ष मजाक उड़ाता रहा, दलित-वंचित समाज की महिलाएं उसके कारण मोदी ब्रांड से जुड़ती रहीं। यही कारण है कि नरेंद्र मोदी के कारण जातिवाद की दीवार कमजोर हुई जो बीजेपी की जीत के रुप में दिखाई पड़ रहा है। 

स्वदेश सिंह सपा, बसपा या राजद के कमजोर होने के पीछे उनके नेतृत्व के प्रति जनता में पैदा हुई अविश्वसनीयता देखते हैं। उनके मुताबिक, जनता को यह दिख रहा है कि मायावती के पास हजारों करोड़ की संपत्ति है, अखिलेश यादव का परिवार अब हवाई जहाज से यात्रा करता है और लालू परिवार की संपत्ति का हिसाब लगाना भी कठिन है, जबकि उसका समाज आज भी उसी हासिये पर खड़ा है तो इससे उसमें निराशा पैदा होती है जो एक विकल्प खोजती है। फिलहाल, यह विकल्प उसे मोदी के रुप में मिलता दिख रहा है। 

'आशाएं जमीन पर नहीं उतरीं तो वापस लौटेगा जातिवाद का मुद्दा'
राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर सोनाली चितलकर कहती हैं इतना बड़ा जनादेश बिना हर वर्ग के समर्थन के संभव नहीं होता। राष्ट्रवाद कभी किसी एक जाति या एक वर्ग के सहारे सफल नहीं हो सकता। यह तभी सफल हो सकता है जब इसमें समाज की हर जाति-हर वर्ग की भागीदारी हो। 1857 हो या 1942, ये आंदोलन बड़ा रुप तभी ले सके जब समाज के अनेक वर्गों ने उसके साथ खुद को जोड़ा। उनके मुताबिक, नरेंद्र मोदी के राष्ट्रवाद ने जाति को खत्म करने का काम तो नहीं किया है, लेकिन यह जरुर है कि उनके राष्ट्रवाद में सभी जातियों ने अपनी भूमिका पाई और इसी कारण वे उनसे जुड़ गए। 

जब मोदी 130 करोड़ भारतीयों के समृद्ध भारत, विकसित भारत, वैश्विक ताकत वाले भारत की बात करते हैं तो इस वर्ग की उम्मीदें इसमें अपनी हिस्सेदारी, अपनी भूमिका देखती हैं। यही कारण है कि यह वर्ग खुद को नरेंद्र मोदी से जोड़ पाया। सोनाली चितलकर के मुताबिक, अगर नरेंद्र मोदी सरकार के इस कार्यकाल में इन जातियों की उम्मीदों के अनुसार कार्यान्वयन होता दिखता है, उनकी भागीदारी सुनिश्चित होती है तो यह दौर आगे बढ़ेगा और एक बदले भारत की नींव रखेगा, लेकिन अगर इस वर्ग की अपेक्षाएं पूरी नहीं होती हैं तो यह वर्ग एक बार अपने लिए किसी जातिवादी स्तंभ की खोज कर लेगा।
  
सोनाली चितलकर के मुताबिक 17वीं संसद में ज्यादा महिलाओं का चुनकर आना केवल एक घटना या संयोग मात्र नहीं है। यह समाज का वह बदलाव है जो जमीन पर आकार ले रहा है। अब उसी का प्रतिबिंब हमें संसद में दिखने लगा है। उनके मुताबिक, अगर जातिवाद की दीवार जमीनी रुप से कमजोर हो रही है तभी उसका स्वरुप देश के राजनैतिक क्षितिज पर दिखाई पड़ेगा। अगर यह बदलाव जमीनी नहीं होता तो इसकी भूमिका इतने बड़े चुनाव में दिखाई भी न पड़ती। लेकिन देश के राजनैतिक नेतृत्व के सामने इस बदलाव को सहेजने और आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है। 
 

'जातिवाद खत्म नहीं हुआ, संगठन के कौशल ने पाई विजय' 
प्रसिद्ध दलित चिंतक अशोक भारती कहते हैं कि इस बात में तो कोई शक नहीं है कि नरेंद्र मोदी को मिली इतनी बड़ी सफलता तब तक नहीं मिलती जब तक कि ओबीसी और दलित वर्ग का  समर्थन उन्हें नहीं मिलता। लेकिन उन्हें नहीं लगता है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने पूरे कार्यकाल में जातिवाद खत्म करने के लिए कोई काम किया है। सच्चाई तो यह है कि उनके ही कार्यकाल में ऊना, हैदराबाद के वेमुलाकांड और दलितों की पिटाई के अनेक  मामले हुए। भारती के मुताबिक, यह सही है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने दलितों-पिछड़ों से जुड़ी हर समस्या के समय आगे बढ़कर उसका निदान खोजने की कोशिश की। 

ओबीसी वर्ग को संतुष्ट करने के लिए ओबीसी आयोग का गठन कर दिया तो एससीएसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के बदवाल को कानून लाकर खत्म कर दिया। रोस्टर सिस्टम पर भी उन्होंने एक विश्वसनीय तरीके से काम कर इस मुद्दे पर जनाक्रोश को संभाल लिया। आदिवासियों के जमीन पर अधिकार के मुद्दे पर सक्रियता दिखाकर उसे संभाला और आदिवासियों के वनों में रहने के उनके अधिकार सुरक्षित किए। इससे सरकार हर वर्ग में एक अच्छा संदेश देने में सफल रही।
  
अशोक भारती के मुताबिक, जबकि कांग्रेस सहित पूरा विपक्ष इन मुद्दों पर बिखरा रहा। वे इन मुद्दों को जनता तक सही तरीके से ले भी नहीं जा सके जबकि कई बार जनता सड़कों पर उतर आई। कांग्रेस जैसे मुख्य विपक्षी दल ने किसानों के सबसे बड़े मुद्दे को कुछ किसान संगठनों के भरोसे छोड़ दिया जबकि उसे खुद इसकी अगुवाई करनी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी को मिली बड़ी जीत जातिवादी दीवार ढहने के कारण नहीं, बल्कि भाजपा-आरएसएस के मजबूत संगठन के कारण हुई है। वे अपनी बात जनता को समझाने में सफल रहे जबकि विपक्ष उन तक पहुंच भी नहीं सका जो उसकी बड़ी पराजय का कारण बना। 

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